आधुनिकता के साए में पर्यावरण एवं स्वास्थ्य      Publish Date : 10/02/2026

          आधुनिकता के साए में पर्यावरण एवं स्वास्थ्य

                                                                                                                                                      प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

वर्तमान युग विज्ञान, तकनीक और तीव्र आर्थिक प्रगति का युग है। वैश्विक स्तर पर अधिकांश देश तेज़ी से विकास की ओर अग्रसर हैं। महानगरों का विस्तार, औद्योगिक वृद्धि, परिवहन का आधुनिकीकरण और डिजिटल क्रांति यह सभी आधुनिक विकास के ज्वलंत प्रतीक हैं। किंतु इस तीव्र प्रगति की दौड़ में हम एक अत्यंत आवश्यक पक्ष को अक्सर उपेक्षित कर देते हैं, और वह है पर्यावरण! जो न केवल प्रकृति का हिस्सा है, बल्कि प्रत्यक्ष रूप से मानव स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ है।

आज विकास और पर्यावरण के बीच केवल पारिस्थितिकीय मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह सीधे-सीधे मानव जीवन की गुणवत्ता और स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर रहा है। प्रश्न यह है, क्या हम ऐसा संतुलन बना सकते हैं जिसमें विकास भी हो, पर्यावरण भी संरक्षित रहे और मानव स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव न पड़े? विकास का सही अर्थ केवल बुनियादी ढांचे या आर्थिक संसाधनों की वृद्धि नहीं है, बल्कि इसमें सामाजिक समावेशिता, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और जीवन स्तर में समग्र सुधार शामिल है। एक ऐसा समाज ही सच्चे अर्थों में विकसित माना जा सकता है जहाँ नागरिकों को बेहतर सुविधाओं के साथ-साथ स्वस्थ और सुरक्षित पर्यावरण भी प्राप्त हो।

आधुनिक विकास का पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव

आज के परिदृश्य में विकास और पर्यावरण के बीच की खाई वित्त-प्रतिदिन चौड़ी होती जा रही है। औद्योगीकरण, शहरीकरण और अत्यधिक उपभोग की संस्कृति ने प्राकृतिक संसाधनों का इतना अधिक दोहन कर डाला है कि पृथ्वी का पारिस्थितिक संतुलन डगमगा गया है। परिणामस्वरूप, यह असंतुलन सीधे मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। उद्योगों से निकलने वाला जहरीला धुआँ और रासायनिक अपशिष्ट वायु, जल और मृदा को विषैला बना रहे हैं। वायु प्रदूषण के कारण दमा, फेफड़ों की बीमारी, हृदय रोग और यहाँ तक कि कैंसरजैसी गंभीर बीमारियाँ बढ़ रही हैं। जले प्रदूषण से पीलिया, दस्त, टाइफाइड जैसी जलजनित बीमारियाँ आम होती जा रही हैं।

रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों का अत्यधिक प्रयोग न केवल मिट्टी को विषैला बना रहा है, बल्कि खाद्य श्रृंखला में जहर घोल रहा है, जिसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य पर पड़ता है। वहीं, शहरीकरण के कारण हरियाली घट रही है, गर्मी बढ़ रही है और तापमान में असामान्य वृद्धि हो रही है। इसके कारण हीट स्ट्रोक, त्वचा रोग, मानसिक तनाव और नींद की समस्याएँ आम होती जा रही हैं। कोविड-19 जैसी महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि हमारा पर्यावरण असंतुलित रहेगा, तो नए रोगों का प्रसार और उनका प्रभाव और भी विनाशकारी हो सकताहै। इस प्रकार, यदि विकास विना पर्यावरण संरक्षण के हो रहा है, तो उसका मूल्य मानव स्वास्थ्य से चुकाना पड़ता है।

सतत विकास से संतुलन और समाधान

इस संकट से उबरने का एकमात्र उपाय है सतत विकास की ओर बढ़ना। सतत विकास का अर्थ है ऐसा विकास जो न केवल वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करे, वल्कि भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं के साथ भी अन्याय न करे। और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि विकास ऐसा हो जो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य की रक्षा करते हुए आगे बढ़े।सतत विकास में प्राथमिकता दी जाती है प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग को। जल, खनिज, वनों और भूमि का ऐसा उपयोग किया जाए जो दीर्घकालिक हो, न कि विनाशकारी। पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों जैसे कोयला और पेट्रोलियम की जगह सौर, पवन और जल ऊर्जा जैसे स्वच्छ और नवीकरणीय विकल्पों को अपनाना आज की आवश्यकता है।

साथ ही, प्रदूषण पर नियंत्रण रखना अनिवार्य है। प्लास्टिक, ई-कचरे और जैविक कचरे का वैज्ञानिक पुनर्चक्रण, कचरा प्रबंधन, स्वच्छ ऊर्जा का प्रयोग और हरित तकनीकों का विकास ये सभी प्रयास न केवल पर्यावरण के लिए अनुकूल हैं, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी सुरक्षित हैं। वृक्षारोपण, हरित क्षेत्रों का संरक्षण, जल स्रोतों की स्वच्छता और वायु की शुद्धता पर जोर देकर हम जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बना सकते हैं। पर्यावरणीय शिक्षा और जन-जागरूकता अभियान भी इस दिशा में कारगर हो सकते हैं, ताकि लोग अपने स्वास्थ्य और पर्यावरण के प्रति सचेत रहें। कुछ प्रेरणादायक उदाहरण हमारे सामने हैं, जो दिखाते हैं कि विकास, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को एक साथ कैसे साधा जा सकता है।

केरल के वायनाड जिले में जैविक खेती न केवल भूमि की उर्वरता बनाए रखती है, बल्कि रसायनों से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों को भी कम करती है। गुजरात और राजस्थान में सौर ऊर्जा परियोजनाओं ने न केवल स्वच्छ ऊर्जा दी, बल्कि प्रदूषण के स्तर को भी घटाया। उत्तराखंड के चिपको आंदोलन जैसे प्रयासों ने यह दिखाया कि जब समुदाय सक्रिय होता है, तो न केवल जंगल बचते हैं, बल्कि जलवायु भी स्थिर रहती है और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में भी गिरावट आती है। भारत सरकार भी इस दिशा में सक्रिय प्रयास कर रही है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण का गठन, स्वच्छ भारत अभियान, राष्ट्रीय जैव विविधता मिशन, और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएँ ऐसे कदम हैं जो विकास को अधिक टिकाऊ और स्वास्थ्य-सम्मत बनाने की दिशा में उठाए गए हैं।

जनमानस की पर्यावरण और स्वास्थ्य कीरक्षा में भूमिका

पर्यावरण और स्वास्थ्य की रक्षा में सरकार और नीतियों के साथ-साथ आम नागरिक कीभूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। पर्यावरण संरक्षण वास्तव में स्वयं के स्वास्थ्य की सुरक्षा है। यदि हम जल और बिजली की बचत करें, प्लास्टिक का उपयोग कम करें, सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता दें, वृक्ष लगाएँ और स्थानीय, जैविक उत्पादों का उपयोग करें तो हम न केवल पर्यावरण को बचाएँगे, बल्कि अपने स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाएँगे। जब लोग पर्यावरण के प्रति सचेत होते हैं, तो वे स्वयं बीमारियों से बचते हैं, और एक स्वस्थ समाज का निर्माण संभव होता है। इसलिए, जनजागरूकता और व्यक्तिगत पहल सतत विकास की रीढ़ हैं।

विकास, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य ये तीनों एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। यदि किसी एक को अनदेखा किया गया, तो अन्य दो भी असंतुलित हो जाएँगे। इसलिए यह आवश्यक है कि विकास योजनाओं में पर्यावरण और स्वास्थ्य को केंद्र में रखा जाए। एक ऐसा विकास मॉडल, जो पर्यावरण का सम्मान करे, संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करे और जनस्वास्थ्य की रक्षा करे वही वास्तविक प्रगति का प्रतीक है। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य संकट से जूझ रही है, तब सतत विकास ही यह मार्ग है जो मानवता को एक सुरक्षित, समृद्ध और स्वस्थ भविष्य की ओर ले जा सकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।