टिकाऊ कृषि का प्रभावी साधन हैं दालें      Publish Date : 19/02/2026

     टिकाऊ कृषि का प्रभावी साधन हैं दालें

                                                                                        प्रोफेसर आर. एस. सेंगर डॉ0 रेशु चौधरी

कम वसा और कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स के कारण ये आधुनिक जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के विरुद्ध प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करती हैं। पर्यावरण की दृष्टि से दालों का महत्व और भी व्यापक है। इनमें मिट्टी में वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर करने की प्राकृतिक क्षमता होती है, जिससे खेतों की उर्वरता बढ़ती है और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है।हर साल 10 फरवरी को मनाया जाने वाला 'विश्व दलहन दिवस' हमें यह सोचने का अवसर देता है कि जिन दालों को हम रोजमर्रा के भोजन का साधारण हिस्सा मान लेते हैं, वे वास्तव में मानव सभ्यता और प्रकृति के बीच संतुलन की एक गहरी कड़ी हैं।

                                  

खेतों से लेकर थाली तक की यह यात्रा केवल भोजन भर की नाहीं है बल्कि इसमें पोषण, पर्यावरण, कृषि और भविष्य की खाद्य सुरक्षा के सूत्र छिपे हैं। वर्ष 2026 की आधिकारिक थीम 'विश्वकी दलहनः सादगी से उत्कृष्टता की ओर इसी सच्चाई को रेखांकित करती है कि छोटे से दिखनेवाले बीज किस तरह वैश्विक समाधान बनकर उभर रहे हैं। यह दिवस खाद्य एवं कृषि संगठन के नेतृत्व में विश्वभर में मनाया जाता है। दिसंबर 2018 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा इस दिवस की घोषणा के बाद से 2019 से यह निरंतर मनाया जा रहा है। इसकी प्रेरणा 2016 में मनाए गए अंतर्राष्ट्रीय दलहन वर्ष से मिली थी, जिसने पहली बार वैश्विक मंच पर या स्पष्ट किया कि दालें केवल पारंपरिक भोजन नाहीं, पोषण सुरक्षा और टिकाऊ कृषि का प्रभावी साधन हैं।

दलहन, यानी फलीदार पौधों से प्राप्त सूखे और खाने योग्य बीज, सदियों सेमानव आहार का आधार यहे हैं। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में ये भोजन की रीढ़ रहे जबकि आधुनिक समय तककुछ क्षेत्रों में इन्हें साधारण या कम मूल्य वाला भोजन समझा गया लेकिन पोषण विज्ञान ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। आज यह स्वीकार किया जा चुका है कि दालें उच्च गुणवत्ता वाले पौध आधारित प्रोटीन का उत्कृष्ट स्रोत है। इनके साथ मिलने वाला आहार फाइबर पाचन को बेहतर बनाता है, रक्त शर्करा को नियंत्रित करता है और हृदय रोगी के जोखिम को कम करता है। आयरन, जिंक, फोलेट, मैग्नीशियम और बी-विटामिन्स जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व इनों हर आयु वर्ग के लिए उपयोगी चनाते हैं। कम वसा और कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स के कारण येआधुनिक जीवनशैली से जुड़ी बीमारियो के विरुद्ध प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करती हैं।

                                 

पर्यावरण की दृष्टि से दालों का महत्व और भी व्यापक है। इनमें मिट्टी में वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर करने की प्राकृतिक क्षमता होती है, जिससे खेतों की उर्वरता बढ़ती है और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है। अन्य फसलों की तुलना में इन्हें कम पानी की जरूरत पड़ती है और इनका कार्बन फुटप्रिंट भी कम होता है। यही कारण है कि बदलते जलवायु परिदृश्य में दलहन को जलवायु अनुकूल और भविष्य की फसल माना जा रहा है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।