आलू की खेती करने की उन्नत विधि      Publish Date : 01/04/2026

       आलू की खेती करने की उन्नत विधि

                                                                       प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, डॉ0 रेशु चौधरी एवं गरिमा शर्मा

भारत में आलू एक बहुत महत्व्पूर्ण फसल है। तमिलनाडु एवं केरल राज्यों को छोडकर पूरे देश में आलू को सफलता पूर्वक उगाया जाता है। भारत में आलू की औसत उपज 152 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है, जो कि आलू की वैश्विक औसत उपज की तुलना में काफी कम है। अन्य फसलों की तरह आलू की अच्छी पैदावार के लिए इसकी उन्नत किस्मों के रोग रहित बीज की उपलब्धता का होना बहुत आवश्यसक है। इसके अलावा उर्वरकों का उपयोग, सिंचाई की व्यवस्था, तथा रोग नियंत्रण के लिए दवा के प्रयोग का भी उपज पर गहरा प्रभाव पडता है।

भूमि एवं जलवायू सम्बन्धी आवश्यजकताएं:

आलू की सफल खेती के लिए जीवांश युक्त बलूई-दोमट मिट्टी अच्छी होती है। भूमि में जल-निकासी की उत्तम व्यबवस्था  होनी चाहिए। आलू के लिए क्षारीय तथा जल भराव अथवा खडे पानी वाली भूमि अच्छी नहीं मानी जाती है। बढवार के समय आलू को मध्यम शीत की आवश्यकता होती है।

आलू की खेती के लिए उन्नत किस्मों का बीजः

                                  

आलू की काश्त में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसका बीज उत्तमू श्रेणी का हो। अच्छे बीज विशेषकर रोगाणूमुक्त बीज का प्रयोग करके आलू की पैदावार बढाई जा सकती है। अच्छी उपज के लिए जलवायू खण्ड या क्षेत्र के अनुसार सिफारिश की गई उपयुक्त किस्मों का चुनाव करना महत्वपूर्ण है।

उपयुक्त माप के बीज का चुनाव करना आवश्यकः

आलू के बीज का आकार और उसकी उपज से लाभ का आपस मे गहरा सम्बन्ध होता है। बडे माप के बीजों से उपज तो अधिक होती है परन्तु बीज की कीमत अधिक होने से पर्याप्त लाभ नही होता है। बहूत छोटे माप के आलू का बीज सस्ता तो होगा परन्तु रोगाणुयुक्त आलू पैदा होने का खतरा बढ जाता है। प्रायः देखा गया है कि रोगयुक्त फसल में छोट माप के बीज का अनुपात भी अधिक ही होता है। इसलिए अच्छे लाभ के लिए 3 से.मी. से 3.5 से.मी. आकार या 30-40 ग्राम भार के आलूओं को ही बीज के रूप में प्रयोग करना चाहिए।

आलू बुआई का समय एवं बीज की मात्राः

उत्तर भारत में, जहॉ पाले का पडना एक आम बात है, आलू को बढने के लिए कम समय मिलता है। अगेती बुआई से बढवार के लिए लम्बा समय तो मिल जाता है, परन्तु उपज अधिक नही होती क्योंकि ऐसी अगेती फसल में बढवार व कन्द का बनना प्रतिकूल तापमान मे होता है और साथ ही बीजों के अपूर्ण अंकुरण व सडन का खतरा भी बना रहता है। अतः उत्तंर भारत मे आलू की बुआई इस प्रकार करनी चाहिए जिससे कि आलू दिसम्बार के अंत तक पूरी तरह से बन जाए। देश के उत्तर-पश्चिमी भागों मे आलू की बुआई का उपयुक्त समय अक्टूबर माह का पहला पखवाडा है तो वहीं पूर्वी भारत में आलू अक्टूबर के मध्य् से जनवरी तक बोया जा सकता है।

आलू की फसल में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 50 से.मी. व पौधे से पौधे की दूरी 20-25 से.मी. रखनी चाहिए। इसके लिए 25 से 30 क्विंटल बीज प्रति हैक्टेयर की दर से पर्याप्त रहता है।

बुआई की विधिः

आलू के पौधों के बीच दूरी को कम रखने से प्रकाश, पानी और पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ जाती है और फलस्वरूप छोटे आकार के आलू पैदा होते हैं। वहीं अधिक पौधों के बीच अधिक दूरी रखने से प्रति हैक्टेयर पौधो की संख्या कम हो जाती है, जिससे आलू का आकार तो बढ जाता है परन्तु कुल उपज कम हो जाती है। इसलिए कतारों और पौधो की दूरी में ऐसा संतुलन बनाना जरूरी होता है कि न उपज कम हो और न आलू का आकार कम हो। उचित आकार के बीज के लिए पंक्तियों मे 50 से.मी. का अन्तर व पौधों में 20 से 25 से.मी. की दूरी रखनी चाहिए।

उर्वकों का प्रयोगः

                                   

फसल में प्रमुख तत्व अर्थात नत्रजन, फास्फोरस व पोटाश पर्याप्त मात्रा में डालना चाहिए। नत्रजन से फसल की वानस्पातिक बढवार अधिक होती है और पौधे के कंदमूल के आकार में भी वृद्धि होती है परन्तु उपज की वृद्धि में कंदमूल के अलावा उनकी संख्या का भी प्रभाव पडता है। फसल के आरम्भिक विकास और वानस्पतिक भागों को शक्तिशाली बनाने में पोटाश सहायक होता है। इससे कंद के आकार व संख्या मे बढोतरी होती है। आलू की फसल में प्रति हैक्टेयर 120 कि.ग्रा. नत्रजन, 80 कि.ग्रा. फास्फोरस और 80 कि.ग्रा. पोटाश का प्रयोग करना चाहिए। उर्वरकों की मात्रा मिट्टी की जांच के आधार पर निर्धारित की जाती है। बुआई के समय नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा देनी चाहिए। नत्रजन की शेष आधी मात्रा पौधों की लम्बाई 15 से 20 से.मी. होने पर पहली मिट्टी चढाते समय देनी चाहिए।

आलू में सिंचाईः

आलू में हल्की लेकिन कई सिंचाईयों की आवश्यकता होती है, परन्तु खेत में पानी कभी भी भरा हुआ नही रहना चाहिए। खूडों या नालियों में मेढों की उंचाई के तीन चौथाई भाग से से अधिक पानी नही भरना चाहिए। पहली सिंचाई अधिकांश पौधे अंकुरण के बाद एवं दूसरी सिंचाई उसके 15 दिन बाद आलू बनने व फूलने की अवस्था में करनी चाहिए। कंदमूल बनने व फूलने के समय पानी की कमी का आलू की उपज पर विपरीत प्रभाव पडता है। इन अवस्थाओं में पानी 10 से 12 दिन के अन्तर पर दिया जाना चाहिए। पूर्वी भारत में अक्तूबर के मध्य से जनवरी तक बोई जाने वाली आलू की फसल मे सिंचाई की उपयुक्त मात्रा 50 से.मी. (6 से 7 सिंचाइयॉ) होती है।

आलू में खरपतवार की रोकथामः

आलू की फसल में कभी भी खरपतवार न पनपने देने चाहिए। खरपतवार की प्रभावशाली रोकथाम के लिए बुआई के 7 दिनों के अन्दर, 0-5 किलोग्राम सिमैजिन 50 डब्यू. के. पी. (Cizamin 50 w.p.) या लिन्यिरोन (Linuron) का घोल 700 लीटर पानी मे बनाकर प्रति हैक्टे्यर की दर से छिडकाव करना चाहिए।

आलू कटाई या खुदाई कार्यक्रमः

आलू की पूरी तरह से पकी फसल की कटाई उस समय करनी चाहिए जब आलू के कन्दो के छिलके सख्त हो जाएं। पूर्णतया पकी एवं अच्छी फसल से लगभग 300 क्विंटल प्रति हैक्टेयर की उपज प्राप्त़ होती है।

आलू में लगने वाले कीट पतगें, सुत्रकृमि तथा रोगः

आलू की फसल में कंद वाले शलभ (Tubber Moth), कटुवा कीडे, जैसिड (Jassid) और माहू या चेंपा (Afid) आदि से बहुत नुकसान होता है।

टयूबर मॉथ कीडे के लारवा कंदमूल मे सुराख बना देते हैं। यदि कंद को मिट्टी से पूरी तरह से ढका न गया तो ये कीडे फसल को बहुत अधिक नुकसान पंहुचाते है। कंद वाले शलभ जैसे ही दिखाई दें इन पर 0.07 प्रतिशत ऐन्डोसल्फोन या 0.05 प्रतिशत मैलाथियान का छिडकाव कर कन्द को मिट्टी से ढक दना चाहिए।

  • कटुवा कीडे पौधों को उनकी जडों के पास, भूमि के नीचे से ही काट देते हैं। इनकी रोकथाम के लिए बुआई से पहले 5 प्रतिशत एल्ड्रिन या हैप्टाकक्लोंर 20 से 25 किलोग्राम प्रति हैक्टे्यर की दर से खेत की मिट्टी में मिलाऐं। खडी फसल में कटुवा का प्रकोप होने पर उपरोक्त दवा का बुरकाव पौधों की निचली सतह पर करना चाहिए।
  • जैसिड नर्म शरीर वाले हरे रंग के कीडे होते हैं जो पौधों के पत्तों और अन्य कोमल भागों का रस चूस लेते हैं।
  • माहू या चेंपा ( एफिड), आलू में लगने वाले हरे रंग के कीडे होते हैं जो पत्ती की निचली सतह पर पाए जाते हैं और पत्तों का रस चूसते हैं। इनके कुप्रभाव से पौधों की पत्तीयाँ उपर को मुड जाती हैं और उनकी बढवार रूक जाती है। माहू या चेंपा लगने पर 0.07 प्रतिशत ऐन्डोरसल्फान या 0.05 प्रतिशत मैलाथियान का छिडकाव कने से लाभ होता है।

जड गांठ सुत्रकृमि (Root Knote Nematode) से प्रभावित पौधे की पत्तियाँ सामान्य पौधों की पत्तियों से बडी हो जाती हैं और रोगी पौधों की बढवार रूक जाती है तथा गर्म मौसम में रोगी पौधे सूख जाते हैं। जडों मे अत्यिधिक गॉठे हो जाती हैं। जडों की दरारों में प्राय दूसरे सूक्ष्म्जीव जैसे फफूंद, जीवाणू आदि का आक्रमण होता है। इससे बचाव के लिए फसल चक्र में मोटे अनाज वाली फसलों को शामिल करना चाहिए। ग्रीष्म ऋतु में 2-3 बार गहरी जुताई करनी चाहिए। बुआई से पहले एल्डोकार्ब, कार्बाफ्यूरान का 2 किलोग्राम सक्रिय भाग प्रति हैक्टेयर की दर से खेत में प्रयोग करना चाहिए।

आलू की फसल मे अनेक बीमारीयॉ जैसे झुलसा, पत्ती मुडना व मोजेक आदि लगती हैं। इन बीमारियों से फसल को बहुत नुकसान होता है। अतः इन बीमारियों से फसल को बचाना बहुत आवश्याक है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।