
टमाटर की खेती एवं बीजोत्पादन Publish Date : 08/09/2026
टमाटर की खेती एवं बीजोत्पादन
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं गरिमा शर्मा
टमाटर भारतवर्ष में वृहद रूप से उगाई जाने वाली सब्जी की फसल है। यह फसल ताजे उपयोग और प्रसंस्करण करने के लिए उगाई जाती है। यद्यपि पके हुए फल में 94 प्रतिशत पानी होता है, फिर भी यह विटामिन ए, बी तथा सी का एक बहुत अच्छा स्रोत है। यह बहुत ही पाचक, कब्ज को दूर करने वाली एवं अच्छे स्वाद वाली सब्जी है। इसका उपयोग उबाल कर या कच्चे रूप में सूप, सलाद, प्रसंस्कृत अचार चटनी, कैचप, सॉस तथा अन्य उत्पादन में किया जाता है।
मौसम
टमाटर एक हल्के मौसम की फसल है। टमाटर की फसल न केवल पाले के प्रति संवेदनशील होती है बल्कि इसका अत्यन्त कम तापमान पर भी अच्छा उत्पादन प्राप्त नहीं होता है। अधिक तापमान के साथ शुष्क हवा एवं कम आर्द्रता की स्थिति में फूलों के अंग अधिकतर नष्ट या चोटिल हो जाते हैं। अन्ततः फल नहीं बनता है, टमाटर के परागकण सर्वाधिक परागित 21.4 डिग्री सेन्टीग्रेड से 29.4 डिग्री 10 डिग्री सेन्टीग्रेड एवं 37 डिग्री सेन्टीग्रेड पर बहुत कम परागित होते हैं। तापमान के अनुकूल नहीं होने पर फल नहीं बनते हैं। यद्यपि टमाटर सूखे के प्रति काफी सहनशील हैं, परन्तु सूखे या अधिक बरसात में ब्लासम एण्ड रॉट रोग इसके फलों पर आता है। सूखे के बाद नमी होने पर फलों में फटन पैदा हो जाती है।
उपयुक्त भूमि
टमाटर की खेती (हल्की बलुई से भारी चिकनी मृदा) हर प्रकार की मृदा में की जा सकती है, परन्तु बीजोत्पादन के लिए अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है। जहां पर वृद्धि के लिए कम समय मिलता है, वहां हल्की मृदा (बलुई दोमट) टमाटर की खेती के लिए उपयुक्त होती है।
बीजदर
सामान्य किस्में - 500 ग्राम (10 ग्राम प्रति नाली)
संकर किस्में - 300 ग्राम (6 ग्राम प्रति नाली)
बीज बोने का उचित समय
तराई तथा भावर क्षेत्र (900 मीटर की ऊंचाई तक)
नर्सरी - अगस्त/ सितंबर
रोपाई - सितंबर / अम्टूबर
निचली पर्वतीय घाटियों वाले क्षेत्र (900 से 1500 मीटर की ऊंचाई तक)
नर्सरी - जनवरी/फरवरी
रोपाई - मार्च/अप्रैल
3. उच्च क्षेत्र (800 से 2500 मीटर की ऊंचाई तक)
नर्सरी - अप्रैल/मई
रोपाई - जून/जुलाई
खरपतवार नियंत्रण
खरपतवार नियंत्रण के लिए रापाई से दो दिन पूर्व बासालीन 2.5 ली. प्रति हैक्टेयर प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। 0.5 मिली. बासाजीन को प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर खेत में समान रूप से छिड़काव कर देना चाहिए। इसके बाद खेत की एक हल्की जुताई कर देनी चाहिए, जिससे कि यह मृदा में भली-भाँति मिल जाए।
खाद एवं उर्वरक
सामान्य किस्में - नत्रजन 100 कि.ग्रा.
- फास्फोरस 60 कि.ग्रा
- पोटाश 60 कि.ग्रा.
संकर किस्में - नत्रजन 150 कि.ग्रा.
- फास्फोरस 90 कि.ग्रा
- पोटाश 90 कि.ग्रा.
- गोबर की खाद 10 टन।
नर्सरी एवं बीज की बुवाई
टमाटर की पौध तैयार करने के लिए यथा संभव नई जगह का चुनाव करना चाहिए। एक हैक्टेयर क्षेत्र की पौध तैयार करने के लिए 7x75x15 मी. की 15 क्यारियों की आवश्यकता होती है, इन क्यारियों में अच्छी सड़ी हुई गोबर/कम्पोस्ट की खाद एवं मोटी रेत/मौरंग को समानुपात में मिलाकर 3 इंच मोटी परत बिछा देते हैं। इसके पश्चात क्यारियों का निजर्मीकरण कर देते है, यदि निजर्मीकरण नहीं हो पाया है तो प्रत्येक क्यारी में 100 ग्राम फ्यूराडान मृदा मिश्रण में मिला देते हैं और उपचारित क्यारियों में 5 सेमी. की दूरी पर 1 सेमी. की गहराई में बीज की बुवाई कर देते हैं, एवं बुवाई के पश्चात पुआल से ढक देते हैं और अंकुरण के पश्चात पुआल को हटा लेते हैं।
रोपाई एवं दूरी
1. पौध की रोपाई दोपहर के बाद शाम के समय करना उचित रहता हैं।
2 पौध की जड़ को फैलाकर एवं सीधा करके उसका रोपण करते हैं।
3. रोपण कर देने के पश्चात हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए।
4- रोपाई करने के 4-5 दिन पश्चात जहां पर पौधे सूख गए हों उन स्थानों पर नई पौध का रोपण कर खाली स्थानों को भर देना चाहिए।
5. टमाटर के पौधों की रोपाई मेड़ों पर करना अधिक लाभदायक होता है।
6. पौधों से पौधों की दूरी 60 सेमी. या 75 सेमी. रखी जाती है।
7. लाइन की दूरी 45 सेमी. रखना उचित रहता है।
8. बीजोत्पादन के लिए पौधों की आपसी दूरी 75 सेमी. X 60 सेमी. रखनी चाहिए।
उचित फसल चक्र
टमाटर की खेती लगातार एक ही खेत में नहीं करनी चाहिए। इसके लिए कम से कम एक वर्ष का अन्तराल रखना आवश्यक है और यदि बैक्टीरियल बिल्ट का प्रकोप फसल में रहा है तो कम से कम तीन वर्ष का अंतर रखना चाहिए। उचित फसल चक्र के लिए धान, मक्का, ज्वार, गेहँू, मूली, तरबूज, प्याज, लहसुन, मूँगफली, कपास, कुसुम, सूरजमुखी, तिल और शकरकन्द आदि का प्रयोग किया जा सकता है।
ट्रेनिंग एवं पौधे को सहारा देना
टमाटर के पौधे में नीचे की 2-3 शाखाओं को निकाल देते हैं. जिससे कि ऊपर की शाखाएं पुष्ट एवं मजबूत हो सकें। इसके अतिरिक्त फल लगने से पूर्व पौधों को लकड़ी के डंडे के साथ अंग्रेजी के 8 के आकार की तरह से सुतली से बांध देते हैं, जिससे पौधा सीधा रहे एवं फल जमीन पर न गिरे। यह क्रिया टमाटर की इनडिटरमिनेट किस्म के लिए तो अत्यन्त आवश्यक होती है।
सिंचाई
टमाटर में नमी बनाए रखने के लिए हल्की एवं जल्दी सिंचाई की जाती हैं। अतः 8-10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करना अत्यन्त उपयुक्त होता है।
मिट्टी चढ़ाना
खेतों में प्रत्येक उर्वरक के प्रयोग के पश्चात पौधों पर मिटटी चढ़ा देते हैं। अतः दो बार 20 दिन एवं 50 दिन पश्चात मिट्टी चढ़ाना लाभदायक होता है।
पृथक्करण दूरी
टमाटर में किस्म की आनुवांशिक शुद्धता बनाए रखने के लिए एक किस्म से दूसरे किस्म के मध्य 50 मी. की दूरी रखते हैं, जिससे शुद्ध बीज प्राप्त हो सकें।
अवांछनीय पौधों को निकालना
आनुवांशिक शुद्धता के लिए बीजोत्पादन में यह एक महत्वपूर्ण क्रिया है। अवांछनीय पौधों को किस्म की विशेषता के आधार पर निकाला जाता है। फसल काल के दौरान यह क्रिया दो बार की जाती है- वानस्पतिक वृद्धि के समय यह क्रिया पौधों के आकार, पत्तियों की बनावट एवं रंग के आधार पर की जाती है तो दूसरी बार फल लगने पर फल के आकार एवं रंग के आधार पर की जाती है।
प्रजातियों एवं उपलब्धि का स्रोत
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प्रजाति |
किस्म |
उपलब्धि का स्रोत |
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सामान्य किस्में |
पंत टी-3, पंत बहार |
गो. व. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, पंतनगर। |
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पूसा गौरव पूसा रूबी पूसा शीतल |
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली। |
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संकर किस्में |
पूसा हाइब्रिड-2 पूसा हाइब्रिड-4 |
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली। |
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रूपाली, नवीन लहर, यश एम.टी.एच.-15 अविनाश-2 मनीषा, वैशाली सी.टी.एन.-230 |
मूल बीज उत्पादक बीज कम्पनी अथवा कम्पनी के मान्यता प्राप्त बीज विक्रेता। |
टमाटर में वृद्धि नियामकों का प्रयोग
पी.सी.पी.ए. (पैराक्लोरोफिनाक्सी अम्ल) को 50 मिग्रा प्रति ली. पानी में या 10 ग्राम प्रति का छिड़काव फूल लगने पर करने से बहुत कम या अधिक तापमान पर फल लगने में सुविधा हो इसी प्रकार साइकोसिल के 5 ग्राम 10 लीटर पानी में मिलाकर रोपाई से 3-4 दिन पूर्व नर्सरी में व रोपाई करने के 25 दिन बाद करने पर पत्ती मोड़ विषाणु का प्रकोप कम हो जाता है।
टमाटर के प्रमुख कीट एवं व्याधियां
1. फल छेदक कीट
यह कीट टमाटर के फलों में छेद करके अंदर घुस जाता है और फलों को खाकर क्षतिग्रस्त करता है, जिससे फल सड़ने लगता है।
नियंत्रण
- एण्डोसल्फान 2 मिली प्रति ली. पानी में या कार्बरिल पावडर 4 ग्रा. या डेसिस 0.5 मिली प्रति ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने से कीट का नियंत्रण होता है।
2. पर्ण सुरंगक
इसका मैगट पत्तियों में आड़े तिरछे तरीके से सुरंग बनाती है। यह सुरंग बैक्टीरिया एवं
विषाणु आदि के प्रकोप को बढ़ाती है।
नियंत्रण
आक्सी डिमेटानमिथाइल 25 ई.सी. या नीम का तेल 5 मिली. प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करने से प्रभावी नियंत्रण होता है।
3. सफेद मक्खी
यह पत्तियों से रस चूसकर उसे विकृत करता है एवं विषाणु रोग फैलाता है।
नियंत्रण
क्यारी को एग्रोनेट से ढक देते हैं। मक्का/ज्वार/बाजरा/बैरियर फसल के रूप में बुवाई
करते हैं। मेटासिस्टाक्स 2 मिली. प्रति ली. पानी में मिलाकर छिड़क दें एवं 25-30 पीले चिपकने वाले ट्रेप्सिन खेत में लगाकर सफेद मक्खी की संख्या का अनुश्रवण करते हैं।
4. रसाद कीट
यह कीट पौधों की नाजुक पत्तियों से रस चूस लेते हैं। परिणामतः पत्तियां ऊपर की तरफ मुड़ने लगती हैं। यह टमाटर का चित्तीदार विल्ट विषाणु को फैलाता है।
नियंत्रण
मोनोक्रोटोफास 1.5 मिली. या फॉस्फोमिडान 1 मिली. या मेटासिस्टाक्स 2 मिली. प्रति ली. पानी दर से छिड़काव करने से नियंत्रण होता है।
5. पर्ण फुदका
इसके अर्भक व वयस्क पत्तियों एवं मुलायम तनों का रस चूसते हैं, जिससे ग्रसित भाग जला हुआ प्रतीत होता है।
नियंत्रण
मोनोक्रोटोफास 36 एस.एल. 1.5 मिली. या फास्फोमिडान 1 मिली. या आक्सीडिमेटान मिथाइल 25 ई.सी. 2 मिली. प्रति ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।
6. चींटी
यह पत्तियों से रस चूसती है, जिससे पीली या सफेद धारियां बन जाती हैं और अंततः पौधा मर जाता है।
नियंत्रण
घुलनशील गंधक 80 डब्ल्यू.पी. 2 या डाइकोफाल 18.5 ई.सी. 2.5 मिली. या टेफेथियान 50 ई. सी. 2 मिली. प्रति ली. पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें।
टमाटर की प्रमुख व्याधियां
1. जीवाणुज म्लानि
अचानक पौधा गलने लगता है. ओज परीक्षण से निश्चित किया जा सकता है।
नियंत्रण
1. स्ट्रेप्टोसाइक्लीन 1 ग्राम प्रति 10 लिटर पानी में या वैक्टीरियोमाइसिन एक ग्राम प्रति 3 लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।
2. उचित फसल चक्र अपनाएं।
3. प्रमाणित एवं उपचारित बीजों का प्रयोग करें।
4. पौधों के अवशेष को नष्ट कर दें।
2. फ्यूजेरियम म्लानि
पत्तियाँ पीली पड़ कर गलने लगती हैं, पत्तियाँ पौधों के तनों से चिपट जाती है। प्रमुखतः कुछ शाखाएँ ही गलती है।
नियंत्रण
कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यू० पी० एक ग्राम या टापसिन एक ग्राम या थीरम 75 डब्ल्यू. पी. 2 ग्राम प्रति ली पानी की दर से घोल बनाकर पौधों आस-पास की मृदा को भली-भांति नम करने से लाभ प्राप्त होता है।
2. उचित फसल चक्र अपनायें।
3. गर्मियों में खेती की गहरी जुताई करें।
4. यथासम्भव उपचारित बीज का ही प्रयोग करना चाहिए।
3. अगेती अंगमारी
फल, तनों एवं पत्तियों पर गोल अंगूठी जैसा निशान बन जाता है।
नियंत्रण
क्लोरोथैलोनिल 75 डब्ल्यू.पी. 1.5 ग्राम या डोडाइन 65 डब्ल्यू.पी. एक ग्राम या थीरम 3 मिली या कैप्टाफाल 75 डब्ल्यू.पी. 1.5 ग्राम या रिडोमिल एम.जेड. 72 डब्ल्यू.पी. एक ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर 10 दिन के अंतराल पर छिड़काव करना उचित रहता है।
4. पछेती अंगमारी
पत्तियों पर भूरा या बैंगनी रंग के धब्बे हो जाते हैं।
नियंत्रण
रिडोमिल एम.जेड. 72 एक ग्राम या फोसिटील ए. एल. 80 डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम या क्लोरोथैलोनिल 1.5 ग्राम प्रति ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना सही है।
5. चूर्णिल आसिता
पत्तियों की निचली सतह पर सफेद चूर्णिल बढ़त, जिससे ऊपरी सतह पीली पड़ जाती है।
नियंत्रण
फेनरीमोल 12 ई.सी. 0.25 मिली. या डाइनोकैप 48 ई.सी. 0.5 मिली. ट्राईडेमार्फ 80 ई.सी. 0.5 मिली या घुलनशील गंधक 2 ग्राम प्रति ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करे।
6. पर्ण चित्ती
पत्तियों के धब्बे किनारों पर भूरे एवं बीच में सलेटी रंग के हो जाते हैं।
नियंत्रण
टापसिन 75 डब्ल्यू.पी. एक ग्राम या ट्रईडेमेंफान 25 डब्ल्यू.पी. एक ग्राम या ट्राइडेमार्फ 80 ई.सी.0.5 मिली या क्लोरोथेलोनिल 75 डब्ल्यू.पी. 1.5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें।
7. मूल ग्रन्थि
पौधा छोटा रह जाता है। पत्तियों का पीला पड़ जाना और जड़ों में गांठ बन जाना प्रमुख लक्षण होते हैं।
नियंत्रण
मोनोकाट और गैंदा का फसल चक्र अपनाने से लाभ होता है। नीमकेक 500 कि.ग्रा. प्रति एकड़ या फोरेट 10 जी 10 किग्रा प्रति की दर से अंतिम जुताई पूर्व खेत में मिलाएं।
8. मूल ग्रन्थि
पौधे की बढ़त रूक जाती है और जड़ों में गांठें बन जाती हैं।
नियंत्रण
मोनोकाट और गैंदा के फसल चक्र को अपनाना चाहिए। नीमकेक 500 कि.ग्रा. प्रति एकड़ या 12-15 फ्यूराडान-3जी 12-15 कि.ग्रा. प्रति एकड़ की दर से खेत में रोपाई करने से पहले मिला देना चाहिए।
9. टमाटर का पर्ण कुंचन
पौध की वृद्वि का रूक जाना, पत्तियों का नीचे की ओर मुड़ जाना इसके प्रमुख लक्षण हैं। यह विषाणु सफेद मक्खी के माध्यम से फेलता है।
नियंत्रण
सफेद मक्खी के नियंत्रण के उपाय अपनाना चाहिए। रोगी पौधों को खेत से बाहर निकान दें और पौधों की नर्सरी में एग्रोनेट का उपयोग करें।
10. मौजेक विषाणु
ग्रसित पौधों की पत्तियों में मौजेक की तरह हल्का एवं गहरा हरा एवं सफेद रंग स्पष्ट दिखाई पड़ता है।
नियंत्रण
उचित फसल चक्र अपनाएं। 1 प्रतिशत सप्रेटा वाला दूध या 2 प्रतिशत गाय के दूध का छिड़काव करने से विषाणु का अन्य पौधों में प्रसार रूक जाता है।
11. चित्तीदार विषाणु
पत्तियों के रंग का अचानक भमरा या बैंगनी हो जाना और फूल, फल में परिवर्तित हो जता है। इसके साथ ही पौधों की पत्तियों एवं फलों में अधिक संख्या में काले रंग के धब्बे दिखाई देने लगते हैं, जो कि रसाद कीट के कारण से होता है।
नियंत्रण
रसाद कीट का नियंत्रण करना चाहिए और ग्रसित पौधों को जड़ सहित उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए।
फलों की तुड़ाई
टमाटर की तुड़ाई परिपक्वता उद्देश्य के अनुसार की जाती है। फलों के प्रयोग के अनुसार, टमाटर के फल की तुड़ाई निम्नांकित अवस्थाओं में की जाती है-
1. हरी अवस्था
बाजार अधिक दूरी पर होने पर फल को हरी अवस्था में ही तोड़ लिया जाना चाहिए।
2. गुलाबी अवस्था
लोकल मार्केट में ले जाने के लिए फल के नारंगी या गुलाबी होने पर तुड़ाई की जाती हैं।
3. परिपक्व अवस्था
फल लाल हो जाता है एवं मुलायम हो जाता है। ऐसे पौधों को घर के प्रयोग में लाया जाता है।
4. पूर्ण परिपक्व अवस्था
रंग का विकास पूर्ण हो जाता है। ऐसी अवस्था में फल की तुड़ाई केनिंग अथवा प्रसंस्करण के उद्देश्य से की जाती है।
टमाटर का बीजोत्पादन
टमाटर के बीजोत्पादन एवं फलोत्पादन की विधि एक जैसी ही है। एक-एक पौधा जिनमें उचित आकार के पौधों को चिन्हित कर लेते हैं और पके हुए फलों को बीज निकालने के लिए इकट्ठा कर लेते हैं। टमाटर के बीज को निम्नांकित विधि से निकालते हैं।
1. किण्वन विधि
एकत्रित फलों को खेत के समीप गड्ढे में पालीथीन डालकर तोड़ देते हैं एवं एक-दो दिन तक सड़ने देते हैं. इसके पश्चात उसे साफ पानी में डाल देते हैं. गूदा और छिलका ऊपर तैरने लगता है एवं बीज नीचे बैठ जाता है.
2. अम्ल द्वारा
14 किलो टमाटर को फोड़ने के पश्चात 100 मिली. व्यवसायिक हाइड्रोक्लोरिक अम्ल भली-भांति मिलाते हैं. 30 मिनट के पश्चात बीज गूदे से अलग हो जाता है. बीज निकाल कर साफ करने के पश्चात धूप एवं छांव में सुखाकर उचित नमी होने पर भण्डारण करते है.
3. क्षारीय उपचार विधि
गूदे को क्षारीय मिश्रण से उपचारित करते हैं. (300 ग्राम धोने वाले सोडे को 4 ली. उबलते हुए पानी में मिलाते हैं) पल्प एवं क्षारीय मिश्रण को समानुपात में मिलाते हैं.
उपज
टमाटर में औसतन 75 किलोग्राम बीज की प्राप्ति प्रति हैक्टेयर तक हो जाती है।
लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।