कानून की आवश्यकता ही क्यों पड़े      Publish Date : 16/02/2026

       कानून की आवश्यकता ही क्यों पड़े

                                                                                                          प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

जब किसी प्रकार का अपराध होता है, तब बुद्धजीवी लोग कहते हैं कि इसे रोकने का कानून होना चाहिए। पर्यावरण का संरक्षण करना है तो प्लास्टिक बंद करने का कानून बनाओ, जनसंख्या असंतुलन हो रहा है तो उसका कानून बनाओ, लव जिहाद बढ़ रहा है तो इसका कानून बनाओ।

ऐसी न जाने कितनी समस्याएं हैं, जिसके लिए सामान्य व्यक्ति कानून की मांग करता रहता है। कानून में जब दंड का प्रावधान होता है तो जिसके लिए वह प्रावधान होता है वह उसी कानून का विरोध करता है। जब किसी के परिजन की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है तब उसकी इच्छा दोषी को मृत्यु दंड दिलाने की होती है और वह चाहता है कि सड़क पर चलने वाले लोगों के लिए नियम का उल्लंघन करने पर मृत्यु की सजा का प्रावधान कानून में होना चाहिए।

ऐसी ही जब किसी के स्वजन की अस्पताल में इलाज के दौरान मृत्यु हो जाय तब वह ऐसा ही कठोर कानून चाहता है। पीड़ित सदैव कठोरतम कानूनों की मांग करता है फिर वह पीड़ित चाहे कोई भी हो, किसी जाती का ही या किसी राज्य का हो। भेद भाव को ले कर होने वाली घटनाओं में शिक्षित समाज होने के साथ कमी आने के स्थान पर वृद्धि होती दिखाई दे रही है। जाति से भी आगे चलकर आर्थिक आधार पर भी भेद भाव दिखाई देने लगे हैं।

                          

एक ही गांव का एक व्यक्ति पैसे और संपत्ति में बड़ा हो जाने के बाद अपने ही गांव के सामान्य व्यक्ति जिसके पास उसकी तुलना में संपदा धन के रूप में नहीं है और अपनी आजीविका चलने के लिए मजदूरी कर रहा है को अलग दृष्टि से केवल देखता ही नहीं है बल्कि समय समय पर उसे अपमानित करने का व्यवहार भी करता है। हम एक ऐसे समाज की कल्पना कर सकते हैं जहां किसी भी प्रकार के अपराध की न्यूनता हो और समाज हर पीड़ित के साथ सद्भावना के साथ खड़ा हो तो निश्चय ही कानूनों की प्रासंगिकता समाप्त हो जाएगी।  हम पीड़ित की तरह विचार करें।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।