
जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक चुनौती और उसका समाधान Publish Date : 24/12/2025
जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक चुनौती और उसका समाधान
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता
एक कहावत के अनुसार जलवायु वह है, जिसकी आप उम्मीद करते हैं और मौसम वह है, जो कि हमें मिलता है। हम प्रायः 'जलवायु' एवं 'मौसम' शब्द में अन्तर नहीं कर पाते हैं। मौसम वह है, जो रोज रात को टीवी पर दर्शाया जाता है। जैसे विभिन्न स्थानों पर अधिकतम एवं न्यूनतम तापमान, बादलों एवं वायु की स्थिति, वर्षा का पूर्वानुमान, आर्द्रता आदि। निर्धारित समय पर किसी स्थान पर बाह्य वातावरणीय परिस्थितियों में होने वाला परिवर्तन, मौसम कहलाता है।
जबकि जलवायु शब्द, किसी स्थान पर विगत कई वर्षों के अन्तराल में वहाँ की मौसम की स्थिति को बताता है। जलवायु परिवर्तन ऐसे दो शब्द हैं, जिनके बारे में आप इन दिनों अक्सर सुन रहे होंगे। आखिर इस विषय पर इतनी चर्चा क्यों हो रही है? यह कुछ ऐसा विषय नहीं है, जिसके लिये मौसम वैज्ञानिकों को चिन्ता करनी चाहिए? यह किस प्रकार से हमारे और आपके लिये चिन्ता का विषय है? आइए, हम इनमें से प्रत्येक शब्द को समझते हुए आरम्भ करते हैं। जलवायु वैज्ञानिक, किसी स्थान विशेष की जलवायु का पता लगाने के लिये कम से कम 30 वर्षों के मौसम की जानकारी को आवश्यक मानते हैं। जलवायु से हमें कोई स्थान कैसा है, यह पता चलता है।
क्या है जलवायु परिवर्तन?

जलवायु का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक अभी भी इस तर्क-वितर्क में उलझे हैं कि पृथ्वी किस दर से गर्म हो रही है तथा यह कितनी अधिक गर्म होगी। परन्तु वे इस बात से सहमत हैं कि वास्तव में पृथ्वी गर्म हो रही है। इस बात की पुष्टि भी हुई है कि आज विश्व विगत 2,000 वर्षों के किसी भी समय की अपेक्षा ज्यादा गर्म है। 20वीं शताब्दी के दौरान वैश्विक तापमान लगभग 0.60°C तक बढ़ा है। मौसम में परिवर्तन थोड़े समय में ही हो सकते हैं। एक घंटे के लिये बरसात हो सकती है, और इसके बाद तेज धूप भी निकल सकती है। जलवायु में भी परिवर्तन हो सकता है। जलवायु परिवर्तन प्राकृतिक है, एवं पृथ्वी की जलवायु में परिवर्तन होता रहा है।
अतीत के हिमयुग इस जलवायु परिवर्तन का ही एक उदाहरण हैं। अतीत में ऐसे परिवर्तन होने में बहुत लम्बा समय लगा, परन्तु वर्तमान में परिवर्तनों की दर काफी तेज है, और इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप पृथ्वी तेजी से गर्म हो रही है।
जलवायु परिवर्तन के कारण
ग्रीनहाउस गैसें
पृथ्वी के चारों ओर ग्रीनहाउस गैस की एक परत बनी हुई है, इस परत में मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें शामिल हैं।
- ग्रीनहाउस गैसों की यह परत पृथ्वी की सतह पर तापमान संतुलन को बनाए रखने में आवश्यक है और विश्लेषकों के अनुसार, यदि यह परत नहीं होगी तो पृथ्वी का तापमान काफी कम हो जाएगा।
- आधुनिक युग में जैसे-जैसे मानवीय गतिविधियाँ बढ़ रही हैं. वैसे-वैसे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी वृद्धि हो रही है और जिसके कारण वैश्विक तापमान में वृद्धि हो रही है।
मुख्य ग्रीनहाउस गैसें
कार्बन डाइऑक्साइड- इसे सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रीनहाउस गैस माना जाता है और यह प्राकृतिक व मानवीय दोनों ही कारणों से उत्सर्जित होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, कार्बन डाइऑक्साइड का सबसे अधिक उत्सर्जन ऊर्जा हेतु जीवाश्म ईंधन को जलाने से होता है। आँकड़े बताते हैं कि औद्योगिक क्रांति के पश्चात् वैश्विक स्तर पर कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली है।
मीथेन- जैव पदार्थों का अपघटन मीथेन का एक बड़ा स्रोत है। उल्लेखनीय है कि मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड से अधिक प्रभावी ग्रीनहाउस गैस है, परंतु वातावरण में इसकी मात्रा कार्बन डाइऑक्साइड की अपेक्षा कम है।
क्लोरोफ्लोरोकार्बन- इसका प्रयोग मुख्यतः रेफ्रिजरेटर और एयर कंडीशनर आदि में प्रमुखता से किया जाता है एवं ओज़ोन परत पर इसका काफी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
क्या मानव जलवायु में परिवर्तन ला सकते हैं?
एक समय में सभी जलवायु परिवर्तन प्राकृतिक हुआ करते थे। लगभग 220 वर्षों पहले औद्योगिक क्रान्ति आई जिसके फलस्वरूप मशीनों द्वारा भारी मात्रा में वस्तुओं का उत्पादन किया जाने लगा। मशीनों को चलाने के लिये ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसके लिए ज्यादातर ऊर्जा कोयले एवं तेल जैसे ईंधनों से प्राप्त होती है जिन्हें 'जीवाश्म ईंधन' कहते हैं। जब इनजीवाश्म ईंधनों को जलाया जाता है तब कार्बन डाइऑक्साइड गैस उत्सर्जित होती है। औद्योगिकीकरण के साथ-साथ कार्बन डाइऑक्साइड, मिथेन, ओजोन, क्लोरोफ्लोरो कार्बन, नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसों का उत्सर्जन भी बढ़ा है। इन गैसों को 'ग्रीनहाउस गैस' कहते हैं।
पिछले 200 वर्षों के दौरान हमारी गतिविधियों के कारण वायुमण्डल में ग्रीनहाउस गैसों की विशाल मात्रा उत्सर्जित हुई है। अब यह सुस्पष्ट है कि आज के समय में मानव ही जलवायु परिवर्तन के लिये उत्तरदायी है।
ग्रीनहाउस गैसों एवं जलवायु परिवर्तन में क्या सम्बन्ध है?
जैसा कि हम जानते हैं कि पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन सम्भव है। पृथ्वी की सतह पर अनुकूल तापमान का होना ही जीवन की उपस्थिति का एक महत्त्वपूर्ण कारक हैं। पृथ्वी का औसत सतही तापमान 14.4°सें है। शुक्र ग्रह का औसत सतही तापमान 449 सें तथा मंगल ग्रह का-55°सें है। ये हमारे सबसे नजदीकी पड़ोसी ग्रह हैं। वायुमण्डल में ग्रीन हाउस गैसों की उपस्थिति के कारण ही पृथ्वी का तापमान जीवन के लिये अनुकूल है।
ये वायु सूर्य के प्रकाश से निकली कुछ ऊष्मा को अवशोषित करती हैं एवं इन्हें पृथ्वी की सतह के करीब रोककर रखती हैं। यह प्राकृतिक प्रक्रिया 'ग्रीनहाउस प्रभाव' कहलाती हैं। ग्रीनहाउस गैसों के बिना पृथ्वी पर, दिन झुलसा देने वाले गर्म व रातें जमा देने वाली सर्द होतीं। परन्तु ग्रीनहाउस गैसों की बहुत अधिक मात्रा भी समस्या पैदा कर सकती है। जैसे-जैसे इनकी मात्रा बढ़ने लगती है, पृथ्वी की सतह पर ऊष्मा की मात्रा में भी वृद्धि होने लगती है जिसके परिणामस्वरूप 'ग्लोबल वार्मिंग होती है। पृथ्वी के इस प्रकार गर्म होने के कारण जलवायु में परिवर्तन होता है।
कार्बन डाइऑक्साइड एवं जलवायु परिवर्तन
कार्बन डाइऑक्साइड एक प्रदूषक एवं वायुमण्डल का प्राकृतिक भाग दोनों ही है। वर्तमान में वायु में में प्रति लाख अणुओं में से 380 अणु कार्बन डाइऑक्साइड के हैं (380 पीपीएम)। इसके उत्सर्जन की मात्रा प्रतिवर्ष एक प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। औद्योगिक क्रान्ति से पहले कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा 270-280 पीपीएम थी। वर्तमान ग्लोबल वार्मिंग के लिये मानवीय गतिविधियों के कारण उत्पन्न ग्रीनहाउस गैसों में से 55 प्रतिशत से भी अधिक के लिये कार्बन डाइऑक्साइड उत्तरदायी है। कार्बन डाइऑक्साइड के अणुओं का जीवनकाल लम्बा होता है एवं ये वायुमण्डल में लगभग 200 वर्षों तक रहते हैं।
विश्व में बढ़ती गर्मी का क्या प्रभाव होगा?
तापमान में एक छोटे से परिवर्तन से भी बड़ा प्रभाव हो सकता है। जलवायु परिवर्तन, पृथ्वी की जलवायु में परिवर्तन लाने से कहीं अधिक परिवर्तन लाएगा। पृथ्वी पर जीवन के प्रत्येक पहलू पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसका प्रभाव पड़ेगा।
प्रतिकूल मौसम
चक्रवात, तूफान एवं बाढ़ की समस्याएँ बढ़ जाएँगी। अधिकतर स्थान बहुत गर्म, कुछ स्थान सूखाग्रस्त, जबकि अन्य अत्यधिक वर्षा से प्रभावित हो जाएँगे। हम सभी काफी उग्र मौसमीय घटनाओं का अनुभव करेंगे जैसे कि लू, सूखा, बाढ़ (अधिक वर्षा एवं हिमनदों के पिघलने के कारण) एवं तीव्र तूफानी हवाएँ इत्यादि।
पिघलती समुद्री बर्फ, घटते हिमनद
हिमनद एवं बर्फीली चोटियाँ जलवायु परिवर्तन के संवेदनशील सूचक हैं। पर्वतीय हिमनद पहले से ही सिकुड़ रहे हैं। आर्कटिक की समुद्री बर्फ, विशेष रूप से पिछली कुछ गर्मियों से, काफी पतली होती जा रही है। अगस्त 2,000 में उत्तरी ध्रुव पर बिल्कुल बर्फ नहीं थी बल्कि सिर्फ पानी-ही-पानी था।
समुद्री जलस्तर में वृद्धि
नदियों का डेल्टा क्षेत्र भी उच्च संकटग्रस्त क्षेत्रों में से एक है। इनमें से अधिकतर क्षेत्र तो पहले से ही बाढ़ की आशंका से प्रभावित हैं, जिससे इन उपजाऊ कृषि क्षेत्रों पर निर्भर रहने वाले हजारों लोग भी प्रभावित होंगे। समुद्र स्तर में एक मीटर की वृद्धि भी विभिन्न तटीय शहरों एवं अत्यधिक जनसंख्या वाले डेल्टा क्षेत्रों, जैसे- मिस्त्र, बांग्लादेश, भारत एवं चीन में बाढ़ ला सकती है जहाँ विश्व की सबसे अधिक चावल की खेती होती है।
परितंत्र एवं जैव विविधता का हास
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि विश्व में शेष बचे 22 हजार ध्रुवीय भालुओं के लिये जलवायु परिवर्तन ही एकमात्र सबसे बड़ा खतरा है। आर्कटिक में रहने वाले ध्रुवीय भालुओं को अपने प्रमुख शिकार सील को पकड़ने के लिये समुद्री बर्फ की आवश्यकता होती है। जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्री बर्फ बसन्त के प्रारम्भ में ही पिघल जाती है जिससे ध्रुवीय भालू अत्यधिक वसा संचित करने हेतु लम्बे समय तक शिकार नहीं कर सकेंगे और ग्रीष्मकाल के अन्त तक वे काफी दुर्बल हो जाएँगे तथा अपने बच्चों की देखभाल करने में भी असमर्थ होंगे।
कृषि उत्पादन पर प्रभाव
विश्व के वे क्षेत्र जो अभी चावल, गेहूँ एवं अनाजों का उत्पादन कर रहे हैं, वे ग्लोबल वार्मिंग के कारण उतनी मात्रा में उत्पादन करने में असमर्थ हो सकते हैं। इससे खाद्यान्न की उपलब्धता भी प्रभावित होगी। कुछ क्षेत्रों में वाष्पीकरण में वृद्धि एवं मृदा के शुष्क हो जाने से लम्बे समय तक सूखे जैसी स्थिति पैदा हो जाएगी। शुष्क क्षेत्रों में सिंचाई की आवश्यकता भी बढ़ेगी। गर्म क्षेत्रों में फसलों के कीटग्रस्त व रोगग्रस्त होने तथा खरपतवार के उगने से, कृषि प्रभावित होगी। समुद्र स्तर में बढ़ोत्तरी के परिणामस्वरूप, समुद्रतटीय क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी जिससे कृषि योग्य भूमि भीनष्ट हो जाएगी। इसके अतिरिक्त, समुद्रतटीय एक्वीफर में खारे पानी के प्रवेश से कृषि उत्पादन भी प्रभावित होगा।
मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव
जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को तत्काल रोका या बदला नहीं जा सकता है। ऐसा अनुमान है कि ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव आने वाले 100 वर्षों तक निरन्तर जारी रहेंगे। ग्रीनहाउस गैसें जो वायुमण्डल में पहले ही उत्सर्जित हो चुकी हैं वे इतनी जल्दी समाप्त नहीं होंगी। ये सभी गैसें दीर्घकाल तक वायुमण्डल में रहेंगी। जैसे मीथेन दशकों तक, कार्बन डाइऑक्साइड कुछ शताब्दियों तक, अन्य गैसें जैसे परफ्लोरो कार्बन हजारों सालों तक वायुमण्डल में रहेंगी। यहाँ तक कि यदि हम कल ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन रोक दें तब भी जलवायु निरन्तर परिवर्तित होती रहेगी और साथ-ही-साथ हमारे ग्रह का जीवन भी प्रभावित होता रहेगा।कुछ लोग अभी भी ऐसा मानते हैं कि ये बातें केवल कुछ समय के लिये चर्चा में रहेंगी।
उन्हें लगता है कि जलवायु परिवर्तन एक अस्थायी प्रक्रिया है कि कुछ समय पश्चात स्वतः खत्म हो जाएंगी। परन्तु बहुत से लोग हैं जो इसे गम्भीरता से ले रहे हैं। वैज्ञानिक समूह, सरकारें एवं बुद्धिजीवी लोग इससे चिन्तित हैं।
ऐसी गतिविधियाँ जो कार्बन उत्सर्जन की कमी लाने में सहायक होती हैं
- हमेशा कपड़े के थैले का प्रयोग करना।
- वृक्षों की कटाई रोकना।
- वर्षाजल का संचयन।
- जब भी सम्भव हो पैदल चलना।
- पेड़ लगाना।
- जब भी और जहाँ भी सम्भव हो, बिजली के उपयोग में कमी लाना।
- दिन के समय प्राकृतिक रोशनी का प्रयोग।
- रोशनी के लिये सीएफएल बल्बों का प्रयोग करना।
- आवश्यकता न होने पर विद्युत उपकरणों जैसे कम्प्यूटर एवं म्यूजिक उपकरणों को 'ऑन' अथवा 'स्टैंडबाय मोड' पर रखना।
- मौसमी एवं स्थानीय खाद्य पदार्थों का प्रयोग।
- सौर ऊर्जा व उपकरणों को बढ़ावा।
जीवाश्म ईंधनों के दहन से ग्लोबल वार्मिंग हो रही है और यह जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा दे रही है। इन ईंधनों का दहन ऊर्जा के लिये किया जाता है। आधुनिक जीवनशैली पूर्णतया ऊर्जा पर निर्भर है। प्रत्येक व्यक्ति ऊर्जा के उपयोग में कमी लाकर ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में सहायता कर सकता है। ग्लोबल वार्मिंग के लिये उत्तरदायी विभिन्न ग्रीनहाउस गैसों में से कार्बन डाइऑक्साइड एक प्रमुख गैस है। कोयला, पेट्रोल, डीजल, हवाई जहाज का ईंधन, प्राकृतिक गैस, एल.पी.जी. आदि का कार्बन डाइऑक्साइड गैस के उत्सर्जन को बढ़ाने में बड़ा योगदान है।
इन ईंधनों अथवा इन्हें प्रयुक्त कर तैयार होने वाले उत्पादों के उपयोग में कमी करके हम कार्बन उत्सर्जन को काफी हद तक कम सकते हैं, जिससे पारिस्थितिकीय सन्तुलन को बिगड़ने से रोका जा सकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
