पराली के नीचे आलू की खेती की तकनीक      Publish Date : 02/12/2025

                  पराली के नीचे आलू की खेती की तकनीक

                                                                                                                                                                  प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं गरिमा शर्मा

  • “अब किसानों को न तो खेत की चिंता, न सिंचाई का फिक्र करनी होगी क्योंकि अब पराली के नीचे आलू उगाने को तैयार हैं किसान-“

  • आलू की खेती की इस नई तकनीक में बस जमीन के ऊपर रख दो बीज आलू और 3 माह के अंदर फसल हो जाएगी तैयार।

आलू की खेती के लिए न खेत की चिंता, न सिंचाई की फिक्र क्योंकि अब हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर के किसान भी अपने खेतों में पराली के नीचे आलू उगा सकेंगे। कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर (धौलाकुआं) ने पर्यावरण हितैषी इस तकनीक के सफल शोध के बाद पहली बार जिले के 10 किसानों को 50-50 किलो आलू का यह बीज वितरित किया है। इसका उद्देश्य किसानों को लाभान्वित करना और इस तकनीक का अधिक से अधिक प्रचार प्रसार करना है, जिससे कि आने वाले समय में जिले के मैदानी भागों में यह फसल एक नकदी फसल के रूप में उभरकर सामने आ सकेगी।

3 महीने में तैयार होगी आलू की फसल

दरअसल आलू की खेती करना एक मेहनत का काम है। इसमें पहले खेत को जोतना पड़ता है, फिर मेढ़ को तैयार करना पड़ती है और इसके बाद बीज को मिट्टी में बोया जाता है, लेकिन पिछले साल जिला सिरमौर में आलू की पैदावार के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने पर्यावरण हितैषी एक नई तकनीकी विकसित की थी। इस तकनीक के माध्यम से आलू की खेती के लिए अब न तो खेत को हल से जोतने की जरूरत है और न ही ज्यादा सिंचाई की। बस जमीन के ऊपर आलू का बीज रख दो और 3 माह के भीतर फसल तैयार हो जाएगी। चूंकि पिछले साल कृषि विज्ञान केंद्र के फार्म पर इस तकनीक से उगाए आलू की फसल के बहुत ही सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं इसलिए इस बार किसानों को पहली बार इसका बीज उपलब्ध करवाने के साथ-साथ तकनीकी पहलुओं से अवगत करवाया जा रहा है।

फिलहाल इन दो किस्मों पर किया गया है शोध

कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर में कृषि वैज्ञानिकों का यह शोध पूरी तरह से सफल रहा है। वैज्ञानिकों ने यहां आलू की कुफरी नीलकंठ और कुफरी ख्याति किस्म पर यह शोधकार्य किया था। कृषि फार्म की आधा हैक्टेयर भूमि पर इस तकनीक के माध्यम से आलू का उत्पादन किया गया। इसकी सबसे प्रमुख बात यह रही कि इस तकनीक में पराली का उपयोग किया गया, जिसे आमतौर पर जला दिया जाता है। पराली के नीचे और जमीन के ऊपर ही आलू की पैदावार की गई है। कृषि विज्ञान केंद्र में इस वर्ष जनवरी माह के अंत तक यह फसल पूरी तरह से तैयार हो जाएगी, जिसे फरवरी माह के शुरुआत में निकाल लिया जाएगा।

प्राकृतिक तरीके से तैयार की फसल

                                                               

बड़ी बात तो यह रही कि यह फसल पूरी तरह से प्राकृतिक विधि से तैयार की जा रही है। पिछले साल के परिणामों से उत्साहित हो, इस साल इस तकनीक से आलू उत्पादन के लिए और अधिक बड़े स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। अब किसानों को इसी फसल का बीज वितरित किया गया है। आलू की यह फसल भी जनवरी माह के अंत तक पूरी तरह से तैयार हो जाएगी। वैज्ञानिकों की मानें तो इस तकनीक को अपनाकर न केवल लागत मूल्य में कमी आएगी, बल्कि किसानों का समय, मजदूरों की दिहाड़ी व ट्रैक्टर आदि का खर्च भी बच सकेगा।

जमीन के ऊपर आलू की बिजाई

कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर के प्रभारी एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पंकज मित्तल के अनुसार, ‘‘इस आलू की बिजाई के लिए न तो खेत की जुताई की जाती है और न ही किसी भी तरह से मिट्टी को ढीला करना पड़ता है। धान की फसल की कटाई के तुरंत बाद ही नमीयुक्त खेत में आलू को मिट्टी (जमीन) के ऊपर रख दिया जाता है। आलू रखने के बाद उसे पौना से एक फीट तक पराली से ढका जाता है। इसके बाद घनजीवामृत का उपयोग और जीवामृत का ऊपर से स्प्रे किया जाता है। इस तकनीक में किसी भी प्रकार की रासायनिक खादों के प्रयोग करने की जरूरत नहीं पड़ती है। इसकी पराली द्वारा मल्चिंग की जाती है। इससे खेती में खरपतवार की समस्या से भी निजात मिलती है।’

                                                                         

इस तकनीक में पराली का प्रयोग अहम

डॉ. मित्तल ने बताया कि इस तकनीक से आलू उत्पादन में पराली का प्रमुख रूप से प्रयोग किया जाता है। चूंकि पराली जलाने से पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है और इससे न केवल वायु प्रदूषण बढ़ रहा है, बल्कि ग्रीन हाउस गैसों का भी उत्सर्जन हो रहा है। पराली इस समय पर्यावरण और मानव जीवन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आ रही है, लेकिन अब बेकार समझे जाने वाली इस पराली का उपयोग आलू उत्पादन में किया जा सकता है। इससे पराली खेत में ही डिकंपोज कर दी जाती है। इस तकनीक के जरिए कृषि वैज्ञानिकों ने कार्बन न्यूट्रल फार्मिंग अपनाने का बड़ा संदेश भी दिया है।

हर किस्म का आलू किया जा सकता है तैयार

प्रधान वैज्ञानिक डॉ. मित्तल की मानें तो इस तकनीक से हर किस्म का आलू तैयार किया जा सकता है। इसमें आलू के उत्पादन में किसानों को खेत में मेढ़ और नाली बनाने की जरूरत नहीं पड़ती है। आलू पर मिट्टी नहीं चढ़ेगी। शून्य जुताई इस तकनीक की विशेषता है। अब किसानों को खरपतवारनाशी रसायन स्प्रे नहीं करना होगा, क्योंकि धान की पराली से मल्चिंग के कारण आलू की फसल में खरपतवार नहीं उग पाएंगे.। इस तकनीक में लेबर की भी कम जरूरत पड़ेगी। किसी बड़ी मशीन या ट्रैक्टर की भी आवश्यकता नहीं होगी। आलू निकालने के लिए खेत खोदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इस तकनीक में आलू के जमीन के भीतर रहने की भी कोई समस्या नहीं है।

मात्र 3 सिंचाई ही काफी हैं

कृषि विज्ञान केंद्र में अपनाई गई इस तकनीक में सिर्फ 3 सिंचाईयों का ही प्रयोग किया गया। आमतौर देखा यह जाता है कि सामान्य तौर पर आलू की फसल तैयार करने में 10 से 15 दिन बाद सिंचाई की जरूरत पड़ती है। जब तक फसल तैयार नहीं हो जाती, तब तक इसकी 8-10 बार सिंचाई हो जाती है, लेकिन इस खेती में पानी पर होने वाला खर्च भी बचेगा। अगर बीच में बारिश हो जाए तो 3 बार भी इस खेती में पानी जरूरत नहीं पड़ेगी। एक बार फिर से इसी तकनीक के साथ कृषि विज्ञान केंद्र में आलू की फसल की बुआई की गई है, ताकि अगली बार और ज्यादा किसानों को इसका बीज वितरित किया जा सके।

ग्रेडिंग करना आसान

डॉ. मित्तल ने बताया कि इस तकनीक से आलू की ग्रेडिंग करना भी काफी आसान है, चूंकि आलू की शत प्रतिशत फसल जमीन के बाहर ही होती है, इसलिए फसल को एकत्र करते समय इसकी ग्रेडिंग करना भी काफी आसान होता है। इस तकनीक में कोई भी आलू जमीन के नीचे नहीं जाएगा। इससे आलू के कटने-फटने और जमीन के नीचे रहने की भी कोई समस्या नहीं है। ऐसी समस्या इस फसल की आम खेती में किसानों को पेश आती है। इस तकनीक से आलू निकालने के लिए खुदाई की भी जरूरत नहीं पड़ती है।

साइंटिफिक तरीके से की जा रही है रिसर्च

कृषि विज्ञान केंद्र सिरमौर के प्रभारी ने डॉ. पंकज मित्तल बताया, ‘सरकार और कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर किसानों की आय और फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए सांइटिफिक तरीके से रिसर्च कर रहा है, ताकि खेती में लागत भी कम आए। किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ने के लिए सरकार प्रयासरत है। फसलों के उत्पादन को बढ़ावा देने के साथ-साथ लोगों की सेहत का भी खास ख्याल रखा जा रहा है। आलू पर किया गया यह शोध भी आने वाले समय में किसानों के लिए काफी लाभकारी सिद्व होगा।’’

स्वास्थ्य के लिए भी है लाभकारी

प्रधान वैज्ञानिक डॉ. मित्तल ने बताया कि इस मर्तबा पहली बार 10 किसानों को 50-50 किलोग्राम आलू बीज वितरित किया गया है। अधिक से अधिक किसान इस तकनीक से लाभान्वित हो, इसके लिए कृषि विज्ञान केंद्र लगातार प्रयासरत है। इस तकनीक के साथ आने वाले समय में जिले के मैदानी इलाकों में आलू की फसल एक नकदी फसल के रूप में सामने आ सकेगी। उन्होंने बताया कि कुफरी नीलकंठ किस्म के आलू में एंटीऑक्सीडेंट और कैरोटीन एंथोसाइनिन जैसे तत्व पाए जाते हैं, यह तत्व सेहत के लिए लाभदायक होते हैं।

इस आलू में रोग प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा होती है। शुगर के मरीजों के लिए भी ये फायदेमंद है, अतः किसान इस तकनीक के साथ प्राकृतिक तौर पर इन किस्मों को अपनाकर लाभान्वित हो सकते हैं और अधिक जानकारी के लिए किसान भाई कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क कर सकते है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।