
पादप जगत का अद्भुत पौधा वेलविसचिया मिरैबिलिस Publish Date : 20/12/2025
पादप जगत का अद्भुत पौधा वेलविसचिया मिरैबिलिस
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, डॉ0 शालिनी गुप्ता एवं गरिमा शर्मा
वेलविसचिया मिरैबिलिस प्रकृति तथा समस्त वनस्पति जगत का एक अत्यन्त विलक्षण पौधा है। इसकी तुलना किसी अन्य पौधे से करना सम्भव ही नहीं है। यह प्रजाति दक्षिण अफ्रीका में नैम्ब के समुद्रतटीय मरुस्थलों में पाई जाती है। वहां की आम भाषा में इस प्रजाति को ‘ट्री टुम्बो’ कहा जाता है। वनस्पति जगत में इस पौधे का संरक्षण एवं संवर्द्धन अत्यन्त महत्वपूर्ण और आवश्यक है क्योंकि पौधों के विकास के अध्ययन के साथ-साथ इस पौधे का शैक्षणिक महत्व भी बहुत अधिक है। राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान, लखनऊ में इस विलक्षण प्रजाति को उपस्थापित करने में सफलता प्राप्त हुई है।
आज समस्त विश्व में मानवीय एवं भौतिक कारणों से अनेक वनस्पतियों तथा वन्य प्राणियों का निरन्तर ह्रास होता जा रहा है। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में विश्व के सभी वनस्पति उद्यानों का महत्व बढ़ गया है। इस पौधे को उगाने तथा देखभाल से संबंधित उपलब्ध वैज्ञानिक साहित्य का गहन अध्ययन पश्चात् विश्व की इस विलक्षण पौध प्रजाति को इस वनस्पति उद्यान में उपस्थापित करने में सफलता प्राप्त की गयी।
खोजः वेलविसचिया मिरैबिलिस एक अनावृतबीजी (जिम्नोस्पर्म) पौधा है और दक्षिण अफ्रीका में इसे सामान्यतः ‘ट्री टुम्बो’ के नाम से जाना जाता है। सम्पूर्ण वनस्पति जगत में इसे दुनियां के दुर्लभतम् पौधों की श्रेणी में रखा गया है। इस पौधे का वानस्पतिक नाम एक आस्ट्रीयाई प्रकृति वैज्ञानिक ‘फ्रीड्ड्रिक एम. जे. वेलविस्च’ के सम्मान में रखा गया है जिसने सन् 1859 में पहली बार इस पौधे को अंगोला के रेगिस्तान में देखा था। वे इस पौधे को पहली बार देख कर इसे छूने का साहस नहीं कर सके। उन्हें डर था कि इस पौधे को छूने से कहीं वह स्वयं ही लुप्त न हो जाएं। उन्होंने इस विलक्षण पौधे की चर्चा अपने साथियों से की।
फ्रीड्रिक वेलविस्च दक्षिण पश्चिम अफ्रीका में पाया जाता है क्योंकि इन वनस्पति उद्यानों में वैज्ञानिक तथा तकनीकी विधियों की सहायता से दुर्लभ, संकटापन्न, स्थानिक तथा विलक्षण प्रजातियों का संग्रह तथा संरक्षण किया जा सकता है। इस प्रकार किसी भी वनस्पति उद्यान के महत्व का मूल्यांकन करने के लिए उस वनस्पति उद्यान में संग्रहित विलक्षण पादप प्रजातियों, पादप विविधता, पादप सम्पन्नता तथा उनकी संख्या आदि एक मापदण्ड का कार्य करती है। इस तथ्य को स्वीकार करते हुए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान, लखनऊ का वनस्पति उद्यान, अनुसंधान एवं विकास कार्यों का निरंतर आधुनिकीकरण करने के साथ-साथ दुर्लभ पादप प्रजातियों के संग्रहण, संवर्द्धन तथा उपस्थापन का लगातार प्रयास कर रहा है।
यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि इन लेखकों ने वर्ष 1989 में नेशनल बॉटेनिक गार्डन्स, किरस्टेनबोस्च, क्लारेमोन्ट, साउथ अफ्रीका से पहली बार वेलविसचिया मिरैबिलिस हुक पुत्र. के बीजों का पैकेट प्राप्त किया। दूसरी बार इस प्रजाति के बीजों को वर्ष 1992 में बर्लिन बॉटेनिक गार्डन्स, डलहेम, जर्मनी से मंगायाउष्णकटिबंधीय भागों में पाये जाने वाले पौधों पर अध्ययन का कार्य कर रहे थे जिससे वहां के स्थानीय आदिवासियों को इन पौधों से लाभ पहुंचाया जा सके। अतः फ्रीड्ड्रिक वेलविस्च को ही इस अनोखी प्रजाति का खोजकर्ता माना जाता है।
वेलविसचिया मिरैबिलिस का एक दूसरा पौधा, वनस्पतियों का चित्रांकन करने वाले एक कलाकार थामस बैन्स को वर्ष 1861 में मिला। यह स्थान पहले वाले स्थान से लगभग 500 मील की दूरी पर एक सूखी हुई नदी की तलहटी में था। विचित्र पौधा होने के कारण वेन्स ने इस पौधे के अनेक चित्र बनाए ओर प्रकाशन के लिए भेज दिया। इंग्लैण्ड में इन चित्रों के प्रकाशित होते ही तहलका मच गया।
फ्रीड्रिक वेलविस्व ने इस पौधे को अत्यंत विलक्षण प्रजाति माना और उसने इसका वर्णन एक बौने पौधे के रूप में किया जिसकी पत्तियां दैत्याकार अर्थात् बहुत लम्बी व पट्टाकार थीं। फ्रीड्रड्रिक ने पौधे का विवरण तथा पौध सामग्री सर जे. डी. हुकर को भेजी जो उस समय क्यू (इंग्लैण्ड) में रायलबॉटेनिक गार्डन के निदेशक थे। फ्रीड्ड्रिक ने यह भी सुझाव दिया कि इस अनोखे पौधे का नाम ‘टुम्बोआ स्ट्रोविलिफेरा’ रखा जा सकता है। लेकिन सर जे. डी. हुकर ने वेलविस्व की इस अनोखी खोज को विशेष महत्व प्रदान करते हुए वर्ष 1863 में इसका जातीय नाम ‘वेलविसचिया’ रख दिया। ‘मिरैबिलिस’ का लैटिन भाषा में अर्थ ‘अद्वितीय’ तथा ’आश्चर्यजनक’ होता है। सर हुकर ने इस पौधे को पादप विकास के अध्ययन में शैक्षणिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना और इसे स्थानिक पौधों का स्मारक चिन्ह स्वीकार किया।
वानस्पतिक समानता
विश्व में पौधों के विकास के अध्ययन में अनावृतबीजी पौधों का विशेष महत्व है। यह अध्ययन शोधकर्ताओं तथा विद्यार्थियों में एक कौतूहल तथा जिज्ञासा उत्पन्न करता है। इसे जिम्नोस्पर्मी के अन्तर्गत दो जीवित फॉसिलों साइकेडूस, जिंको तथा कोनीफर्स के साथ रखा गया है। वहीं दूसरी ओर इसे गण नीटेल्स के साथ रखा गया है, जिसमें एफीड्रा तथा नीटम कुल के पौधे आते हैं। चार्ल्स डार्विन के अनुसार वैलविसचिया मिरैबिलिस पृथ्वी पर पाई जाने वाली सर्वाधिक प्राचीन पादप प्रजातियों में से एक है।
आवास स्थान
यह प्रजाति दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका के भूभागों की देशज प्रजाति है जहां यह नाम्बिब रेगिस्तान की संमुद्री मरुस्थलीय पट्टियों में उगता है और ओस तथा कुहरे की आर्द्रता को अवशोषित करके जीवित रहता है। इनके पौधे वालविस खाड़ी के उत्तरी तथा दक्षिणी भागों के निकट अधिक पाये जाते हैं। यह मरुद्भिद प्रकृति का पौधा है। यह बलुई-रेगिस्तानी मैदानों में चट्टानी भूमि वाले क्षेत्रों में उगता है जहां का वातावरण बहुत शुष्क रहता है तथा औसत वार्षिक वर्षा 2-3 सेमी. से अधिक नहीं होती है। इस तरह यह प्रजाति जलवायु की कठिनतम परिस्थितियों में भी संघर्ष करके जीवित रहने की क्षमता रखती है। दिनभर की भीषण गर्मी के पश्चात् शीतल रात्रि के कारण ओस से चट्टाने नम हो जाती हैं। इसी नमी को अवशोषित करके वैलविसचिया मिरैबिलिस के पीथे जीवित रहते हैं।
वर्णन
वैलविसचिया मिरैविलिस ‘वेलविसचियेसी’ कुल की एकल जातीय तथा एक रूपी पौध प्रजाति है। इसका पौधा एकलिंगी होता है अर्थात इसमें नर तथा मादा पीधे अलग-अलग होते है। पौधे का स्तम्भ (तना) अत्यन्त लघु, लगभग 0.45 मी. ही ऊंचा होता है जो देखने में शिखामूल (शलजम) की तरह या भूमि के ऊपर उल्टे शंकु की भांति दिखाई देता है। यह दीर्घवृत्ताकर होता है। मूल वासस्थानों में पाये जाने वाले इनके अत्यंत पुराने पौधों में इसका व्यास लगभग 1.0 मीटर तक होता है। यह स्तम्भ भूमि की सतह से नीचे की ओर क्रमशः पतला होता जाता है। इसकी मूसला जड़ भी 2.0-3.0 मीटर लम्बी होती है और भूमि की गहराई में क्रमशः पतली होती जाती है। मूसला जड़ का ऊपरी भाग पार्श्व जड़ों से आच्छादित रहता है।
यह जड़ें बाद में छिद्रिष्ठ (स्पंजी) जड़ों का एक जाल जैसी संरचना बनाती हैं जो भूमि से अधिक से अधिक आर्द्रता अवशोषित करने में समक्ष होती है। नये स्तम्भकी धुरी का शीर्ष दो भागों में विभक्त, उत्तल तथा शिखाग्र वृद्धि की रुकावट के कारण धंसा हुआ होता है जबकि परिधि पर सामान्य दशा में होता है। इसे मुकुट (क्राउन) भी कहा जाता है। सम्पूर्ण पौधा पेरीडर्म द्वारा ढका रहता है लेकिन इसकी मोटाई में विविधता होती है। मुकुट पर पेरीडर्म सबसे अधिक मोटा होता है।
मुकुट पत्ती तथा स्तम्भ शीर्ष के मध्य होता है जो क्रमशः उभार लिए हुए होता है। पौधे में मात्र दो ही पत्तियां होती है जो फीते की तरह पट्टाकार, लम्बी, मांसल मोमीय, हल्के हरे रंग की तथा नीलाभ-हरी होती हैं। पत्तियां 5 से 8 मीटर तक लम्बी होती है। पुराने पौधों की पत्तियां 25-30 सेमी. चौड़ी होती है। इनका नाड़ी विन्यास समानान्तर होता है। यह चिक्कड़ तथा पट्टीकार होती है। ये पत्तियां एक खांचे से निकलती हैं जो मुकुट में स्थित होता है और आर्द्रता रोकने के लिए एक कक्ष के रूप में कार्य करता है। पत्तियां आयताकार या लग्बावत् तथा विपरीत दिशा में होती हैं और शीर्ष की ओर क्रमशः पतली होती जाती हैं।
वनस्पति जगत में यही एक मात्र पौधा है जिसकी पत्तियां इतनी अधिक लम्बी और दीर्घायु भी होती हैं। इनके पौधे एक हजार से भी अधिक वर्ष तक अफ्रीकी जंगलों में जीवित रहते हैं जो वनस्पति जगत में एक विलक्षण घटना है। पत्तियों के शीर्ष भूमि की सतह को स्पर्श करते रहते है जिसके कारण शीर्ष कट-फट जाते है तथा कुछ भाग सूख जाता है।
वनस्पति उद्यान में उपस्थापित 12 वर्ष की आयु वाले एक पौधे की पत्तियां लगभग 4.0 मीटर लम्बी तथा 30 सेमी. चौड़ी हैं। इस पौधे को नेशनल बॉटेनिक गार्डन, क्लेरेमोन्ट, रिपब्लिक ऑफ साउथ अफ्रीका से प्राप्त बीजों से तैयार किया गया है दूसरे पौधे की पत्तियां 1.5 मीटर लम्बी तथा 15 सेमी. चौड़ी है। इसे बर्लिन बॉटेनिक गार्डेन, डेलहम, जर्मनी से प्राप्त बीजों द्वारा तैयार किया गया है।
इस पौधे का पुष्पक्रम स्तम्भ के रिम से विकसित होता है। यह 20-25 सेमी. लम्बा होता है और युग्मशाखन पुष्पक्रम के रूप में होता है। इसमें शंकु की आकृति की तरह संरचनाएं होती है। नर तथा मादा शंकु अलग-अलग पौधों में लगते हैं। नर शंकु 1-3 सेमी. लम्बे, बेलनाकार, कुछ-कुछ चतुष्कोणीय तथा लाल भूरे रंग के होते हैं। मादा शंकु आकार में बड़े, लगभग 5.0 सेमी. लम्बे तथा हरे रंग के होते हैं। मादा शंकु नर शंकु की तुलना में शीर्ष पर कुछ गोलाई लिए हुए होता है।
शंकु के आधार से उत्पन्न निपत्रों के कक्ष से फूल एकाकी ही उत्पन्न होते हैं। प्रत्येक पर पुष्प 5-6 एक गर्भकोशी पुंकेसरों का बना हुआ होता है जो गहरे पीले रंग के होते हैं। ये पुंकेसर एक वंध्य अण्डाशय को चारों ओर से घेरे रहते हैं। इस अण्डाशय में एक लम्बी सर्पिल, कुण्डलीनुमा अणुद्वार नलिका होती है। बीज हल्के, सफेद रंग के, चपटे तथा पक्षवत् होते हैं। बीजों की अंकुरण क्षमता कम होती है।
प्रसारण
वर्ष 1989 तथा वर्ष 1992 में प्राप्त किये गये बीजों को युवाई से पूर्व रात भर आसवित जल में भिगो कर रखा गया। बुवाई के लिए शुष्क तथा निर्जर्मीकृत मोटी मोरंग तथा पत्ती की खाद का 1:1 के अनुपात में बनाया गया सम्मिश्रण प्रयोग किया गया। इस सम्मिश्रण में अल्प मात्रा में बुझा हुआ चूना तथा पुरानी ईट का चूरा मिलाया गया। बीजों की अंकुरण क्षमता यद्यपि कमजोर है लेकिन ताजे बीजों में यह क्षमता अधिक होती है। बीजों की अंकुरण क्षमता 50 प्रतिशत से कम पाई गयी है।
गमलों में उगाये गये बीजों से तैयार पौध को बाद में ऐसे स्थाई स्थानों पर स्थानान्तरित कर दिया जाता है जहां पर पीथे बिना किसी बाधा के वृद्धि कर सकें। बीजों का अंकुरण तथा नई पीध का उपस्थापन कठिन हो सकता है लेकिन जब एक बार नये पौधे स्थापित हो जाते हैं तो इनकी देखभाल काफी सुगम हो जाती है। मानसून के बाद सितम्बर-अक्टूबर में 5.0 ग्राम हड्डी का चूरा तथा 2.5 ग्राम यूरिया भी इस वनस्पति उद्यान में उपस्थापित किये गये पौधों को दिया गया।
संरक्षण
दक्षिण अफ्रीका तथा जर्मनी से प्राप्त बीजों से तैयार पौधों को बाद में 2.0 सेमी. व्यास वाले तथा 1.0 मीटर लम्बे (भूमि की सतह से ऊपर) चीनी मिट्टी से तैयार बेलनाकार पात्रों (पाइपों) में स्थानान्तरित कर दिया गया। पाइपों में पौध को स्थानान्तरित करने के पीछे विचार यह था कि इसकी मूसला जड़ भली प्रकार स्थापित हो सके और फीतेदार पत्तियों को पूर्ण रूप से फैलने में सुविधा हो। पौधों की सिंचाई जलवायु के अनुसार की जाती है।इन पौधों को उद्यान के ‘कैक्टस तथा सकुलेन्ट हाऊस’ में लगाया गया।
कैक्टस तथा सकुलेन्ट हाउस की छत शीशों की बनी हुई है। इसमें शीशे फिश फ्लेट सिस्टम के अनुसार लगे हुए है जिससे वायु का संचार पूर्ण रूप से बना रहे’ और कैक्टस तथा सकुलेन्ट पौधों के विकास तथा वृद्धि के लिए सूक्ष्म जलवायु का उचित निर्माण हो सके।
इस पादप गृह की छत की आकृति पागोडा रूपी है जिससे इसमें प्रकाश समुचित मात्रा में (लगभग 40,000-50,000 लक्स) आता है। यहां पर शीतकाल में बाहर का तापमान 3-4° सेल्सियस तक नीचे चला जाता है वही ग्रीष्मकाल में तापमान 42-45° सेल्सियस तक हो जाता है।
जर्मनी से वर्ष 1992 में प्राप्त किये गये वीजों द्वारा उत्पन्न एक पीया लखनऊ की जलवायु में 10 वर्ष की अवधि में ही पूर्ण रूप से वयस्क हो गया है। इस पौधे का वानस्पतिक अध्ययन करने पर ज्ञात हुआ कि यह एक नर पौया है। मार्च, 2002 के अंतिम सप्ताह में इस पीथे के बांयी शीर्षस्थ दरार से एक पुष्पक्रम का विकास प्रारम्भ हुआ।इस पुष्पक्रम के नर कोन (स्ट्रोविली) लगभग एक माह में परिपक्व हो गये। इस नर कोन (स्ट्रोविली) से गहरे पीले रंग के नर पुष्प (स्टेमिनेट) उत्पन्न हुए।
ये नर पुष्प सहपत्रों के कक्षों के आधार से उत्पन्न हुए। यह नर पुष्प सहपत्रों के कक्षों के आधार से उत्पन्न हुए। बीजों की स्थापना के लिए नर तथा मादा पौधों में एक साथ नर तथा मादा पुष्पों के निकले तथा परिपक्व होने की आवश्यकता होती है।वेलविसचिया मिरैबिलिस विश्व का एक अनोखा तथा विचित्र स्थानिक पौधा है जिसे वनस्पति विज्ञान के विद्यार्थी तथा अध्यापक पुस्तकों में प्रकाशित चित्रों, संग्रहालयों या किसी हर्बेरियम में शुष्क पौधे की दशा में ही देख पाते हैं। अब इस वनस्पति उद्यान में इसके पौधों को सजीव देखा जा सकता है। उद्यान में लगे इन पौधों को देखने के लिए सामान्य दर्शकों में भी काफी कौतुहल तथा जिज्ञासा बनी रहती है।
वेलविसचिया मिरैबिलिस को जीवित फॉसिल भी माना जाता है। विश्व के कुछ ही वनस्पति उद्यानों में यह पौधा देखा जा सकता है। सार्क देशों के समूह तथा भारतीय उपमहाद्वीप में राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान, लखनऊ का यह एक मात्र वनस्पति उद्यान है जहां इस दुर्लभ पौधे के उपस्थापन तथा संरक्षण में सफलता प्राप्त हुई है।वेलविसचिया मिरैबिलिस को (सी आई टी ई एस) कन्वेन्शन ऑन इण्टरनेशनल ट्रेड ऑफ एन्डेन्जर्ड स्पीसीज़ के एपेन्डिक्स-प्प् में इसे शामिल किया गया है। ‘सी आई टी ई एस’ के नियमानुसार इस पौधे का व्यापार पूर्णतः प्रतिबंधित है। इसे केवल वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय नियमों का पालन करते हुए ही एक देश से दूसरे देश ले जाया जा सकता है।
राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान, लखनऊ में वेलविसचिया मिरैबिलिस का उपस्थापन संकटग्रस्त पादप प्रजातियों के संरक्षण की दृष्टि से जैवीय स्रोतों की पारस्परिक भागीदारी का उत्तम उदाहरण है। बॉटेनिक गार्डन कन्वेन्शन स्ट्रेटेजी (बी डी सी एम) तथा बॉटेनिक गार्डन कन्जर्वेशन इन्टरनेशनल (बी सी जी आई) लन्दन, इंग्लैण्ड का भी यही मत है कि विश्व भर के वनस्पति उद्यान पारस्परिक सहयोग से विश्व के दुर्लभ तथा संकटग्रस्त पौधों की सुरक्षा तथा संरक्षण का कार्य कर सकते हैं। उपरोक्त श्रेणी में आने वाली पादप प्रजातियों का वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय नियमों का पालन करते हुए वानस्पतिक उद्यानों के मध्य पारस्परिक आदान-प्रदान होना चाहिए। इससे जहां संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण तथा संवर्द्धन में सहायता मिलेगी वही इन पौधों का करीब से अध्ययन तथा उपयोग भी किया जा सकेगा।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
