जलवायु परिवर्तन एवं मृदा में कार्बन संरक्षण      Publish Date : 16/01/2026

          जलवायु परिवर्तन एवं मृदा में कार्बन संरक्षण

                                                                                                                                                                        प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

जलवायु परिवर्तन एक गंभीर वैश्विक पर्यावरणीय चिंता का विषय बनता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में देखा गया है जिससे मानव तथा पर्यावरण दोनों ही प्रभावित हुए हैं। वायुमंडलीय कार्बन डाई ऑक्साइड में उपस्थित कार्बन फसलों की वृद्धि तथा उत्पादकता को बढ़ावा देता है। वायुमंडलीय तापमान में वृद्धि, फसलों के परिपक्व होने की अवधि को कम कर सकती है, प्रकाश-संश्लेषण को प्रभावित कर सकती है तथा मृदा में उपस्थित सूक्ष्मजीवों की संख्या को प्रभावित कर मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता को भी प्रभावित कर सकती है। मृदा कार्बन का पौधों की वृद्धि तथा कृषि उत्पादकता मे महत्वपूर्ण योगदान है। भारत में अधिकांश कृषि योग्य मृदा में कार्बन जीवांश की मात्रा में कमी हो रही है। इसके अलावा, जलवायु में परिवर्तन, मिट्टी के कटाव को बढ़ा रहे है, तथा फसल चक्र में परिवर्तन कर रहे हैं और इस प्रकार, फसल उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है। इसलिए, मृदा को और अधिक क्षरण से बचाने तथा स्वस्थ बनाये रखने के लिए मृदा कार्बन का संरक्षण करना अति आवश्यक हो गया है।

क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर और कार्बन स्थिरीकरण

जलवायु स्मार्ट कृषि तकनीक में मल्चिंग, फसल अवशेषों को शामिल करना, अन्तः फसली खेती, संरक्षण कृषि, फसल चक्र, एकीकृत फसल-पशुधन प्रबंधन, कृषि वानिकी, बेहतर चराई और बेहतर जल प्रबंधन शामिल हैं। इन तकनीकों के माध्यम से क्षरण को कम करके, मृदा जीवांश के ऑक्सीकरण को कम करके एवं कार्बन इनपुट प्रदान करके मृदा कार्बन के नुकसान को कम किया जा सकता है। मृदा जैविक और उनकी पारिस्थितिक प्रक्रियाओं की बहाली कार्बनिक पदार्थों को कार्बन अंशों और स्थिर कार्बनिक खनिज अवयवों में तोड़ देती है। इसके अलावा, इस तरह की तकनीकों के उपयोग द्वारा मृदा की उर्वरता और उत्पादकता में सुधार होता है। पोषक तत्वों की उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए पोषक तत्व प्रबंधन तकनीकों का पालन किया जाना चाहिए जैसे कि, उर्वरक समेकित पोषक तत्त्वों का संतुलित उपयोग, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटेशियम उर्वरकों का संतुलन, फॉस्फोरस उर्वरकों का जड़ क्षेत्र में प्रयोग, वाष्पीकरण और लीचिंग के माध्यम से नुकसान को रोकने के लिए नाइट्रिफिकेशन अवरोधकों का उपयोग इत्यादि। कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभाव से निपटने के लिए मिट्टी, पानी और जैव विविधता जैसे प्राकृतिक संसाधनों के सावधानीपूर्वक प्रबंधन की आवश्यकता होगी। कृषि जलवायु परिवर्तन का सबसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है। मृदा कार्बन स्थिरीकरणद्वारा, जलवायु अनुकूलन और शमन दोनों से निपटा जा सकता है। औद्योगिक क्रांति के बाद से वार्षिक वैश्विक ग्रीनहाउस गैस (जीएचजी) उत्सर्जन में वृद्धि जारी है। मानवजनित जीएचजी उत्सर्जन में जनसंख्या वृद्धि, आर्थिक विकास, जीवाश्म ईंधन की अत्यधिक खपत शामिल हैं। वर्ष 2015 तक औद्योगिक क्रांति की शुरुआत के बाद से मानवजनित कार्बन डाइऑक्साइड, उत्सर्जन में पूर्व-औद्योगिक युग की तुलना के सापेक्ष 144% की वृद्धि हुई है। इसके साथ-साथ वायुमंडल में मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड की सांद्रता में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिसके फलस्वरूप दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन ने प्राकृतिक और मानव प्रणालियों पर दुष्प्रभाव डाला है। जलवायु, पौधों के उत्पादन, मिट्टी एवं पर्यावरण की गुणवत्ता से जुड़े कई चक्रों को प्रभावित करने वाले प्रमुख तत्वों में से एक है। मानव गतिविधि में वृद्धि के कारण वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की दर लगातार बढ़ती जा रही है। जलवायु परिस्थितियों में परिवर्तन; जैसे तापमान, कार्बन डाइऑक्साइड और वर्षा) पौधों के पोषण को कई तरह से प्रभावित करते हैं जिसमें मृदा अपघटन, निछालन; लीचिंग एवं पोषक तत्वों की कमी मुख्य है। मृदा कार्बन स्थिरीकरण न केवल जलवायु परिवर्तन बल्कि पौधों के पोषक तत्वों की पहुँच और मिट्टी की उर्वरता उर्वरता में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है बल्कि पौधों के माध्यम से वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड को मृदा में समाहित भी करता है। इन बेहतर प्रबंधन तकनीकों को अपनाकर अनुपयोगी भूमि और पारिस्थितिक तंत्र की बहाली करके मृदा कार्बन को बढ़ाया जा सकता है और मिट्टी की गुणवत्ता और स्वास्थ्य में सुधार किया जा सकता है। मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों में सुधार से मिट्टी की जल धारण क्षमता में वृद्धि होती है जो रूक-रूक कर होने वाली शुष्कता से निपटने में मदद करती है, दूसरी ओर यह पोषक तत्वों को अधिक संतुलित तरीके से जारी करती है जिससे अंततः पोषक तत्व उपयोग दक्षता में सुधार होता है। संरक्षण कृषि, अंतः फसल, फसल चक्रण, उन्नत किस्मों, समेकित पोषक तत्व प्रबंध, मिट्टी और जल संरक्षण जैसे जलवायु स्मार्ट कृषि पद्धतियों को अपनाने से मिट्टी में कार्बन स्थिरीकरण में बढ़ोत्तरी संभव है। जलवायु परिवर्तन के कारण पशुधन के क्षेत्र में भी उत्पादकता, भोजन और पशुधन के चारे की उपज में और जंतुओं की सेहत में गिरावट होगी। पौधों एवं जंतुओं पर आधारित बीमारियों एवं संक्रमण के बढ़ने की भी संभावना रहेगी। समुद्रों पर निर्भर समुदायों को भी जीविकोपार्जन में अस्थिरता का सामना करना पड़ेगा। यह अनुमान लगाया गया है कि बढ़ते हुए तापमान के कारण वर्ष 2050 तक मछलियों को पकड़ने में 40 प्रतिशत तक की कमी आ जाएगी। इससे साफ हैकि हमें खाद्य की आपूर्ति में भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है चाहे वह फसल हो, मांस हो या मछली। इसके प्रभाव से लाखों छोटे और लघु किसानों की आय पर भी प्रभाव पड़ने की संभावना है। छोटे और लघु किसानों की आय पर दुष्प्रभाव पड़ने से गरीबी के स्तर में भी वृद्धि हो सकती है। खाद्य और कृषि संगठन ने अनुमान लगाया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हमें 122 करोड़ लोग गहन गरीबी में देखने को मिल सकते हैं। भारत के आर्थिक सर्वेक्षण ने खेती से होने वाली आय में कमी होने की बात को दोहराया है। इसका नतीजा यह होगा कि उपभोक्ता की क्रय शक्ति कम होगी और भोजन के लोगों तक पहुंचने में समझौता करना पड़ेगा। साथ ही साथ, हमें पोषण में गिरावट भी देखने को मिल सकती है, क्योंकि भोजन तक पहुँच सीमित हो जाएगी। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव मांग और आपूर्ति दोनों पर महसूस किए जाएंगे।

                                                     

क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर तीन आपस में जुड़ी हुई चुनौतियों से निबटने की कोशिश करती है: 1) उत्पादकता और आय बढ़ाना, 2) जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होना और 3) जलवायु परिवर्तन को कम करने में योगदान देना। इसका अर्थ है कि हमें खेतों में उपयोग की जाने वाली चीजों को लेकर ज्यादा ध्यान देना होगा। उदाहरण के लिए सिंचाई को ही लें, जल के उचित इस्तेमाल के लिए सूक्ष्म-जल सिंचाई पद्धति को लोकप्रिय बनाना होगा। खेतों के स्तर तक प्रभावी पहुँच, विस्तार और तकनीकी सहायता शायद सबसे जरूरी लिंक हैं। जलवायु स्मार्ट कृषि के तरीकों को अपनाने के लिए किसानों को उनकी भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप तकनीकी और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की जरूरत होगी। देश के स्तर पर चलाए जा रहे कार्यक्रमों को भी वैश्विक स्तर पर ले जाना होगा उदाहरण के लिए जीरो बजट खेती को भारत में कुछ बढ़ावा मिल रहा है। यह एक इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम (समेकित कृषि प्रणाली) है जो रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक से दूर रह कर स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री का समर्थन करती है। बुनियादी रूप से टिकाऊ प्रकृति की होने के कारण यह तरीका खेती में जलवायु परिवर्तन को झेलने की क्षमता बढ़ाने और जलवायु परिवर्तन को कम करने में काफी कारगर है। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव गंभीर होंगे। इनको कम करने की रणनीति में वैश्विक साझीदारी और जानकारी को साझा करना सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का पता लगाने को, खासतौर पर क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय स्तर पर, काफी बढ़ावा देना होगा। इसके साथ, किसानों को तकनीकी और आर्थिक सहयोग दिया जाना जरूरी है ताकि, वे जलवायु परिवर्तन को झेल जाने वाले और योग्य खेत बना सकें। यह शायद सबसे खास बिन्दु है। बहुद्देशीय कर्ज देने वाले संस्थान, जैसे विश्व बैंकऔर एशियाई विकास बैंक (ए.डी.बी.) आदि को सरकारों, नागरिक संस्थाओं और निजी क्षेत्र के साथ मिलकर काम करना होगा, ताकि जलवायु परिवर्तन के अनुकूल रणनीतियों को खेतों के स्तर तक पहुँचाया जा सके। कृषकों को भी खेतों में निम्नलिखित बिन्दुओं को ध्यान रखने की आवश्यकता हैः

  • खेती में फसल चक्र का अनुपालन जिससे दलहनी फसलों का समावेश हो सके।
  • फसल अवशेषों का पुनर्चक्रण जिससे मृदा कार्बन को संरक्षित किया जा सके।
  • कम पानी खपत वाली किस्मों का चयन
  • अल्प-अवधि वाली फसलों का चयन
  • सिंचाई जल का समुचित उपयोग एवं कम पानी वाली विधियों जैसे टपक सिचाई, फौव्वारा सिचाई, फसल अवधि में क्रान्तिक अवस्था पर सिंचाई एवं अन्तः फसली खेती को अपनाना।
  • खर-पतवार का रासायनिक विधि से नियंत्रण
  • जैविक पदार्थों की कम्पोस्टिंग एवं समेकित पोषक तत्व प्रबंध को अपनाना
  • जलवायु परिवर्तन के अनुसार बुवाई की विधियों को संयोजित करना।

उपरोक्त विधियों को अपनाकर किसानों के स्तर पर भी जलवायु परिवर्तन से खेती में सुधार संभव है। मृदा की उर्वरता एवं फसल उत्पादकता में भी उन्नत तकनीकों के अपनाने से बढ़ोत्तरी संभव है। आवश्यकता इस बात की है कि हमे समय के साथ चलना होगा एवं उन्नत तकनीकों के विकास का भी साथ में समायोजन करना होगा।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।