रासायनिक खेती के घातक परिणाम      Publish Date : 20/04/2026

      रासायनिक खेती के घातक परिणाम

                                                                                  प्रोफेसर आर.एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

रासायनिक खेती आपने आप में एक घातक अभिशाप है और यह प्रकृति के लिए भी एक बदनुमा दाग है।

कृषि पारिस्थतिकी तंत्र को होने वाली हानियाँ:

कृषि में खेती किसानी के लिए विनाशकारी कृषि रसायनों एवं कीटनाशकों का प्रयोग करने से मृदा की उर्वरता और उसकी जीवनी शक्ति में भारी कमी आती है।

रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशकों का प्रयोग करने से कृषि के लिए लाभकारी सूक्ष्म जीवाणुओं को नष्ट कर दिया है और साथ हमारी मृदा की गुणवत्ता को भी बुरी तरह से प्रभावित कर उसे कम कर दिया है।

प्राकृतिक मित्रकीट भी विलुप्ति के कगार परः

                                  

उर्वरकों एवं कीटनाशकों का निरंतर और अविवेकपूर्ण तरीके से छिड़काव करने से खेती के लिए अत्यंत लाभकारी मधुमक्खी और लेडीबग जैसे अनेक मित्रकीटों का अब विनाश हो चुका है, जिससे अब प्रकृति का संतुलन भी बिड़ने लगा है।

जड़ के कार्यों की हानिः

कृषि रसायनों का प्रयोग करने से जैसे-जैसे हमारे खेतों की मृदा सख्त होती जाती है तो ससे पौधों की जड़ों को पर्याप्त हवा नहीं मिल पाती है, जिसके फलस्वरूप हमारी फसलें उनके आरम्भिक काल से ही कमजोर रह जाने की आशंका बढ़ जाती है।

खाद्य श्रंखला में अवशेषों का प्रवेशः

खाद्य श्रंखला में कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों के अवशेषों के प्रवेश कर जाने से यह हमारे भोजन के माध्यम से शरीर कर शरीर में विषैले प्रभाव छोड़ते हैं।

कृषि रसायनों के अंश हमारे रक्त प्रवाह के माध्यम से जब शरीर में फैलते हैं तो मानव में कैंसर के जैसी घातक बीमारियों की बढ़ोत्तरी होने लगती है।

मानव की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर कुप्रभावः

वर्तमान समय में हमारी भोजन श्रंखला में इनके प्रवेश करने से मानव की रोग प्रतिरोधक क्षमता में भी व्यपक कमी दर्ज की जा रही है। रासायनिक अंशों सं युक्त खाद्य सामग्रियों का सेवन करने से बीमारियों से लड़ने की मानव की प्राकृतिक क्षमता भी दिन प्रति दिन कमजोर होती जा रही है।

अतः किसान भाईयों से अपील है कि वह फसलों के दौरान कृषि रसायनों का कम से कम प्रयोग करें अैर जैविक खेती या प्राकृतिक खेती प्रणालियों को मजबूती प्रदान करें ताकि हम सभी एक स्वस्थ और शांतिपूर्वक जीवन का निर्वाह कर सकें।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।