
सुबबूल : एक उपयोगी वृक्ष Publish Date : 11/11/2025
सुबबूल : एक उपयोगी वृक्ष
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एंव अन्य
वन पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के अलावा हमारी अनेक आवश्यकताओं को पूरा करते हैं. वन द्वारा प्रदत्त बहुत-सी उपयोगी वनस्पतियों को तो मनुष्य ने खोज डाला है परंतु अभी भी ऐसे बहुत से पेड़-पौधे हैं, जिनके बारे में और जिनकी उपयोगिताओं के विषय में वैज्ञानिकों को ज्यादा जानकारी नहीं है। यही नहीं कुछ लोग वनस्पतियों के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त किए बिना केवल एक या दो पहलुओं के आधार पर उसे हानिकारक करार कर देते हैं और फिर हमें उनकी उपयोगिताओं से वंचित रहना पड़ता है।
एक ऐसी ही वनस्पति है सबबूल सुबबूल के बारे में लोगों को हाल तक कम जानकारी थी आमतौर पर इसे किसी काम का नहीं समझा जाता था। यहां तक कि इसके तेजी से फैलाव को देखकर लोग इसे 'कुबबूल जैसे जंगली नाम से पुकारते थे परंतु हाल के कुछ वर्षों में जैसा कि देखने को मिलता ही है विदेशों में अनुसंधान के बाद इसकी अनेक उपयोगिताएं भारतीयों को मालूम पड़ीं पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी तो इस वनस्पति से इतनी प्रभावित हुई कि उन्होंने इसका नाम कुबबूल से बदलकर सुबबूल ही कर दिया।
सुबबूल (हवाइयन जायंट) की खासियत यह है कि यह काफी तेजी से बढ़ता है और दो साल में ही दस मीटर की ऊंचाई तक पहुंच जाता है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसकी खेती के लिए कोई खास तरह की मिट्टी या वातावरण की आवश्यकता नहीं पड़ती बल्कि प्रतिकूल वातावरण में भी यह आसानी से जग सकता है। सुबबूल का उपयोग पशु चारा, ईंधन और इमारती लकड़ी के रूप में किया जा सकता है।
पशुचारा के रूप में इसकी उपयोगिता का कोई सानी नहीं है एक हेक्टेयर जमीन में लगाए गए सुबबूल के पेड़ों से प्रति वर्ष 20 मीट्रिक टन तक सूखा चारा निकाला जा सकता है। इसमें 24 प्रत्तिशत तक प्रोटीन की मात्रा होती है और इसका 65 प्रतिशत भाग सुपाच्य होता है। मौसम अनुकूल रहने और अच्छी सिंचाई की व्यवस्था होने पर प्रत्येक 45 से 60 दिनों के भीतर यानी साल में पांच से सात बार तक इससे पशुओं के लिए चारा काटा जा सकता है।

अन्य परंपरागत चारों को उगाने के लिए अच्छी उपजाऊ भूमि और अच्छी सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है, परंतु सुबबूल के साथ एक लाभ यह भी है कि इसे कष्टकृष्य भूमि (मार्जिनल लैंड) पर लगाकर तथा सीमित सिंचाई से भी इसकी अच्छी पैदावार ली जा सकती है। साथ ही यह बारहमासी पौधा है, इसलिए बिना बार-बार रोपे इससे 15-20 साल तक चारा लिया जा सकता है।
सुबबूल का उपयोग ईंधन के रूप में भी किया जा सकता है। इसके लिए इसकी पौध को एक या दो मीटर के अंतराल पर लगाना चाहिए और तीन या चार साल के बाद पहली बार इससे ईंधन के लिए लकड़ी निकाली जा सकती है। इसकी ज्वलनशीलता तथा कैलोरिफिक (ऊष्मीय) मान किसी अन्य लकड़ी ईंधन के मुकाबले कम नहीं है। सुबबूल की एक और विशेषता है, जब इस वृक्ष को धड़ के ऊपर या टहनियों को काटा जाता है तब कटे हुए भाग से अनेक कोपलें फूटती है, जो तीन साल में इतनी बढ़ जाती है कि उन्हें पुनः ईंधन के लिए काटा जा सकता है। इस प्रकार यह क्रिया बराबर चलती रहती है।
इमारती लकड़ी के रूप में यह उतनी अच्छी तो नहीं होती, परंतु भवन-निर्माण में तथा फर्नीचर बनाने में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। इन सब गुणों के कारण और इससे अपेक्षित आर्थिक लाभ को देखते हुए सुबबूल हमारे देश में भी धीरे धीरे लोकप्रिय हो रहा है। सामाजिक वानिकी विभाग के अलावा अन्य सरकारी और गैरसरकारी संस्थाएं सुबबूल की खेती और इसके वन लगाने के लिए प्रयत्नरत है।
शुरू-शुरू में सुबबूल को बड़े पैमाने पर उगाने में एक-दो समस्याओं का सामना करना पड़ा था। इनमें यूकेलिप्टस तथा अन्य प्रजातियों की लकड़ी के मुकाबले इसका सीमित विपणन (मार्केटिंग) सबसे बड़ी समस्या थी, परंतु भारतीय एग्रो इंडस्ट्रियल फाउंडेशन (बी आई ए एफ) ने सुबबूल की लकड़ी को कागज और लुगदी के उत्पादन में उपयोग करने की संभावना को लेकर कुछ उद्योगों से संपर्क किया ताकि सुबबूल के उत्पादक को न्यूनतम मूल्य मिल सके, परिणाम बहुत ही उत्साहवर्द्धक निकला।

करीब-करीब सभी कागज मिलों के मालिकों ने इस बात की पुष्टि की कि इसका उपयोग अच्छे किस्म का कागज बनाने में किया सकता है। वेस्ट कोस्ट, दंडेली ने ले यूकेलिप्टस से 50 प्रतिशत ज्यादा मूल्य पर सुबबूल की लकड़ी खरीदने की पेशकश की क्योंकि इससे कागज बनाने पर लागत कम आती है। मध्य प्रदेश स्थित नेपा मिल्स ने की इस बात की पुष्टि की कि न्यूजप्रिंट बनाने में बांस की लकड़ी का स्थान सुबबूल आसानी से ले सकता है और तो और करीब चार साल पहले इस मिल ने गांव में सुबबूल की खेती बढ़ाने के लिए अनेक योजनाएं बना डाली। मिल ने एक हजार रुपए प्रति टन की दर से सुबबूल की लकड़ी खरीदने का फैसला किया इस निर्णय से देश भर में सुबबूल की खेती को उत्साहवर्द्धक बढ़ावा मिला है यही नहीं, यदि केवल इमारती लकड़ी या कागज उद्योग को कच्चा माल की आपूर्ति करने के लिए भी सुबबूल की खेती की जाती है तो फिर कम से कम इसका 30-40 प्रतिशत भाग ईंधन के लिए भी बब जाता है, जो अन्य वृक्ष खासकर यूकेलिप्टस में तो बिल्कुल भी संभव नहीं है।
परंतु अभी भी सुबबूल के उत्पादन और इसके उपयोग को लेकर अनेक भ्रांतिया है इनमें से कुछ मुख्य इस प्रकार है
बीजों का जमीन पर गिरकर अनियंत्रणीग ढंग से अत्यधिक संख्या में पौधों का शुष्क मौसम में सूखे पत्तों का भारी मात्रा में गिरना, इसके ईंधन की काफी तेज ज्वलनशीलता और इसके घड़ और टहनियों का सीधा न होकर टेढ़ा-मेढ़ा होना। इनमें से अधिकतर गलतफहनियां तो अज्ञानतावश है, एक-दो कुछ हद तक सही भी है जिन्हें थोड़ी बहुत सावधानियां बरतकर न केवल आसानी से दूर किया जा सकता को उपाजाने में बनाया जा सकता है।
कम या अधिक मात्रा में गिरने पौधे उग आते हैं, परंतु बीजों से निकलने में काफी कम समय लगता है जबकि पौधे शुरू-शुरू में धीमी गति से बहते हैं एवं खेत में लगे अन्य पेड़ और से दबे रहते हैं। इस स्थिति काम सकता है। इन पौधों की मिट्टी को डीला कर उन्हें पुनपण के लिए उपयोग किया जा सकता है के समय यदि इन पैसे को सरह अथवा खेतों के किनारे-किनारे लगा दिया जाए तो उसमें अदृद्धि है। ऐसे जब इसके पौधे की में ही और कीड़े लगने शुरू हो जाएं तीनों के ऊपरी हिस्सों को कहना चाहिए तथा उसका उपयोग ईधन के रूप में करना।
थोडे से पौधों में से है जो अपने में भी आसानी से उग सकता है इसका पानी बाले क्षेत्र में सुबबूल की पतित कर जमीन पर गिर जाती है और भूमि को ढक लेती हैं, जो वहां की नमी को बढ़ाने में काफी सहायक होती है। इसका यह पर्यावरण को सुरक्षित रखने ने मुख्य भूमिका अदा करती है। यहीं नहीं सूखे के दिनों में भी मुब्बुन के पेड़ जमीन से पानी सीता नहीं बकनी सारी पत्तियों को गिरा देता है और इतने दिनों तक निष्क्रिय होकर सूखकर खाद बन उगना को उर्वर बनाती है। इसके लिप्टस की पत्तियां पेड़ों में ही लगी होती हैं और जमीन के पानी को सोख लेती हैं इस दौरान यूकेलिप्टस में कोई खास वृद्धि तो नहीं होती है] परतु भौम जल का तल नीचे चला जाता है और ट्यूबवेल से भी पानी की कम मात्रा ही निकल पाती है।
सुस्कूल सूखे को आसानी से बरदाश्त कर लेता है, परंतु जब इसे अच्छी मात्रा में नमी मिलती है तो यह बहुत तेजी से बढ़ता है औरइससे बायोगास के उत्पादन में 400 से 500 प्रतिशत तक वृद्धि हो जाती है। वैसे जिन क्षेत्रों में नमी कम है वहां मिट्टी की छोटी-छोटी क्यारियां तथा खंड बनाकर एवं जड़ों के आसपास घास-पात, खर-पतवार से मल्य बनाकर पानी को रोककर रखा जा सकता है ताकि पेड़ का अच्छी तरह से विकास हो सके एवं बायोमास का अच्छी मात्रा में उत्पादन हो सके।
शुष्क इलाकों में सुबबूल को ईपन तथा इमारती लकड़ी के लिए ही तैयार करना चाहिए क्योंकि ऐसे इलाकों में तना अच्छा बढ़ता है। अन्य इलाकों में गर्मी के मौसम में पत्तियों के झड़ने से चारे का उत्पादन बहुत कम होता है परंतु नमी के मौसम में, जैसे वर्षा ऋतु, बसत के महीने में इससे फसल यानी पत्तियां, तीन-चार बार काटी जा सकती है। इस मौसम के दौरान पशुओं को हरा चारा खिलाना चाहिए और बची हुए पत्तियों को धूप में सुखाया जा सकता है, जिसे गर्मियों में चारे के लिए उपयोग किया जा सकता है। पत्तियों को सूखने में दो-तीन दिन लगते हैं, चूंकि सुबबूल में प्रोटीन का प्रतिशत काफी अधिक होता है इसलिए पशुओं के पूरे चारे में 30-40 प्रतिशत भाग ही सुबबूल का होना चाहिए और अन्य भाग की पूर्ति परंपरागत चारे से करनी चाहिए वरना अपच होने की आशंका रहती है।
सुबबूल का ऊष्मीय मान (कैलोरिफिक वैल्यू) किसी भी अन्य तेजी से बढ़ते हुए पेड़-पौधों की प्रजातियों की तुलना में कम नहीं है। यही नहीं सुबबूल का इस्तेमाल ईंधन के रूप में करने के कुछ और भी फायदे है. एक तो इसमें राख अंश (ऐश कंटेंट) काफी कम होता है और दूसरे, जलने पर यह बहुत कम धुआं छोड़ता है।
सुबबूल के बड़, तने और टहनियों के टेढ़े-मेड़े होने का एक कारण यह है कि यह अतिरिक्त धूप (सौर ऊर्जा) प्राप्त करने के लिए इधर-उधर झुक जाता है ताकि सूर्य का प्रकाश ज्यादा से ज्यादा पत्तियों पर पड़ सके। यदि सीधी टिंबर (जैसे बल्ली, आदि बनाने के लिए) के रूप में इस्तेमाल करने के लिए खेती करनी हो तो इसके पौधों को कम दूरी पर (1x1 मीटर) लगाना चाहिए, पौधों के कुछ बढ़ने के बाद जब तने सीधे बढ़ने के अभ्यस्त हो जाए तब 50 प्रतिशत पौधों को काटकर निकाल देना चाहिए ताकि लगे हुए पेड़ों का अच्छा विकास हो सके। इन कटे हुए पेड़ों से ईंधन के लिए लकड़ी तथा पत्तियों से पशुओं के लिए चारा प्राप्त किया जा सकता है।
सुबबूल की लकड़ी का उपयोग घरों की खिड़कियां, दरवाजे, अलमारियां तथा फर्नीचर बनाने में किया जा सकता है। इसके अलावा सस्ता होने के कारण इसका उपयोग फल, सब्जी तथा अन्य समान की पैकिंग के लिए भी किया जा सकता है।
अन्य फसलों तथा वृक्ष की भांति सुबबूल को भी कीड़ों के आक्रमण का सामना करना पड़ता है। इसे सबसे ज्यादा हानि पहुंचाते हैं। जम्पिंग लाइस तथा साईलाइड सौभाग्य से इन कीड़ों को हवाई तथा फिलीपीन्स में सन् 1985 में पहचाना गया जब भारत में इसकी पैदावार बड़े पैमाने पर शुरू की गई तो सन् 1987 में खासकर दक्षिण भारत के क्षेत्रों में इन कीड़ों ने सुबबूल के पेड़ों पर जोर से हमला किया। इससे पेड़ों के बढ़ने की दर में तो कमी आती ही है पत्तियों और लकड़ियों की गुणवत्ता और मात्रा पर भी असर पड़ता है, परंतु अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थान, जैसे 'नाइट्रोजन फिक्सिंग ट्री एसोसिएशन' तथा विन्टोंक इंटरनेशनल बैंकाक ने इन कीड़ों को रोकने के लिए कुछ जैविक यौगिकों का निर्माण किया है। इस यौगिक के छिडकाव से इन कीड़ों पर काफी हद तक विजय प्राप्त की जा सकती है।
भारतीय एग्रो इंडस्ट्रियल फाउंडेशन ने भी अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के सहयोग से सन् 1989 में अपने देश में इन कीड़ों की रोकथाम के लिए अभियान शुरू किए और इसमें काफी सफलता प्राप्त की।
आशा है कि भारत में जहां सुबबूल के उत्पादन के लिए अति अनुकूल परिस्थितियां है। इसकी उपज और तेजी से बढ़ेगी ताकि न केवल किसानों को चारा, ईंधन और इमारती लकड़ी सस्ते मूल्य पर उपलब्ध हो सके, बल्कि इन वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए वनों की कटाई भी रोकी जा सके।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
