जीवन में सृष्टि निर्माण एवं फसल उत्पादन हेतु जल प्रबंधन अत्यंत आवश्यक एक समीक्षा      Publish Date : 22/01/2026

जीवन में सृष्टि निर्माण एवं फसल उत्पादन हेतु जल प्रबंधन अत्यंत आवश्यक एक समीक्षा

                                                                                                                                   प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता

जल का नाम जीवन भी है। चाहे वह समुद्र हो, चाहे ग्लेशियर या नदियाँ हो, संसार के प्रत्येक प्राणी को जल पहुँचाने का प्रायोजन ईश्वर का ही है। जहाँ नदियाँ नहीं जाती हैं वहाँ बादल जल पहुँचाते हैं। ग्लेशियर के रूप में जल को एकत्रित करके रखना, नदियों के द्वारा जन-जन तक उस जल को पहुँचाना ईश्वर की ही सेवा है। आधुनिक युग में सबसे अधिक जल राशि समुद्र के पास ही है, पर वह जल राशि मनुष्य के लिये सीधे किसी काम की नहीं है क्योंकि समुद्र का सम्पूर्ण जल खारा तथा नमकीन है। इसमें भी ईश्वर की महती कृपा ही है।

यदि खारा समुद्र न हो तो वर्षा भी संभव नहीं है। समुद्र का खारा जल तब मीठा हो जाता है, जब वह ऊपर उठकर बादल बनकर बरसता है मिठास तो ऊपर उठने में ही है, उसी प्रकार मानव भी जब तक अपने से ऊपर उठकर बादलों की तरह सबके कल्याण की कामना से काम नहीं करेगा, तब तक वह समाज को मीठा पानी नहीं दे सकेगा। संसार का कोई धर्म ऐसा नहीं है, जो जल के प्रयोग के बिना अपना अनुष्ठान पूर्ण कर ले। प्रत्येक धर्म में या तो जल से पूजा होती है या फिर हम जल से पवित्र होकर ही पूजा करने योग्य होते हैं। हम जीवन में जन्म से लेकर विलय तक जल से जुड़े हुए हैं। हमारा उ‌द्भव भी तब होता है, जब माँ के पेट में जल की एक नियमित मात्रा में गर्भ रहता है। जीवन का अंत होने पर भी जल से ही स्नान कराया जाता है।

आज मनुष्य को लगता है कि जल की आवश्यकता केवल हमें है, उसे अन्य किसी प्राणी की परवाह नहीं है। वन्य प्राणी भी तो अपने प्राणों की रक्षा के लिए जल खोजने के कारण ही हमें दिखायी देते हैं, जल तो सबका सहारा है। जहाँ-तहाँ सड़कों, गलियों में गायें पानी ढूंढ़ रही हैं। जब तक हमारे समाज के अंदर सामूहिक रूप से लोकमंगल की सनातन भावना का उदय नहीं होगा, तब तक हमारा निर्माण ही हमारे विध्वंस का कारण बनेगा। बादलों, नदियों के जल को जब तक हम व्यर्थ होने से नहीं रोकेंगे, तब तक जल संरक्षण मात्र एक वैचारिक चिंतन बनकर रह जायेगा।

समुद्र को नदियों और बादलों के जल की कदापि आवश्यकता नहीं है, वह तो पूर्ण है, तभी तो ईश्वर हम अपूर्ण प्राणियों को आपूर्ति के लिए बादलों के माध्यम से पृथ्वी के प्राण रक्षण के लिये जल भेजता है। हमें तो मात्र उसका सदुपयोग ही करना है। पंचतत्वों में जल हमारे जीवन का आधार है। जल के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है, यदि जल न हो, तो सृष्टि का निर्माण भी सम्भव नहीं होता। जीवन के लिए जल के महत्व को इसी बात से समझा जा सकता है कि बड़ी-बड़ी सभ्यतायें नदियों के तट पर ही बसी हैं। जल की उपयोगिता को ध्यान में रखकर जल का प्रबन्धन एवं संरक्षण अत्यन्त आवश्यक है। ऋग्वेद में जल को अमृत के समतुल्य बताया गया है।

'अप्सु अंतः अमृतं, अप्सु भेषजं, जल का संरक्षण जीवन का संरक्षण है, पृथ्वी पर उपलब्ध होने वाले जल की सीमा तो निर्धारित है, परन्तु, इसके उपयोग की कोई सीमा नहीं है। जल एक चक्रीय संसाधन है, जिसको वैज्ञानिक विधि से साफ कर पुनः प्रयोग में लाया जा सकता है। पृथ्वी पर जल वर्षा तथा बर्फ से प्राप्त होता है। यदि इसका युक्तिसंगत उपयोग किया जाए तो उसकी कमी नहीं हो सकती है। जल प्रबंधन का मुख्य उद्देश्य जल स्रोतों का अधिकतम उपयोग कर कृषि एवं खाद्यान्न को लक्ष्यानुकूल बढ़ाना है। जल संचय का सिद्धांत यह है कि वर्षा के जल को स्थानीय आवश्यकताओं और भौगोलिक स्थितियों की आवश्यकतानुसार संचित किया जाए। इस क्रम में भूजल का भंडार भी भरता है। देश के लगभग प्रत्येक बड़े शहर में भूमिगत जल का स्तर लगातार कम होता रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि किसी भी शहर में पानी की समुचित आपूर्ति की सुविधा नहीं है। अतः लोग अपनी शेष आवश्यकताओं के लिए भू-जल पर ही निर्भर रहते हैं। इन परिस्थितियों में जल प्रबन्धन हमारा प्राथमिक उद्देश्य बन जाता है।

जल का ग्रामीण और शहरी जीवन दोनों के लिए ही समान रूप में महत्व है, क्योंकि जल जीवन है। जल के बिनामानव की कल्पना नहीं की जा सकती है। शहरी जीवन में जल की उपादेयता जहाँ पेयजल तथा दैनिक उपभोग तक सीमित है, वहीं ग्रामीण जीवन में इसका महत्व पेयजल के साथ-साथ कृषि तथा बागवानी और पशुधन आदि के लिए भी है। दूसरे शब्दों में कृषि क्षेत्र जल का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है। यह तथ्य किसी में छिपा नहीं है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का मेरुदण्ड कृषि ही है और आज भी लगभग एक तिहाई जलसंख्या कृषि पर निर्भर है। इसलिए कृषि के जल का महत्व सर्वविदित है। घरेलू, कृषि एवं औद्योगिक क्षेत्रों में प्रति वर्ष कुल 829 घनमीटर पानी का उपयोग किया जाता है। वर्ष 2025 तक इस मात्रा में 40 प्रतिशत बढ़ोत्तरी का अनुमान है। देश में प्रतिवर्ष औसतन 4,000 अरब घन मीटर वर्षा का जल नदियों में पहुँचता है। परन्तु भंडारण और संसाधनों की कमी के करण 18 प्रतिशत जल ही उपयोग हो पाता है।

जल संकट विश्व व्यापक समस्या है। भारत के अनेक भागों में पानी की भीषण कमी, खेती योग्य भूमि की कमी, प्राकृतिक निवास संस्थानों के विनाश, पर्यावरण में असंतुलन तथा बड़े पैमाने पर प्रदूषण से सार्वजनिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा है तथा आर्थिक एवं सामाजिक प्रक्रिया खतरे में पड़ गयी है। देश के 12 प्रमुख शहरों को प्रति 14,000 करोड़ लीटर पानी की आवश्यकता पड़ती है, जबकि उन्हें केवल 10,000 लीटर पानी ही मिल पाता है अर्थात मांग और आपूर्ति का अंतर 400 करोड़ लीटर है, जो मुंबई की प्रतिदिन की आवश्यकता के बराबर है।

वर्षा तथा नदियों के ड्रेनेज प्रणाली द्वारा 432 अरब घन मीटर भूजल का पुनर्भरण होता है जिसमें 395 अरब घन मीटर जल ही उपयोग योग्य होता है। इस उपयोग लायक जल का 82 प्रतिशत सिंचाई और कृषि कार्यों में उपयोग होता है, जबकि 18 प्रतिशत ही घरेलू और औद्योगिक उपयोग के लिए बचता है।

जल प्रबंधन

किसी क्षेत्र के जल प्रबंधन का स्वरूप उस क्षेत्र की प्रकृति, जल वैज्ञानिक विशेषताओं एवं मानवीय उपयोग के परिप्रेक्ष्य में किया जाना चाहिए तथा प्रबंधन कार्यक्रम एक निश्चित अवधि कम से कम 25 वर्षीय योजना को लक्षित कर बनाया जाना चाहिए। बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकता पूर्ति हेतु अतिरिक्त जल की आवश्यकता स्वाभाविक है। नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों में जल की मांग के स्वरूप में थोड़े में अंतरों के बावजूद जल उपयोग की प्रकृति एक समान पायी जाती है। ग्रीष्म ऋतु मेंग्रामीण एवं शहरी दोनों ही क्षेत्रों में जल का संकट बढ़ जाता है। अतः यह आवश्यक है कि जिले में जल संसाधन की सतत आपूर्ति बनी रहे। किंतु सतही जल-स्रोत नष्ट नहीं होना चाहिए। यह कार्य उचित जल प्रबंधन एवं उपयोग के स्वरूप में नियंत्रण कर भविष्य के लिए संरक्षित करके किया जा सकता है। यह कार्यक्रम निम्नलिखित विधियों द्वारा संभव हैः

वर्षा का जल संचयन

वर्षा जल के संचयन द्वारा जल की आपूर्ति को सुनिश्चित किया जा सकता है। इन जल विभाजकों के क्षेत्र में तालाबों के निर्माण द्वारा जल संचयन का कार्य किया जा सकता है। ग्रामीण स्तर पर मिट्टी के छोटे-छोटे बांधों के निर्माण द्वारा व्यापक पैमानें पर जल का संचयन किया जा सकता है। जल विभाजक क्षेत्रों में जल एकत्रित करने की इन विधियों को स्वीकार कर कार्यरूप में परिणित कर किया जाए तो मानसून की अवधि में बाढ़ को रोका जा सकेगा, साथ ही भूमिगत जल के स्तर में वृद्धि होगी तथा मृदा अपरदन की तीव्रता में भी कमी आएगी। धरातलीय प्रवणता अधिक होने तथा वृक्षों के अभाव में जल प्रवाह तीव्र रहता है, जिसके कारण तीव्र कटाव के परिदृश्य विकसित हुए मिलते हैं। सघन वृक्षारोपण यदि समोच्य रेखाओं के अनुरूप किया जाए तो वृक्षों की जड़ों द्वारा बनाये गये रन्ध्रों से अवशोषित जल भूमिगत जल की मात्रा में वृद्धि भी करेगा और इस तरह वन, मृदा अपरदन के नियंत्रण में भी सहायक होंगे।

तालाबों की जलधारण क्षमता में वृद्धि

धरातलीय विषमताओं के कारण छोटे-बड़े तालाबों का निर्माण सरल है। तालाबों की साफ-सफाई एवं गहरीकरण क्रिया द्वारा इस क्षमता को दोगुना कर लघु सिंचाई क्षेत्र पर जल की आपूर्ति को सुरक्षित किया जा सकता है। कुछ तालाब या तो नष्ट हो चुके हैं अथवा नष्ट होने की स्थित में हैं। अतः कुछ तालाबों के जल की निकासी पर कृषि कार्य किया जाने लगा है। परन्तु विलुप्त तालाबों के संरक्षण की अत्यंत आवश्यकता है।

जल उपयोग हेतु जागरुकता

जल संसाधन का आवश्यकतानुसार उपयोग कर संरक्षित किया जाना चाहिए। अनुकूलतम उपयोग के लिए कृषकों को प्रशिक्षित एवं जागरुक बनाना आवश्यक है, जिससे वे निश्चित एवं वांछित मात्रा में अधिक जल का प्रयोग न करें। प्रायः यह देखा गया है कि जिन फसलों में एक बार सिंचाई की आवश्यकता है, उन्हें तीन बार पानी दिया जाता है। इस प्रक्रिया में जल संसाधन का दुरुपयोग होता है। अतः जल संसाधन संरक्षण के लिए कृषकों को जल के अनुकूलतम उपयोग हेतु जागरुक किया जाना चाहिए। यह कार्य उन स्थानों पर भी वांछित है, जहाँ जल का उपयोग अन्य कार्यों में किया जाता है। कृषि तकनीक में परिवर्तन, कण्टूर के अनुरूप जुताई, विशिष्ट फसलों के उत्पादन तथा वर्षा के दिनों में अधिक पानी में उत्पादित की जाने वाली फसलें धान एवं सिंघाड़ा की खेती और मत्स्य पालन आदि तथा रबी के फसलों में कम पानी की आवश्यकता वाली फसलें जैसे चना, मटर, जौ सदृश फसलों के अत्याधिक प्रचार-प्रसार द्वारा जल संवर्धन किया जाना चाहिए।

जल स्रोतों के पास ट्यूबवेल आदि के निर्माण पर रोक

तालाब या नदी के समीप व्यक्तिगत ट्यूबवेल आदि का निर्माण कर सिंचाई कार्य सम्पादित किया जाता है, जिसके कारण तालाब और नदी सूखने लगती है। अतः सार्वजनिक जल स्रोतों के समीप ऐसे व्यक्तिगत निर्माण पर रोक अत्यन्त आवश्यक है।

जलोपचार अत्यंत आवश्यक

जल के साथ कैल्शियम, अमोनिया, नाइट्रोजन, मैग्नीशियम जैसे कठोर तत्व एवं जैविक तत्व जल को प्रदूषित करते हैं। जल-प्रदूषण का प्रभाव प्रत्येक उन क्षेत्रों पर होता है, जहाँ उसका उपयोग किया जाता है। नगरीय क्षेत्र, जल प्रदूषण से अधिक प्रभावित होते हैं। अतः उपयोग के पूर्व वांछित जलोपचार अत्यंत आवश्यक है। जलोपचार के उपरान्त जल को एक कार्य से दूसरे कार्य में सुगमता से प्रयोग किया जा सकता है।

सिंचाई क्षमता का सृजन

वर्तमान में उपलब्ध जल स्रोत के उपयोग करने की क्षमता सम्पूर्ण कृषि के लिए पर्याप्त नहीं है। अतः सिंचाई एवं जल संसाधनों का अधिक सीमा तक प्रयोग करना जल संसाधन प्रबंधन का लक्ष्य होता है। भूगत, भूजल एवं झरना जल सिंचाई के लिये प्रयुक्त हो सकता है। बाढ़ वाली नदियों का जल शुष्क नदियों में नहर को अन्तरण कर उपलब्ध जल का अधिकाधिक उपयोग संभव है। सिंचाई क्षमता का उपयोग न होने की बढ़ती प्रवृत्ति एक बड़ी चिंता का विषय है।

क्षेत्र विकास कार्यक्रम

कमान क्षेत्र विकास कार्यक्रम, बृहद सिंचाई परियोजनाओं में सृजित की जाने वाली सिंचाई क्षमता का प्रयोग न होने की समस्या के लिये क्रियान्वित किए गए हैं। इसके अंतर्गत नवीन क्षमता के सृजन प्रयोग किया जाता है।

सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण पर शोध

सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण की दिशा में त्वरित एवं उद्देश्यपूर्ण शोध हेतु विभिन्न संस्थाओं के द्वारा प्रयास किए जाते हैं।

भूगत जल सिंचाई

भूगत जल के निरंतर प्रयोग से जल स्तर में गिरावट आ रही है, जिसका समय रहते निराकरण अत्यन्त आवश्यक है। लघु सिंचाई योजनाओं के अंतर्गत अधिकतर भूगत जल क्षमता का उपयोग किया जाता है। इन योजनाओं में जल के भण्डारण एवं लम्बी दूरी तक जल ले जाने के लिए कोई निवेश की आवश्यकता नहीं होती है। किसानों को सिंचाई के लिए जल समय पर उपलब्ध हो जाता है, जबकि बृहद मध्यम परियोजनाओं में ऐसा नहीं होता है। जल जमाव तथा वाष्पीकरण की समस्याएं जो प्रायः भूतल सिंचाई से संबंधित होती हैं, कुछ सिंचाई परियोजनाओं के क्षेत्र में बहुत कम है। जैसे-जैसे विभिन्न जल संसाधनों के उपयोग की वृद्धि हो रही है। उसी प्रकार कृषकों के सम्मुख नवीनतम समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। जल संसाधनों के चरम उपयोग के लिए कृषक. वैज्ञानिकों, अभियंताओं और योजनाकारों के समन्वित प्रयास की आवश्यकता होती है।

पेयजल का प्रबंधन

विश्व में पेयजल की व्यवस्था जन-जन तक पहुँचाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। पृथ्वी का लगभग तीन चौथाई भाग पानी से घिरा हुआ है, फिर भी संसार पीने के पानी की समस्या से ग्रस्त है। अतः विभिन्न सरकारों और देशों ने पेय जल की समस्या को हल करने का प्रयास किया है।

जल संरक्षण हेतु उपाय

जल संरक्षण निम्न प्रकार से किया जा सकता है:

वर्षा जल का संचय

जल संरक्षण हेतु वर्षा के जल का भंडारण अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए खेतों में मेड़ बनायी जायें। खेतों को खुला न छोड़ा जाए तथा जल-चक्र नियंत्रित करने के लिए सधन वन लगाए जाए।

पानी का दुरुपयोग अनावश्यक

जल के महत्व एवं संरक्षण की आवश्यकता को जन-चेतना के रूप में प्रसारित किया जाना चाहिए जिससे वे जल का दुरुपयोग न करें।

जल शोषण का प्रबंध

पृथ्वी के धरातल पर जल को अधिक देर तक रोके रखने के उपाय किए जाने चाहिए जिससे जल भूगर्भ में संचित हो सके। वनों की भूमि अधिक पानी सोखती है, अतः वर्षा के जल का बहाव वनों की ओर मोड़ना अत्यत्त लाभप्रद होता है। चरागाह, दलदली भूमि में जल का शोषण अधिक होता है।

खेतों में पानी का दुरुपयोग रोकना

किस भूमि में एवं किस फसल को कितने पानी की आवश्यकता है, इस संबंध में कृषक को अत्यत जानकारी होना अत्यंत आवश्यक है जिससे पानी का दुरुपयोग न हो सके।

कुओं से आवश्यक मात्रा में जल का उपयोग

कुओं से आवश्यक मात्रा में ही जल सिंचाई के हेतु निकाला जाना चाहिए अन्यथा इनके सूखने का खतरा रहता है।

भूगर्भ जल का सीमित उपयोग

ट्यूबवेलों की संख्या नियंत्रित होनी चाहिए क्योंकि भूगर्भमें जल की मात्रा सीमित होती है।

खेतों की नालियों में सुधार

खेतों की नालियों को सामूहिक सहायता से पक्का करना चाहिए, जिससे अवस्ववण से होने वाली हानियों को रोका जा सके।

तालाबों को पक्का बनाना

तलाबों को गहरा करके उन्हें पक्का अवश्य बनाना चाहिए, जिससे अधिक जल का संचय हो सके।

जल का शुद्धिकरण

जल-प्रदूषण के कारणों का निराकरण अवश्य किया जाना चाहिए तथा पेयजल शुद्धिकरण का विशेष प्रबंध करना चाहिए।

सिंचाई विधियों का नियंत्रण

स्प्रिंकलर प्रभावी सिंचाई का माध्यम है। इससे पानी की बचत की जा सकती है तथा ऊँची-नीची भूमि पर भी सिंचाई की जा सकती है। यद्यपि इसमें पूँजी अधिक लगती है परन्तु वाष्पीकरण तथा निस्तवरण द्वारा होनी वाली पानी की हानि को रोका जा सकता है।

उद्योगों में पानी के उपयोग पर नियंत्रण

उद्योगों में पानी की अधिक आवश्यकता के कारण अधिक मांग होती है। इसे कम करने से निम्नलिखित दो लाभ हो सकते हैं:

(अ) इसमें उद्योग के अन्य खण्डों की पानी की मांग को पूरा किया जा सकता है।

(ब) इन उद्योगें द्वारा नदियों एवं नालों में छोड़े गये दूषित जल की मात्रा कम हो जाएगी।

अधिकांश उद्योगों में जल का उपयोग शीतलन हेतु किया जाता है। अतः इस कार्य के लिये स्वच्छ और शुद्ध जल का उपयोग करना आवश्यक नहीं है। इस कार्य के लिए पुनः शोधित जल का उपयोग किया जा सकता है।

अतः उपरोक्त दी गयी विधियों का नियमित रूप से पालन करने से जल का प्रबंधन किया जा सकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।