
अगली सदी की शिक्षा का स्वरूप Publish Date : 07/02/2026
अगली सदी की शिक्षा का स्वरूप
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
ज्ञानार्जन से धनार्जन का रास्ता अब सिर्फ़ नारा नहीं होगा। यह एक स्पष्ट और पुनरावृत यात्रा होगी, जिस पर लाखों लोग जीवन भर चलते हैं। छोटी अवधि के प्रशिक्षण प्रमाण-पत्र ज्ञानार्जन को लचीला और लगातार कौशल उन्नयन के लिए आसान बनाते हैं। एक राष्ट्रीय डिजिटल प्रणाली ज्ञानार्जन को पारदर्शी और पहुंच योग्य बनाने के साथ ही लोगों को संबंधित रोज़गार आसानी से ढूंढने में सहायता करती है। भारत का जनसांख्यिकीय पथ इस बात की पुष्टि करता है कि इक्कीसवीं सदी का शिक्षा और रोजगार का परिदृश्य हमारे चयन करने से आकार लेगा।
स्वास्थ्य सेवा, जीवनआशा और कार्यजीवन में सुधार का मतलब यह है कि भारत दशकों के लिए अपेक्षाकृत न्यूनतम निर्भरता अनुपात के साथ विश्व की सबसे बड़ी कामकाजी उम्र वाली आबादी बना रहेगा। हमारे सामने कार्य है कि इस अवसर को ज़्यादा मजबूत नियोजनीयता से समर्थित तथा स्कूल और कॉलेज से सम्मानजनक रोजगारों और उद्यमिता के विस्तार मार्गों में तब्दील करें। यह हमारे लिए सिर्फ इरादे का मामला नहीं है। यह हमारे सुधारों में अंतर्निहित होने के साथ जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन में दिखाई देता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 इस अनिवार्यता को असामान्य स्पष्टता के साथ अपने में समेटे है। इसके अनुसार तेजी से बदलती वैश्विक पारिस्थितिकी में बच्चों को सिर्फ सीखने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्हें अनुभव आधारित, जिज्ञासा संचालित और बहु-विषयक शिक्षाशास्त्र के साथ यह भी सीखना है कि ज्ञानार्जन कैसे करें। इस नीति में कलाओं और विज्ञानों, सह और पाठ्येतर तथा सबसे महत्वपूर्ण रूप से व्यावसायिक और शैक्षिक धाराओं के बीच के कठोर विभाजन से बचा गया है ताकि जीवनपर्यंत ज्ञानार्जन और भेद्यता भारतीय शिक्षा का संयोजक सिद्धांत बने।
इस विभाजन को दूर करना उभरते रोजगार और कौशल परिदृश्य के अनुरूप है, जिसमें तकनीकी कुशलता तेजी से पुरानी हो सकती है और व्यावहारिक कौशलों का महत्व बढ़ रहा है। क्रेडिट अंक और सुनिश्चित गुणवत्ता देने के साथ नियोक्ताओं की नजर में आने वाला छोटा और संकेंद्रित ज्ञानार्जन मायने रखता हो तो यह दृष्टिकोण जीवंत हो उठता है। राष्ट्रीय क्रेडिट फ्रेमवर्क इसे संभव बनाता है। यह फ्रेमवर्क स्कूल, उच्चतर शिक्षा और कौशल विकास को समेटे हुए एक समेकित क्रेडिट संग्रह और स्थानांतरण प्रणाली है। इसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद्, राष्ट्रीय व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण परिषद् तथा अन्य संगठनों ने मिल कर तैयार किया है।
इस फ्रेमवर्क के अंदर सूक्ष्म प्रमाण-पत्रों को वैसी छोटी इकाइयों के रूप में परिभाषित किया गया है जो कौशलों के सुसंगत समूहों को प्रमाणित करती हैं। इनमें ज्ञानार्जन के नतीजे उद्योग की जरूरतों से जुड़े होने के साथ ही बड़ी योग्यताओं में शामिल किए जाने के योग्य हैं। मिसाल के तौर पर किसी कामगार का इस महीने पूरा किया गया सौर सुरक्षा मॉड्यूल अलग-थलग प्रमाण-पत्र नहीं रहेगा। उसे अगले साल मिलने वाले ऊर्जा तकनीशियन प्रमाण-पत्र के साथ जोड़ा जा सकता है।
राष्ट्रीय व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण परिषद् कौशल पाठ्यक्रमों के लिए पाठ्यक्रम विकास और प्रमाणन की नियामक संस्था है। उसने राष्ट्रीय व्यावसायिक मानकों तथा सूक्ष्म और नैनो प्रमाण-पत्रों के विकास, मंजूरी और उपयोग के संबंध में स्पष्ट निर्देश दिए हैं। इन निर्देशों के दायरे में वांछित ज्ञानार्जन लक्ष्य, आकलन के नियमों और क्रेडिट घंटों के अलावा इस बात को भी शामिल किया गया है कि इन्हें प्रमाण-पत्र देने वाली विभिन्न संस्थाएं किस तरह अपनाएं। क्रियान्वयन संस्थाएं जिन प्रारूपों का उपयोग करती हैं उन्हें अब सूक्ष्म प्रमाण-पत्रों को मंजूरी मिलने से पहले आवश्यकता के साक्ष्य, उद्योग की मान्यता और अनुमानित स्तर की दरकार होगी।
यह गुणवत्ता आधार सुनिश्चित करता है कि सूक्ष्म प्रमाण-पत्र वास्तविक प्रचलन के रूप में काम करते हुए विभिन्न प्रदाताओं और अवधि के बीच प्रशिक्षु के साथ चलें।ये दिशानिर्देश आजीवन सीखने और व्यवस्था को चुस्त बनाने का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। छोटे, क्रेडिट युक्त पाठ्यक्रम और कैप्सूल लोगों को पुनः कौशल विकास और कौशल उन्नयन के लिए प्रेरित करेंगे। एक तरफ जब मानव और मशीन आपसी सहयोग से काम का बोझ कम कर रहें हैं तो दूसरी तरफ निरंतर सीखते रहना अनिवार्य बनता जा रहा है। ये सुधार कार्य और शिक्षा के बीच संतुलन को बदलने और एक ऐसा कार्यबल तैयार करने में मदद करेंगे जो लंबे समय तक रोजगार योग्य बना रहे, इससे जनसांख्यिकीय लाभांश की संभावना बढ़ जाएगी।
अंतरराष्ट्रीय साक्ष्य भी लघु अवधि के पाठ्यक्रमों और प्रमाण-पत्रों के महत्व को समझते हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन युवाओं के लिए लघु-अवधि के पाठ्यक्रमों का समर्थन करता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन 2025 भी स्कूल से निकलकर जल्दी से नौकरी या काम करने, प्रौद्योगिकी परिवर्तन के दौर में पुनः कौशल विकास और पूर्व-शिक्षण को मान्यता देने के लिए इन कोर्सों के महत्व पर प्रकाश डालता है। साथ ही यह चेतावनी भी देता है कि कमजोर मानक और खराब पोर्टेबिलिटी श्रम बाजार के प्रभाव को कमजोर कर देते हैं (आईएलओ, 2025)। भारत का ढाँचा, गुणवत्ता सुनिश्चित करने वाला दृष्टिकोण इन कमियों से बचने के लिए विशेष रूप से डिजाइन किया गया है।
संस्थागत आधुनिकीकरण इस योजना का दूसरा चरण है। व्यावसायिक शिक्षा का आधार रहे औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों को आधुनिक उपकरणों, उद्योग-सम्बन्धित व्यवसायों और मजबूत प्रशिक्षणों के साथ एकल केंद्रों से हब-एंड-स्पोक उत्कृष्टता केंद्रों में बदला जा रहा है। मई, 2025 में, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एक हजार सरकारी औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों को अपग्रेड करने और बहु-स्रोत वित्तपोषण और स्पष्ट उद्योग भागीदारी के साथ राष्ट्रीय कौशल
प्रशिक्षण संस्थानों में कौशल विकास के लिए पांच राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने के लिए पीएमएसईटीयू (उन्नत आईटीआई के माध्यम से प्रधानमंत्री कौशल और रोजगार परिवर्तन) नामक एक केंद्र प्रायोजित राष्ट्रीय योजना को मंजूरी दी है। डिजाइन पर विशेष जोर दिया गया है। सिमुलेटर और समकालीन उपकरण, दोहरी प्रणाली के मॉडल और संरचित ऑन-द-जॉब प्रशिक्षण और मास्टर प्रशिक्षकों और उद्योग एक्सचेंजों के माध्यम से क्षमता विकास।
यह इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रशिक्षण के दौरान कक्षाएँ वास्तविक कार्यस्थलों की तरह काम करती हैं और प्रशिक्षण में नौकरियों के समान ही वास्तविक उपकरणों का उपयोग किया जाता है तो लोगों को बेहतर प्लेसमेंट और अधिक वेतन मिलता है। उत्कृष्टता केंद्र, केंद्र में परीक्षण और प्रोटोटाइपिंग उपकरण साझा करके छोटे और मध्यम व्यवसायों को पैसे बचाने में मदद करते हैं। इस प्रकार, कुशल प्रशिक्षण स्थानीय उद्योग की जरूरतों को पूरा कर सकता है।
तीसरा चरण डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना है। स्किल इंडिया, डिजिटल हव पाठ्यक्रमों और योजनाओं, मूल्यांकनों, ही प्रमाण-पत्रों और अवसरों को एक ही सार्वजनिक मंच पर इकट्ठा करता है, जिससे शिक्षार्थी, प्रदाता और नियोक्ता सभी (एमएसडीई) जुड़ सकते हैं। परीक्षा परिणाम और प्रमाण-पत्र उपलब्ध कराने जैसी प्रमुख सेवाएँ पहले से ही प्रदान की जा रही हैं, जिससे प्रशिक्षुओं और नियोक्ताओं को कौशल के लेन-देन और नई खोज के लिए एक ही मंच उपलब्ध हो जाता है। जैसे जैसे हब का विस्तार हो रहा है वैसे वैसे ध्यान सामान्य नौकरियों की बजाय स्मार्ट मार्गदर्शन की ओर केंद्रित हो रहा है जो कर्मचारियों को उच्च वेतन वाली नौकरियों में जाने का तरीका दिखाता है। उदाहरण के लिए, एक सामान्य इलेक्ट्रिशियन सोलर पैनल लगाने वाला, एक वेयरहाउस कर्मचारी कोल्ड चेन समन्वयक या एक सामान्य मशीन ऑपरेटर 3-डी प्रिंटिंग तकनीशियन बन सकता है (भारत सरकार सेवा पोर्टल)। जैसे जैसे व्यवस्था में सुधार होगा कौशल मानचित्र, वेतन संबंधी जानकारी और भविष्य की नौकरी के पूर्वानुमान जैसे उपकरण कॅरिअर संबंधी सलाह को और सटीक बनाएँगे। इससे विशेष रूप से श्रम बल में पुनः प्रवेश करने वाली महिलाओं और हरित एवं डिजिटल भूमिकाओं में आने वाले श्रमिकों को मदद मिलेगी। डिजिटल रूप से सत्यापित प्रोफ़ाइल, मान्यता प्राप्त माइक्रो-क्रेडेंशियल्स और शिक्षार्थी कीप्रोफ़ाइल से जुड़े क्रेडिट के साथ, हर छोटा कोर्स एक बड़े कॅरिअर के मार्ग की ओर ले जाता है। सत्यापित नियोक्ता कुशल व्यक्ति खोज सकते हैं, प्रशिक्षुता प्रदान कर सकते हैं और इन प्रमाण-पत्रों को एकही स्थान पर देख सकते हैं।
ये सभी सुधार एक साथ मिलकर काम करते हैं। छोटी अवधि के सीखने के तरीके और प्रक्रिया को लचीला और आसान बनाते हैं ताकि कौशल को लगातार उन्नत किया जा सके। संस्थान वास्तविक कार्य अनुभव के साथ सीखने का अवसर प्रदान करते हैं। एक राष्ट्रीय डिजिटल प्रणाली लोगों को सीखने को पारदर्शी और सुलभ बनाने में मदद करती है और उन्हें संबंधित नौकरियां आसानी से खोजने में सहायता करती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शैक्षणिक और व्यावसायिक क्षेत्रों के बीच अब सख़्त अलगाव न रखने के विचार को साकार किया जा रहा है। लघु पाठ्यक्रम एक-दूसरे पर आधारित होते हैं, क्रेडिट और कौशल सभी को समझ में आते हैं और नियोक्ता भरोसा कर सकते हैं और देख सकते हैं कि शिक्षार्थी क्या कर सकते हैं।
अगर हम सिर्फ़ प्रशिक्षण सत्रों की गिनती करने के बजाय कौशल, रोज़गार और वेतन वृद्धि पर नज़र रखकर वास्तविक परिणामों पर ध्यान केंद्रित करेंगे, तो भारत की युवा आबादी के लिए बेहतर वेतन, कंपनियों के लिए तत्काल उत्पादकता और एक मजबूत, हरित अर्थव्यवस्था का मार्ग प्रशस्त होगा। ज्ञानार्जन से कमाई तक का रास्ता सिर्फ़ एक नारा नहीं होगा, बल्कि यह एक स्पष्ट, बार-बार दोहराई जाने वाली यात्रा होगी जो लाखों लोग जीवन भर करते हैं।
तालिका 1: माइक्रो और नैनो क्रेडेंशियल्स पर एक नज़र
|
विशेषता |
माइक्रो क्रेडेंशियल |
नैनो क्रेडेंशियल |
|
प्राथमिक उद्देश्य |
कौशल उन्नयन / ब्रिज मॉड्यूल; इन्हें पूर्ण योग्यताओं में संयोजित किया जा सकता है (सैद्धांतिक /व्यावहारिक/ क्षेत्रीय/ओजेटी में 30 घंटे के ब्लॉक) |
अति-विशिष्ट प्रमाण-पत्र उदाहरण के लिए, यदि कोई नया प्रौद्योगिकी उपकरण अपडेट है, तो यह केवल उस तत्व के लिए कौशल सिखाएगा (उदाहरण के लिए, उपकरण/फर्मवेयर/प्रक्रिया परिवर्तन) |
|
आकार (घंटे) |
7.5 / 15 / 22.5 / 30 (7.5 घंटे के गुणक अधिकतम 30 घंटे तक) |
1-4 घंटे, विशेष कौशल पर अधिक ध्यान केंद्रित |
|
एकत्रीकरण क्षमता |
स्टैंडअलोन; कई सूक्ष्म क्रेडेंशियल्स को बड़े मार्गों में एकत्रित कर सकता है |
एक माइक्रो क्रेडेंशियल में एकत्रित (कुल 5-30 घंटे) |
|
वितरण मोड |
ऑनलाइन, मिश्रित, या ऑन-साइट |
ऑनलाइन, मिश्रित, या ऑन-साइट |
|
आकलन |
संक्षिप्त, योग्यता-आधारित मूल्यांकन आवश्यक (स्कोर के साथप्रश्नोत्तरी/प्रैक्टिकल/मौखिक परीक्षा) |
हल्की फुल्की जांच या पूर्णता का प्रमाण; अंतिम मूल्यांकन मूल माइक्रो क्रेडेंशियल में सन्निहित है |
|
एनएसक्यूएफ मार्गदर्शन |
किसी भी एनएसक्यूएफ स्तर के लिए लागू |
कोई अलग स्तर नहीं; मूल माइक्रो क्रेडेंशियल के एनएसक्यूएफ स्तर से ऊपर की ओर मैप किया गया |
|
एनओएस/क्यूपी तालमेल |
एनओएस/क्यूपी प्रदर्शन मानदंडों के अनुसार परिणाम मैप किए गए |
मूल माइक्रो क्रेडेंशियल के समान एनओएस/क्यूपी आइटम का संदर्भ |

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
