
क्या हमारी धरती पर एक बार फिर से लौट सकते हैं डायनासोर Publish Date : 21/09/2026
क्या हमारी धरती पर एक बार फिर से लौट सकते हैं डायनासोर
प्रो0 आर. एस. सेंगर
यह सवाल ही कितना दिलचस्प है कि क्या डायनासोर कभी फिर से धरती पर लौट सकते हैं? तकनीकी रूप से डायनासोर आज भी पक्षियों के रूप में मौजूद हैं। पक्षी डायनासोर की एकमात्र जीवित संतान हैं। लेकिन, अगर सवाल टायरनोसॉरस या ट्राइसेराटॉप्स जैसे डायनासोर के दोबारा अस्तित्व में आने का है, तो इसका जवाब निश्चित रूप से 'नहीं' है।
आज के पक्षियों और उनके प्राचीन डायनासोर पूर्वजों के बीच लाखों पीढ़ियों का अंतर है। यही कारण है कि आज के पक्षी उन प्रागैतिहासिक जीवों से बहुत अलग दिखते हैं, जिनकी आवाज और व्यवहार भी अलग थे। इसे समझने के लिए हमें विकास (इवोल्यूशन) को समझना होगा।
6.6 करोड़ साल पहले उस विनाशकारी घटना में पक्षी बच गए, जिसने सभी डायनासोरों को मार दिया और मेसोजोइक युग का अंत कर दिया। पक्षी शायद छोटे होने, बीज व कीड़े खाने, छोटी जगहों पर शरण लेने और उड़ने की क्षमता के कारण बच पाए। पर, अगर वही परिस्थितियां आज फिर आ जाएं, तो कोई भी आधुनिक जानवर डायनासोर में विकसित नहीं होगा।
आज के जानवरों का विकासवादी इतिहास डायनासोर से बहुत अलग है। वे आज की दुनिया में जीवित रहने वाली विशेषताएं विकसित कर चुके हैं, जो भविष्य में उनके विकास के तरीकों को सीमित करती हैं। किसी जानवर के डायनासोर होने के लिए उसका 'डायनासोरिया' समूह से संबंधित होना जरूरी है। पक्षियों के अलावा इस समूह का कोई जीवित सदस्य नहीं है। इसलिए, भविष्य में डायनासोर के दोबारा विकसित होने के लिए उसे पक्षी से ही विकसित होना होगा। इसके लिए पक्षी को बहुत अधिक बदलना पड़ेगा।
डायनासोरों की लंबी हड्डियों वाली पूंछ थी, जबकि पक्षियों की पूंछ छोटी व मोटी है। पक्षी मुख्यतः पिछले पैरों पर चलते हैं, जबकि ट्राइसेराटॉप्स चार पैरों पर चलता था और उसके अगले पैरों में पांच उंगलियां थीं। इसके अलावा, ट्राइसेराटॉप्स की त्वचा का अधिकांश हिस्सा पपड़ीदार था, जबकि पक्षियों के शरीर पर पंख होते हैं। पक्षियों को उड़ने, ऊर्जा बचाने और साथी को आकर्षित करने के लिए पंखों की जरूरत होती है। ट्राइसेराटॉप्स की चोंच भी पक्षियों की चोंच से अलग थी और उसके जबड़ों में दांतों की कतारें थीं। पिछले 6.6 करोड़ वर्षों में किसी भी पक्षी के दांत नहीं रहे हैं।
इन अंतरों को देखते हुए, इस बात की बहुत कम संभावना है कि कोई भी विलुप्त डायनासोर दोबारा जिंदा नहीं होगा, सिवाय शायद फिल्मों के।
लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।