सब्जी फसलों के विभिन्न परिस्थितियों में अच्छे उत्पादन की आशा      Publish Date : 26/09/2026

सब्जी फसलों के विभिन्न परिस्थितियों में अच्छे उत्पादन की आशा

                                                                       प्रो0 आर. एस. सेंगर, डॉ0 रेशु चौधरी एवं गरिमा शर्मा

गर्मी और लवणीय मृदा में भी बेहतर उत्पादन देने हेतु प्याज, लहसुन, बैंगन और कद्दू वर्गीय सब्जियों की नई प्रजातियों पर शोधकार्य आरम्भ किया जा चुका है। रोग एवं कीट रोधी सब्जियों की नई किस्मों को विकसित करने में जुटा महाराणा प्रताप उद्यान विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों के द्वारा की गई यह किस्में जलवायु पविर्तन के प्रति सहनशील और बेहतर उत्पादन देने में सक्षम होंगी।

वर्तमान जलवायु परिवर्तन के दौर में किसी भी फसल से अच्छा उत्पादन प्राप्त करना एक चुनौति है। ऐसे में इस बदलते मौसम, बढ़ती गर्मी के साथ ही फसलों में निरंतर बढ़ती रोग एवं कीट के प्रकोप आदि समस्याओं के चलते किसानों को सब्जियों की ऐसी प्रजातियों की आवश्यकता है जो कि कम से कम लागत में एक अच्छा उत्पादन प्रदान कर सकें। इस समस्या को देखते हुए ही महाराणा प्रताप उद्यान विश्वविद्यालय के द्वारा आगामी पाँच वर्षों में इसी प्रकार की सब्जी की किस्मों को विकसित कर किसानों तक पहुँचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक सब्जी की ऐसी किस्मों पर कार्य कर रहे हैं, जिनके अंदर रोग एवं कीटों से मुकाबला करने क्षमता प्राकृतिक रूप से ही उपलब्ध हो। इससे सब्जी फसलों पर बार बार किए जाने वाले कीटनाशकों के छिड़काव की आवश्यकता कम होगी और कीटनाशकों का छिड़काव कम होने से सब्जी की फसलों में लागत भी कम आएगी, जिससे किसानों की आय भी बढ़ सकेगी।   

फिलहाल विश्वविद्यालय में प्याज, लहसुन, बैंगन और कद्दू वर्गीय सब्जियों की नई किस्मों को विकसित करने के लिए अनुसंधान कार्य आरम्भ कर दिया गया है। इस प्रकार से कृषि वैज्ञानिकों का फोकस केवल अधिक उत्पादन देने वाली कस्मों के विकास पर ही नहीं रहेगा, बल्कि स्थानीय जलवायु और किसानों की परिस्थितियों के अनुरूप ही इन किस्मों में आवश्यक गुण विकसित करने पर भी रहेगा। विशेषरूप से अधिक गर्मी को सहन करने वाली किस्मों को विकसित करने पर भी काम किया जा रहा है।

विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक ऐसी किस्मों को विकसित करने की दिशा में कार्य कर रहे हैं, जो कि अधिक लवणता को सहन करने में भी सक्षम हों। सामान्य रूप से किसी भी फसल की नई किस्म को विकसित करने में तीन से चार वर्ष का समय लगता है। किस्म के विकास के बाद परीक्षण और किसानों के स्तर पर मूल्यांकन के चरणों के पूरा हों जाने के बाद ही इन्हें व्यापक स्तर पर किसानों को खेती करने के लिए उपलब्ध कराया जा सकेगा।

‘‘विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक सब्जी की ऐसी किस्मों को विकसित करने के लिए काम कर रहे हैंे जो कि रोग एवं कीट प्रतिरोधी होने के साथ ही गर्मी और लवणता के जैसी परिस्थितियों को भी अच्छे तरीके से सहन करने में सक्षम हो। ऐसे में प्याज, लहसुन, बैंगन और कद्दू वर्गीय सब्जियों की किस्मों पर अनुसंधान का काम प्रारम्भ किया जा चुका है और आगामी पाँच वर्षों में इन नई किस्मों के बीज किसानों के लिए उपलब्ध हो सकेंगे।’’

   - डॉ0 एस. के मलहोत्रा, वीसी, महाराणा प्रताप उद्यान विश्वविद्यालय करनाल, हरियाणा।

विकसित किस्मों के बीज बाजार तक पहुँचने में विभिन्न चरणों से गुजरते हैं

किसी भी फसल की नई प्रजाति के विकसित हो जाने के बाद सीधे किसानों को उपलब्ध नहीं कराया जाता है। इस प्रक्रिया में पहले शोध, चयन और परीक्षण आदि की प्रक्रिया को पूर्ण किया जाता है। विश्वविद्यालय के अनुसार किसी नई किस्म को विकसित करने में तीन से चार वर्ष तक का समय लग सकता है। अतः किसानों को कृषि वैज्ञानिकों के द्वारा विकसित की जा रही किस्मों के बीज को खेतों में लगाने के लिए अभी कुछ समय और इंतजार करना पड़ेगा।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।