बड़ी कठिन है डर की डगर      Publish Date : 03/11/2025

                          बड़ी कठिन है डर की डगर

“डर के साये में एक लंबा जीवन बिताने के बाद अकसर लोगों को समझ आता है कि वे अपने डर से कहीं ज्यादा मजबूत हैं। दूसरे सभी भावों की तरह डर भी एक भाव है, हमारा पूरा जीवन नहीं। अपने डर को देखें, उसे कुछ देर खेलने दें, पर उसे खुद पर हावी न होने दें। रुक जाना ठीक है, रुके रह जाना नहीं।“

पिछले कुछ समय से डर मेरे शरीर में दौड़ रहा है और कोई खेल-सा खेल रहा है। यहां खेल शब्द का इस्तेमाल में इसलिए कर रही हूं कि क्योंकि मेरे पेशे में भावनाओं को स्वीकार कर उनके साथ काम किया जाता है। डर भी एक प्रकार का भाव ही है। आपका मन कुछ भी कहे, पर यह कोई ऐसा भाव नहीं है, जो आपको बर्बाद करने या कमतर महसूस करवाने की कोशिश करता है।

दशकों तक भय मेरे जीवन का केंद्र बना रहा और महसूस होता था, मानो यह मेरे सभी निर्णयों व पूरे जीवन को हांक रहा हो। अपने हर काम में मुझे डर का अनुभव होता था। नतीजतन, मैं ऐसे निर्णय लेती थी, जिनमें मुझे सबसे कम डर लगे क्योंकि हर एक चीज मेरे भीतर भय उत्पन्न कर देती थी। लेकिन,, अब मुझे समझ आ गया है कि मुझे ताउम्र डर के साये में क्यों जीना पड़ा? हर स्थिति मुझे आपात स्थिति की तरह क्यों लगती रही? और क्यों मैं सदैव संभावित खतरों को भांपने का प्रयास करती रही।

                                                                           

अपने आप को सामान्य बनाने के लिए मैंने बहुत मेहनत की है। ताकि हमेशा अत्यधिक सतर्क रहने की बजाय मैं शांत, सुरक्षित, बेहतर और तरोतंजा महसूस करते हुए वर्तमान का आनंद उठा सकूं। इसका यह अर्थ नहीं है कि डर चला गया है। भय सहित सारी संवेदनाएं हमेशा साथ ही रहेंगी। ये सभी भाव बादलों की तरह हमारे जीवन में आते-जाते रहते हैं। हमारे दिमाग का एक खास हिस्सा इन संवेदनाओं को जन्म देता है, जो हमें इनसान बनाता है और प्यार भरे रिश्ते कायम करने में मदद करता है। अब मुझे भी इस डर के साथ जीना व अपने शरीर में महसूस करना आ गया है।

मैं जानती हूं कि कब इस भय की तीव्रता इतनी ज्यादा होती है और तब मुझे क्या करना है। पर, इन सबके बावजूद यह अभी भी असहज कर देने वाला अहसास है। पहले मैं इस भय को स्वीकार नहीं करना चाहती थी। क्योंकि मुझे लगता है कि इससे यह मेरे ऊपर हावी हो जाएगा। मानो मुझे तहस-नहस कर देगा व स्थितियां मेरे नियंत्रण से बाहर हो जाएंगी। लिहाजा, मेरा दिमाग मुझे पहले ही चेतावनी देकर स्वयं को सुरक्षित रखने की सोच की ओर धकेलने लगता था।

                                                                    

लेकिन, मैं अपनी संवेदनाओं पर काम करने का निर्णय ले चुकी हूं। जान चुकी हूं कि ऐसा नहीं किया तो शायद फिर से हर का भाव मेरे जीवन पर हावी हो जाएगा।

इसलिए अब में एक नर्म मुलायम कंबल में चाय की प्याली लेकर बैठती हूं और अपने डर से बात करती हूं ‘क्या हाल है डर, तुम फिर आ गए। मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकती हूं?’

डर- मैं तुम्हें सुरक्षित रखना चाहता हूं क्योंकि बाहर की दुनिया बहुत खतरनाक है।

‘ठीक है, मैं समझ गई कि तुम असुरक्षित महसूस कर

रहे हो, लेकिन तुम्हें क्या चाहिए?’

डर- मैं चाहता हूं कि कोई मुझे संभाल ले, क्योंकि मैं

सुरक्षित महसूस करना चाहता हूं।

‘मैं तुम्हें संभालने में पूरी तरह सक्षम हूं, इसलिए घबराओ नहीं। मैं जानती हूं कि तुम चाहते हो कि सब ठीक हो जाए। इसलिए मैं तुम्हारे साथ हूं।‘

डर- मैं रोना चाहता हूँ, मुझे घबराहट हो रही है। ‘यदि तुम रोना चाहते हो तो ऐसा जरूर करो। मैं तुम्हें संभाल लूंगी। इसके बाद मैं रोने लगती हूं, क्योंकि मैं डरी हुई हूं। पर, मैं ये भी जानती हूं कि खुद को संभाल लूंगी।‘

अपना खयाल रख पाने का अहसास मेरे भीतर बहादुरी का भाव भर देता है। अपने डर को स्वीकार करके बहादुरी से उसका सामना करने का भाव मेरे भीतर से असहजता को धीरे-धीरे खत्म करने लगता है।

अपने डर के साथ बैठना कुछ ऐसा है, मानो आपने अपने सहमे बच्चे को सीने से लगा रखा हो। ऐसा करते समय मैं अपनी अंतरात्मा के उन हिस्सों को दुलारती हूं, जो मुझे शर्मिंदा और असहज बनाते हैं। मैं स्वयं को बेहतर महसूस करने के लिए ना ही प्रोत्सहित करती हूं और ना भ्रम में रखती हूं कि डरने की जरूरत नहीं है, क्योंकि डरना बुरी बात नहीं है। मैं सिर्फ शांत बैठकर अपनी भावनाओं को महसूस करती हूं और जिस प्रेम भाव की वह मांग करती हैं, उन्हें वही देती हूं।

दुनिया तो सवाल उठाती ही है और आपकी स्थिति नहीं समझती है। इसलिए इस दुनिया में प्रेम की कमी और खतरों की भरमार है। पर, हमारे शरीर व आत्मा को इस हिंसा का माध्यम नहीं बनना चाहिए। इसके लिए सबसे पहले स्वयं से प्रेम करना शुरू करें, ताकि दूसरों के प्रति वहीं भाव महसूस किया जा सके। बेशक यह आसान नहीं है, लेकिन हम ऐसा कर पाएं तो पीढी दर पीढी तक महसूस किए जाने वाले भय और पीड़ा को जड़ से खत्म किया जा सकता है।