
आलू में फसल प्रबन्धन कैसे करें? Publish Date : 10/12/2025
आलू में फसल प्रबन्धन कैसे करें?
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
आलू की फसल लगभग 30 से 45 दिन हो जाने पर कृषक भाई अपनी फसल का उचित प्रबन्धन करके अपने उत्पादन को बढ़ा सकते हैं।
फसल सुरक्षा एवं प्रबंधन
आलू में लगने वाले प्रमुख रोग व कीट उसकी उत्पादकता एवं गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव डालते हैं, अधिक संक्रमण की स्थिति में आलू की फसल को 40-45 प्रतिशत तक का नुकसान हो जाता है। अतः आलू की अच्छी पैदावार हेतु समय-समय पर फसलों की देखभाल और साथ ही उसका प्रबंधन करते रहना चाहिये।
प्रमुख कीट एवं प्रबंधन
मॉहूः मॉहू आलू की फसल का प्रमुख एवं सर्वव्यापी कीट है। माइजस परसिकी व एफिस गौसपी नामक मॉहू आलू की फसल को अप्रत्यक्ष रूप से ज्यादा हानि पहुँचाते हैं। ये पत्ती के रस को चूसकर मुख्य वाहक के रूप में कार्य करते हैं तथा इस वायरस रोग से फसल को काफी नुकसान होता है। यदि इनकी संख्या 20 मॉहू/100 पत्ती हो जाए तो इनका प्रबंधन काफी जरूरी हो जाता है।
प्रबंधन
- नीम का अर्क 4 प्रतिशत का छिड़काव करें।
- आलू में पैलो स्ट्रीकी ट्रेप 10-12/हे. का प्रयोग करें।
- लेडी बर्ड बीटल परभक्षी कीट का संवर्धन करना चाहिए।
- अधिक संक्रमण के समय उपयुक्त कीटनाशक जैसे-इमिडाक्लोप्रिड (17.8 एस.एल.) 5 मिली. प्रति 10 लीटर पानी या एसीटामाप्रिड (1.5 मिली प्रति 3 लीटर पानी) को स्टीकर के साथ पानी में घोलकर फसल पर छिड़काव करना चाहिये।
सफेद मक्खीः यह कीट पत्तियों की निचली सतह पर अण्डे देता है और यह कीट मुख्य रूप से आलू में जेमिनी वायरस तथा एपिकल लीफ कर्ल वायरस के वाहक का काम करता है। जिसके निम्फ बाहर निकलने पर पत्तियों तथा तने का रस चूसकर पौधो को कमजोर, चिपचिपा एवं बीमार कर देते है। वायरस के कारण पत्तियाँ मुड़ जाती है और पौधे पीले पड़ जाते है।
प्रबंधन
- 10-12 यैलो स्ट्रिकी ट्रैप/हे. की दर से प्रयोग करें।
- खेत से समय-समय पर खरपतवार निकालते रहना चाहिए।
- रासायनिक प्रबंधन के लिए 10 दिनों के अन्तराल पर इमिडाक्लोप्रिड 3 मिली / 10 लीटर पानी या थायोंमेथॉक्जाम 1 ग्रा/लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
कर्तन कीट (कट वर्म): यह एक सर्वव्यापी व बहुभक्षी कीट है। आलू फसल को इस कीट की इल्लिया ज्यादा हानि पहुँचाती हैं। ये इल्लियां रात में आलू की नई शाखाओं या जमीन के नीचे दबे हुये कन्दों को खाती हैं। जब पौधों के तने नये एवं कोमल होते हैं तब इसका प्रकोप बहुत तेजी से फैलता है। बाद में यह कन्दों को छेदकर खाते हुये नुकसान करते हैं। जिससे कुल उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ता है, साथ ही बाजार में इनका दाम कम प्राप्त होता है।
प्रबंधनः
- गर्मियों में गहरी जुताई तथा भूमि सौर्यकरण की विधियाँ अपनानी चाहिए।
- इस कीट का प्रकोप दिखते ही डाइक्लोरावास 76 ई.सी. कीटनाशक को 1-1.5 मिली प्रति लीटर पानी में स्टीकर मिलाकर छिड़काव करना चाहिये।
- अण्ड परजीवी ट्राइकोग्रामा किलोनिस 50,000 अण्डे प्रति हेक्टेयर तथा अण्ड सुण्डी परजीवी किलोनस ब्लैकवर्नी 15,000 व्यस्क प्रति हेक्टेयर की दर से 2 से 3 बार छोड़ें।
- खेतों में प्रकाश प्रपंच का प्रयोग अवश्य करना चाहिये।
आलू का पतंगाः यह कीट आलू के कन्दों, खड़ी फसल और भण्डारण दोनों स्थानों पर क्षति पहुँचाता है। इसका वयस्क कीट आलू की आँखों में अण्डा देता है। जिनसे 15 से 20 दिन बाद सूड़ियाँ निकलती हैं। ये सूड़ियों कन्दों में घुसकर क्षति पहुँचाती हैं।
प्रबंधन
- जुताई करते समय पतंगा कीट की जो सुण्डियां दिखाई दें, उन्हें एकत्रित करके नष्ट कर दें।
- पतंगा की रोकथाम के लिए केवल प्रमाणित व स्वस्थ बीज ही बोएं साथ में आलू की गहरी बुवाई करनी चाहिए।
- आलू खुदाई के बाद खेत में उन पर तिरपाल या चादर से ढक दें, ताकि पतंगे उन पर अंडे न दे सकें।
प्रमुख रोग एवं प्रबंधन

अगेती झुलसा रोगः प्रमुख लक्षण फसल बोने के 3-4 सप्ताह बाद पौधों की निचली पत्तियों पर छोटे-छोटे, दूर-दूर बिखरे हुये कोणीय आकार के चकत्तों या धब्बों के रूप में दिखाई पड़ते हैं आकार में बढ़ने के साथ धब्बों का रंग भी बदल जाता है और बाद में ये भूरे व काले रंग के हो जाते हैं। रोग का प्रकोप ज्यादा होने पर पत्तियां सिकुड़कर जमीन पर गिर जाती हैं जिससे बीमारी के बीजाणु जमीन में एकत्र हो जाते हैं एवं बीमारी को अधिक तेजी से फैलाते हैं।
प्रबंधन
- फसल में बीमारी का संक्रमण दिखाई देने पर यूरिया (1 प्रतिशत) व मैंकोजेब (75 प्रतिशत) 0.2 प्रतिशत का छिड़काव करना चाहिये।
- रोग प्रतिरोधी प्रजातियों जैसे कुफरी बादशाह, कुफरी चिप्सोना, कुफरी लालिमा आदि को लगाना चाहिये।
- फसल में पहला छिड़काव मैन्कोजेब 2.5 ग्रा/लीटर पानी तथा 15 दिन बाद साईमाक्सोनिल एवं मैन्कोजेब 2.5 ग्रा/लीटर पानी के मिश्रण का छिड़काव करें, यदि रोग नियन्त्रण में न हो तो इसी प्रक्रिया को पुनः 15 दिन के अन्तराल पर दोहराएं।
- ब्लाइटास्क 50 का 0.3 प्रतिशत 12-15 दिनों के अन्तराल पर 2-3 बार छिड़काव करना चाहिए, बीमारी की तीव्रता होने पर मेटालेक्सिल युक्त मेंकोजेब का छिड़काव अवश्यकरना चाहिये।
पिछेती झुलसा रोगः प्रमुख लक्षण-पत्तियों की निचली सतहों पर हरे रंग के गोले बन जाते हैं जो बाद में भूरे व काले हो जाते हैं। पत्तियों में संक्रमण होने से आलू के कन्दों का आकार भी छोटा हो जाता है साथ ही उत्पादन में भी कमी आ जाती है।
प्रबंधन
- रोग प्रतिरोधी प्रजातियों का चयन करना चाहिये जैसे-कुफरी अलंकार, कुफरी ज्योति आदि।
- संक्रमण होने पर क्लोरोथैलोनिल 0.2 प्रतिशत या मेटालेक्सिल 0.25 प्रतिशत या मेंकोजेब 0.2 प्रतिशत का घोल बनाकर 3 से 4 बार 10 से 12 दिन के अन्तराल पर पर्णीय छिड़काव करना चाहिए।
- फसल में पहला छिड़काव मैन्कोजेब 2.5 ग्रा/लीटर पानी तथा 15 दिन बाद साईमाक्सोनिल एवं मैन्कोजेब 2.5 ग्रा/लीटर पानी के मिश्रण का छिड़काव करें, यदि रोगनियन्त्रण में न हो तो इसी प्रक्रिया को पुनः दोहराये।
स्कैब रोगः यह जीवाणुजनित रोग है। काले धब्बे कन्दों पर दिखाई पड़ते हैं। कन्दों में हल्के भूरे रंग के फोड़े के सामने स्कैब पड़ते हैं जो कुछ उभरे व गहरे होते है एवं गुणवत्ता खराब हो जाती है, जिसके कारण कन्द खाने योग्य नहीं रहजाते हैं।
प्रबंधन
प्रमाणित बीज का प्रयोग करना चाहिये। खेत की तैयारी के समय भूमि में ट्राइकोडर्मा हरजिनियम जैवफॅफूदनाशी (5-8 किग्रा प्रति हेक्टेयर) का प्रयोग करना चाहिये।
आलू के कन्दों को कार्बेन्डाजिम या बोरिक एसिड से उपचारित करने के पश्चात ही बोना चाहिये। आलू की फसल बुवाई के लगभग 20-25 दिन पूर्व सरसों की फसल बो देना चाहिये और आलू की खेत के तैयारी के समय पलटकर मिट्टी में अच्छे से मिला देना चाहिये। खेत की तैयारी के समय भूमि में ट्राइकोडर्मा हरजिनियम या विरडी जैवफॅफूदनाशी (5-8 किग्रा प्रति हेक्टेयर) का प्रयोग करना चाहिए। ट्राईकोडर्मा हरजिनियम या विरडी को 50 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर अच्छी तरह से 15 दिन के लिए रख देना चाहिए तथा पानी का छिड़काव दिन में एक बार अवश्य करें उसके बाद खेत की अंतिम जुताई से पहले सायं काल को ही संपूर्ण खेत में फैलाकर अगली सुबह खेत की जुताई कर देना चाहिए इस प्रकार से प्रयोग करने पर खेत में लगभग 60 प्रतिशत रोग कम हो जाता है। 2 वर्ष तक लगातार इसका प्रयोग करने पर कॉमन स्कैब रोग लगभग समाप्त हो जाता है। ध्यान रहे कि ट्राइकोडर्मा किसी अच्छे एवं प्रमाणित संस्थान से ही लें।
फास्फोरस की अधिकता से स्कैब या चेचक रोग के बढ़ने की संभावना अधिक होती है अतः फास्फोरस की उचित मात्रा (डी.ए.पी. 2.0 से 2.5 क्वि./हेक्टेयर के दर से)प्रयोग करना चाहिए।
भूरा विगलन रोगः यह जीवाणुजनित रोग है। इसमें रोग ग्रसित पौधे समान्य पौधों से बौने होते हैं जो कुछ ही समय में हरे के हरे ही मुरझा जाते हैं यदि इन पौधों में कन्द बनते हैं तो काटने पर भूरा घेरा देखा जा सकता है।
प्रबंधन
प्रमाणित बीज का प्रयोग करना चाहिए। गर्मियों में गहरी जुताई तथा भूमि सौरीकरण की विधियाँ अपनानी चाहिये। बुवाई से पूर्व खोद कर निकाले गये रोगी कन्दों को नष्ट कर देना चाहिए।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
