
पशु-पक्षी जानते हैं मौसम का राज वैज्ञानिक शोध ने भी इसका दिया प्रमाण Publish Date : 01/12/2025
पशु-पक्षी जानते हैं मौसम का राज वैज्ञानिक शोध ने भी इसका दिया प्रमाण
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं अन्य
आधुनिक शोध में यह साबित हुआ है कि पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के सदस्य पशु-पक्षियों की गतिविधियां मौसम का पूर्वानुमान लगाने के हैं सबसे बड़े स्रोत-
विज्ञान ने मौसम की भविष्यवाणी के लिए चाहे कितनी भी उन्नत तकनीक विकसित क्यों न कर ली हो, लेकिन मारवाड़ के गांवों में मौसम के पूर्वानुमान के लिए आज भी प्रकृति के पुराने तौर-तरीकों यानी पशु-पक्षियों के व्यवहार पर ही अधिक भरोसा किया जाता है। पीढ़ियों से चले आ रहे इस स्थानीय ज्ञान को अब वैज्ञानिक शोध ने भी सही साबित कर दिया है। जोधपुर विश्वविद्यालय के एक ताजा अध्ययन में खुलासा हुआ है कि पक्षियों के घोंसले बनाने के तरीके से लेकर जानवरों की हरकतों तक सब में मौसम के संकेत छिपे हुए होते हैं और यह संकेत 80 प्रतिशत तक सटीक होते हैं।
जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के जीव विज्ञान विभाग के एचओडी डॉ. गेमराराम परिहार, रिसर्च स्कॉलर निकिता रोहिवाल और उनकी टीम ने यह अनूठा अध्ययन किया है। यह शोध इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एनवायरमेंटल साइंस में प्रकाशित किया गया है। इस शोध में सामने आया कि पुरानी धारणा कि पक्षी घोसला वहां बनाते हैं, जहां उनको पूर्वानुमान होता है कि बाजरा के दाने बच्चे आराम से खा सके और लोग कहते हैं कि खेजड़ी पर उनका घोसला देखकर बताते हैं कि बाजरी लंबी होगी, जमाना अच्छा आएगा। यह बात शत प्रतिशत सही होना पाया गया है।

प्रो. परिहार ने बताया कि हमारे शास्त्र और पुराने लोगों के ज्ञान में इस बात का भंडार भरा पड़ा है कि वह किस तरह से पुराने समय में आकलन करते थे कि कब क्या होता है। जैसे लोमड़ी की मौजूदगी खेतों में चूहों की आबादी नियंत्रित करती है, तो सियार बीमार मवेशियों को खत्म कर पशुधन की सेहत बनाए रखते हैं। इस पारंपरिक ज्ञान में जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) का गहरा तालमेल है। अक्षय तृतीया और मकर संक्रांति जैसे पारंपरिक त्योहारों पर ग्रामीण मिट्टी के बर्तनों के फूटने, हवा की दिशा और जानवरों के व्यवहार से यह अनुमान लगाते हैं कि वर्षा कब और कितनी होगी। लोकगीतों और दोहों में भी इन संकेतों का वर्णन किया गया है।
80 प्रतिशत सटीक साबित होते हैं यह संकेतः
प्रो परिहार ने अपने शोध पत्र ‘इंडिजिनस वेदर फोरकास्टिंग थ्रू एनिमल बिहेवियर इन जोधपुर’’ में इन बातों का खुलासा किया है। शोध के अनुसार एथोलॉजिकल संकेत (व्यावहारिक संकेत) पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होकर 80 प्रतिशत तक सटीक साबित होते हैं। शोधकर्ताओं ने स्थानीय बुजुर्गों, किसानों और आदिवासी समुदायों (जैसे भील, मीणा, बंजारा) आदि के साथ साक्षात्कार लिए तथा क्षेत्रीय अवलोकन भी किए। शोध परिणामों से पता चला कि पक्षियों (मोर, तोता, कबूतर), सरीसृपों (सांप), स्तनधारियों (खरगोश, लोमड़ी) तथा कीटों (चींटी, टिड्डी) के व्यवहार वर्षा ऋतु से पहले विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध होते हैं। उदाहरणस्वरूप, मोरों का नृत्य या कूजन मानसून की शुरुआत का संकेत देता है, जबकि चींटियों का भोजन जमा करना सूखे की चेतावनी होता है।
ग्रामीण कुछ तरह से ढूंढते हैं संकेतः

प्रो. परिहार ने बताया कि सांप, चींटी और लोमड़ी भी मौसम से जुड़े संकेत देते हैं। यदि सांप पेड़ों की ऊंचाई पर चढ़ते देखे जाएं या गोह अपने बिल बंद करने लगे तो क्षेत्र में 12 से 24 घंटे के भीतर बारिश होना तय माना जाता है। लाल चींटियां अपने अंडे उठाकर इधर-उधर ले जाने लगें, तो यह भी बारिश के करीब आने का संकेत है। इन जीवों का यह व्यवहार दर्शाता है कि पारिस्थितिकी तंत्र के सदस्य पशु-पक्षी ही इस तंत्र के सबसे बड़े ज्ञाता हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
