इस्राइल को युद्ध में जीत क्यों मिली      Publish Date : 02/10/2026

        इस्राइल को युद्ध में जीत क्यों मिली

                                                                                                            प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

इस्राइलियों ने लड़ाई सिर्फ इसलिए नहीं लड़ी कि उनके सामने अस्तित्व का खतरा था, बल्कि उन्हें अस्तित्वगत झूठ का जवाब देने के लिए एकजुट होना पड़ा।

हालाँकि, पीछे मुड़कर देखें, तो यह बात बेतुकी लग सकती है कि हमास के अंदर कई ऐसे लोग थे, जो यह मानते थे कि सात अक्टूबर, 2023 का नरसंहार न केवल इस्राइल को चोट पहुँचाएगा, बल्कि उसे बर्बाद भी कर देगा। उनकी यह धारणा गलत और घातक साबित हुई, पर उनका ऐसा मानना बेबुनियाद नहीं था। सिनवार और हमास के अन्य लोगों ने इस्राइल को एक ऐसे देश के रूप में देखा, जो सिर्फ एक बंधक के बदले में सिनवार समेत एक हजार से ज्यादा बंधकों को छोड़ने के लिए तैयार था। इस्राइल के नेता सख्ती की बातें तो करते थे, लेकिन इस्राइली जनता की समृद्धि और शांति को ठेस पहुँचाने के डर से जोखिम से बचते थे।

वर्षों तक इस्राइली जेल में रहने वाले सिनवार ने यह सब हिब्रू भाषा के अखबारों से सीखा था और शायद वह यहीं पर चूक गया। इस्राइल जैसे लोकतंत्र में पत्रकारिता समाज की अच्छाइयों की उपेक्षा करके उसकी खामियों पर ध्यान केंद्रित करती है। खैर, द टाइम्स की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, इस्राइली उसके बर्बर नरसंहार के आगे झुकने के बजाय एकजुट हो गए। वे अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे भी नहीं झुके।

उन्होंने ईरान को अपमानित और निष्प्रभावी कर दिया, जिसका शासन लड़खड़ा रहा है। उन्होंने गाजा पर आंतरिक नियंत्रण खोए बिना अपने जिंदा बचे शेष बंधक लौटा लिए हैं। उन्होंने गाजा को हमास के कब्जे से मुक्त कराने के लिए मुस्लिम देशों को राजी कर लिया है और यह आश्वासन ले लिया है कि भविष्य में हमास द्वारा यदि विनाशकारी युद्ध छेड़ने की साजिश रची जाती है, तो गाजावासी इसका विरोध करेंगे। वे मित्रवत अरब देशों से राजनयिक संबंधों को बनाए हुए हैं। यही नहीं, तमाम विरोध प्रदर्शनों के बावजूद उन्हें अमेरिका का पूरा समर्थन प्राप्त है।

शायद इस युद्ध को टाला जा सकता था, हालांकि मुझे इसमें संदेह है, क्योंकि युद्ध के शुरुआती दिनों में ही आलोचकों ने इस्राइल को युद्ध अपराधी ठहरा दिया था। खैर, इस्राइलियों पर आलोचनाओं का असर नहीं पड़ा। इसी जिजीविषा ने इस युद्ध में उन्हें जीत दिलाई।

इस्राइल की इस एकजुटता और जिजीविषा का कारण क्या था? इसका जवाब मुझे गाजा के निकट एक इस्राइली सैन्य अड्डे पर एक सार्जेंट से मिला, जिसका उपनाम चोलो था। चोलो ब्राजील में रेव पार्टियों में डीजे का काम करता था, लेकिन सात अक्टूबर की घटना के तत्काल बाद वह इस्राइल लौट आया। उसने मुझसे कहा, 'मैं इस सरकार का समर्थन नहीं कर रहा हूं, लेकिन मैं सेना में जाऊंगा।' गाजा और अन्य मोर्चों पर लड़ने और शहीद होने वाले कई इस्राइली सैनिक न्यायिक सुधार के विरोध में नेतन्याहू के खिलाफ मार्च कर रहे थे।

लेकिन वे लड़ने आए, क्योंकि सिनवार के उद्देश्यों और तरीकों ने स्पष्ट कर दिया था कि यह उनके अस्तित्व का सवाल था। और तो और, इन उद्देश्यों और तरीकों को दुनिया भर में जो उत्साहपूर्ण समर्थन मिला, उससे साफ हो गया कि अब भी यहूदियों के लिए कोई सुरक्षित ठिकाना नहीं है। न ऑस्ट्रेलिया, न कनाडा, न ब्रिटेन, न फ्रांस, न जर्मनी और शायद अमेरिका भी नहीं। इस्राइलियों ने लड़ाई सिर्फ इसलिए नहीं लड़ी कि उनके सामने अस्तित्व का खतरा था, बल्कि उन्हें अस्तित्वगत झूठ का सामना करना पड़ा कि इस्राइल एक बसाया गया औपनिवेशिक राज्य है, यहूदियों के लिए इस जमीन पर कोई स्थान नहीं है। यह एक ऐसा झूठ है, जो जैसे-जैसे मजबूत होता जाता है, यहूदी पहचान की जड़ों पर ही हमला करता है। इसलिए इस्राइलियों को युद्ध लड़ना और जीतना पड़ा।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।