सामाजिक व्यवहार परिवर्तन के जरिए सुपोषित भारत के लिए एक जन-आंदोलन      Publish Date : 07/05/2026

सामाजिक व्यवहार परिवर्तन के जरिए सुपोषित भारत के लिए एक जन-आंदोलन

                                                                                                                      प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

पिछले सात वर्षों में राष्ट्रीय पोषण माह ने केवल जागरूकता अभियान तक सीमित रहने के बजाय एक मजबूत लोगों की मुहिम के रूप में खुद को स्थापित किया। इसने समुदायों, पंचायतों, स्कूलों, आंगनवाड़ी केंद्रों और डिजिटल माध्यमों के माध्यम से लाखों गतिविधियों और अभियानों के जरिए लोगों को सक्रिय रूप से जोड़कर सुपोषित भारत के लक्ष्य को आगे बढ़ाया। यह अभियान एक उदाहरण प्रस्तुत करता है कि कैसे स्थानीय शासन, फ्रंटलाइन वर्कर्स और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से नीति और कार्यक्रमों को व्यावहारिक और घर-घर तक पहुँचाने योग्य बनाया जा सकता है। पोषण माह भारत को कुपोषण मुक्त और स्वस्थ पीढ़ी की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रहा है।

कुपोषण केवल सामाजिक या स्वास्थ्य संबंधी समस्या नहीं है, बल्कि यह एक आर्थिक संकट है। यह उत्पादकता को घटाता है, स्वास्थ्य प्रणाली पर बोझ डालता है और मानव पूंजी के विकास में बाधा पहुँचाता है। वैश्विक स्तर पर अनुमान है कि कुपोषण से अर्थव्यवस्था को प्रति वर्ष लगभग 3.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 500 अमेरिकी डॉलर प्रति व्यक्ति) का नुकसान होता है। इस प्रकार, किसी भी राष्ट्र के लिए कुपोषण से निपटना एक आर्थिक आवश्यकता बन जाता है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए, भारत ने पिछले कई वर्षों में पोषण-केंद्रित योजनाओं की एक श्रृंखला लागू की है। पोषण में सुधार के प्रति भारत की प्रतिबद्धता दशकों से विकसित होती रही है, जिसकी शुरुआत वर्ष 1975 में एकीकृत बाल विकास सेवा (आईसीडीएस) से हुई थी। यह विश्व के सबसे बड़े सामुदायिक-आधारित कार्यक्रमों में से एक है, जिसने छह वर्ष से कम आयु के बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं को स्वास्थ्य, पोषण और प्रारंभिक शिक्षा प्रदान करने में आधारभूत भूमिका निभाई है।

                                             

वर्षों के दौरान, इस आधार को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किए गए। फिर भी, सतत आर्थिक वृद्धि और नीतिगत प्रतिबद्धताओं के बावजूद, पिछले कुछ दशकों में कुपोषण चिंताजनक स्तरों पर बना रहा। इसी चुनौती से निपटने के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2018 में पोषण अभियान की शुरुआत की। इसमें जीवन के शुरुआती 1,000 दिनों (गर्भाधान से लेकर बच्चे के दूसरे जन्मदिन तक) पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया। पोषण अभियान ने तीन-आयामी रणनीति अपनाईः - सामुदायिक स्तर पर व्यवहार परिवर्तन अभियान (जन आंदोलन), सेवाओं की डिजिटल निगरानी, इंक्रिमेंटल लर्निंग अप्रोच (आईएलए) के माध्यम से 14 लाख से अधिक आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की क्षमता वृद्धि।

इसके बाद, वर्ष 2021 में भारत सरकार ने सक्षम आंगनवाड़ी और मिशन पोषण 2.0 लागू किया, जिसने पोषण अभियान, आंगनवाड़ी सेवाओं और किशोरी बालिकाओं की योजना को एकीकृत किया। इनका लक्ष्य 0-6 आयु वर्ग के बच्चे, गर्भवती महिलाएं, स्तनपान कराने वाली माताएं और किशोरी बालिकाएं हैं। वर्तमान में प्रमुख हस्तक्षेपों में अनुपूरक पोषण के रूप में हॉट कुक्ड मील्स (एचसीएम) और टेक होम राशन (टीएचआर), साथ ही पोषण अभियान के माध्यम से व्यवहार परिवर्तन संचार शामिल हैं। वर्तमान में यह योजना 36 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में संचालित है और लगभग 10 करोड़ लाभार्थियों को अनुपूरक पोषण, वृद्धि मापन, शिक्षा और पोषण जागरूकता उपलब्ध करा रही है। पोषण माह, जिसे पहली बार पोषण अभियान के अंतर्गत जन आंदोलन का हिस्सा बनाकर शुरू किया गया था, माँग सृजन, सामुदायिक कार्यक्रमों और घर-आधारित परामर्श की इस आवधिक गहनता को संस्थागत रूप देता है, जिससे व्यवहार परिवर्तन संचार (बीसीसी) एक सतत और दृश्यमान राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गया है।

पोषण माह पोषण अभियान का (एसबीसीसी) इंजन

पोषण माह का मुख्य उद्देश्य सामाजिक और व्यवहार परिवर्तन संचार (एसबीसीसी) को वास्तविक क्रियाओं में बदलना है। राष्ट्रीय एसबीसीसी रणनीति में मास मीडिया, मिड मीडिया और इंटरपर्सनल मीडिया के साथ-साथ समुदाय आधारित कार्यक्रम का उपयोग किया जाता है, ताकि माता-पिता, सास-ससुर, शिक्षक, स्थानीय निर्वाचित नेता और धार्मिक/सामुदायिक हस्तियों जैसे विभिन्न दर्शकों तक प्रभावी ढंग से संदेश पहुँचाया जा सके। सामग्री में शामिल हैं: टीवी और रेडियो स्पॉट, मोबाइल वीडियो, फ्रंटलाइन वर्कर्स के लिए फ्लिपबुक्स, साथ ही वाल पेटिंग प्रोटोटाइप, लोक मीडिया (नुक्कड़ नाटक) और सोशल प्लेटफॉर्म के लिए डिजिटल कंटेंट।

पोषण माह इस रणनीति को निम्नलिखित के माध्यम से क्रियान्वित करता हैः

  • मास मीडिया अभियान- व्यापक जागरूकता के लिए।
  • मिड-मीडिया टूल्स- सामुदायिक पहुँच के लिए (सड़क नाटक, स्कूल गतिविधियाँ, स्थानीय रेडियो)।
  • गहन इंटरपर्सनल काउंसलिंग (पोषण ट्रैकर के माध्यम से घर-घर जाना) उन परिवारों के लिए जिन्हें विशेष समर्थन की आवश्यकता हो।

राष्ट्रीय पोषण माह, जिसे वर्ष 2018 में पोषण अभियान के भाग के रूप में शुरू किया गया था, वर्षों में भारत के सबसे बड़े जन-नेतृत्व वाले पोषण आंदोलनों में से एक वन गया है। इसे एक जन आंदोलन के रूप में कल्पित किया गया, जिसका उद्देश्य पूरे देश में समुदायों को जागरूकता, व्यवहार परिवर्तन और स्थानीय कार्रवाई के माध्यम से कुपोषण से निपटने के लिए सशक्त बनाना था।

वर्ष 2018 में आयोजित पहला पोषण माह संयमित शुरुआत वाला रहा। शुरुआती प्रयास मुख्य रूप से स्कूलों, समुदायों और आंगनवाड़ी केंद्रों में जागरूकता फैलाने पर केंद्रित थे और उन्होंने उस आधार को तैयार किया जो जल्द ही पूरे देश में नागरिकों को बड़े पैमाने पर संलग्न करने वाले आंदोलन में बदल गया।

                                     

वर्ष 2019 में, अभियान ने ‘पोषण-त्योहार से व्यवहार’ थीम के साथ गति पकड़ी, जिसमें यह बताया गया कि उत्सवों का सदुपयोग करके कैसे रोजमर्रा के जीवन में स्वस्थ पोषण प्रथाओं को बदला जा सकता है। इस वर्ष का मुख्य फोकस पाँच महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर था। बच्चे के जीवन के पहले 1,000 दिन, एनीमिया की रोकथाम, दस्त प्रबंधन, स्वच्छता और आहार में विविधता। समुदायों ने इस पहल का उत्साहपूर्वक स्वागत किया। रेसिपी प्रदर्शन, भोजन उत्सव, एनीमिया जांच शिविर और स्वच्छता अभियान इस संस्करण की प्रमुख विशेषताएं बनीं और पोषण माह को एक सामूहिक सामाजिक आंदोलन के रूप में स्थापित करने का विचार मजबूत हुआ।

वर्ष 2020 में, कोविड-19 महामारी ने चुनौती पेश की लेकिन इसने पोषण माह को नवाचार करने का अवसर भी दिया। यह अभियान डिजिटल हुआ, इसमें ई-सम्वाद, ऑनलाइन प्रतियोगिताएं, सोशल मीडिया पहुँच और वेबिनार शामिल थे। वहीं, फ्रंटलाइन वर्कर्स ने बच्चों की वृद्धि निगरानी, गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों की पहचान और पोषण वाटिकाओं के प्रचार पर ध्यान जारी रखा। महामारी के व्यवधानों के बावजूद देश ने उत्साहपूर्वक भाग लिया जिससे अभियान की सहनशीलता और अनुकूलन क्षमता स्पष्ट हुई।

वर्ष 2021 में, अभियान ने साप्ताहिक थीमगत गतिविधियों के साथ एक अधिक संगठित    दृष्टिकोण अपनाया, जो आजादी का अमृत महोत्सव के उत्सवों के साथ समन्वित थे। इन गतिविधियों में पौधारोपण अभियान, योग आधारित पोषण जागरूकता, क्षेत्र-विशिष्ट पोषण किट का वितरण और कुपोषित बच्चों की पहचान एवं प्रबंधन शामिल थे। इस दृष्टिकोण ने ध्यान एवं भागीदारी को और अधिक तीव्र किया।

वर्ष 2022 तक, पोषण माह वास्तव में पंचायत-नेतृत्व वाली स्थिति में आ गया, जिसमें मुख्य फोकस ‘महिला और स्वास्थ्य’ और ‘बच्चा और शिक्षा’ पर था। ग्राम पंचायतों ने पोषण पंचायतें आयोजित कीं, जबकि आंगनवाड़ी केंद्र विकास निगरानी अभियान, किशोरियों के लिए एनीमिया जांच शिविर और ‘अम्मा की रसोई’ जैसी पहलों के तहत रेसिपी प्रदर्शनी के केंद्र बन गए। पारंपरिक व्यंजन, आदिवासी भोजन और स्थानीय प्रथाओं का समावेश अभियान को स्थानीय स्तर पर विशिष्ट पहचान देने वाला बना।

पोषण माह वर्ष 2023 ने पोषण के जीवन चक्र दृष्टिकोण को और गहरा किया। फोकस केवल जागरूकता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समेकित सेवा वितरण तक बढ़ गया, जिसमें आहार में विविधता, एनीमिया की रोकथाम, माताओं के लिए परामर्श और स्वास्थ्य व शिक्षा प्रणालियों के साथ समन्वय शामिल थे। जन भागीदारी का पैमाना अभूतपूर्व रहा और यह अब तक का सबसे बड़ा पोषण माह संस्करण बन गया। पूरे देश में समुदायों ने विकास निगरानी, स्थानीय पोषण किट का वितरण और स्कूल तथा पंचायत-नेतृत्व वाले अभियान में सक्रिय भागीदारी की जिससे लोगों की भागीदारी की केंद्रीयता उजागर हुई। वर्ष 2024 का सातवाँ राष्ट्रीय पोषण माह निम्नलिखित महत्वपूर्ण विषयों पर केंद्रित रहा एनीमिया की रोकथाम, विकास निगरानी, पूरक आहार, पोषण भी पढ़ाई भी, बेहतर सेवा वितरण के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग। अभियान ने आहार में विविधता, शिशु और प्रारंभिक बचपन का पोषण और प्रौद्योगिकी-सक्षम सुशासन के महत्व को उजागर किया।

सात वर्षों तक एक सतत जन आंदोलन के रूप में कार्य करते हुए, राष्ट्रीय पोषण माह ने केवल एक जागरूकता अभियान तक सीमित न रहते हुए सालाना करोड़ों गतिविधियों में शामिल एक मजबूत जन अभियान के रूप में खुद को स्थापित किया। इसने सफलतापूर्वक सुपोषित भारत के विजन को एक सहभागी मिशन में बदल दिया जो भारत भर के समुदायों की सामूहिक ऊर्जा पर आधारित है। हाल ही में, सुपोषित भारत के इस विजन को आगे बढ़ाते हुए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने 17 सितंबर से पोषण माह का आठवां संस्करण लॉन्च किया है। यह पोषण माह 16 अक्टूबर, 2025 तक मनाया जाना है और इसका मुख्य विषय ‘स्वस्थ नारी, सशक्त परिवार’ है। इस पोषण माह के लिए मुख्य विषय हैं:

  • मोटापे का समाधान शुगर, नमक और तेल की खपत में कमी।
  • प्रारंभिक बाल देखभाल एवं शिक्षा (ईसीसीई)। पोषण भी पढ़ाई भी (पीबीपीबी)।
  • शिशु और छोटे बच्चों के पोषण प्रथाएं (आईवाईसीएफ)।

पुरुष समावेशन और समन्वित कार्रवाई एवं डिजिटलीकरण

पोषण माह पूरे वर्ष चलने वाली एसबीसीसी और सेवा वितरण संरचना का मुख्य केंद्र बिंदु है। जब पोषण माह को रणनीतिक रूप से उपयोग किया जाता है तो यह सुपोषित भारत की दिशा में एक प्रभावशाली उपकरण बन जाता है। पोषण माह यह उदाहरण देता है कि कैसे एक सावधानीपूर्वक क्रमबद्ध एसबीसीसी रणनीति फ्रंटलाइन सिस्टम और स्थानीय शासन के समर्थन के साथ, नीति की महत्वाकांक्षा को घरेलू व्यवहार में बदल सकती है। यदि भारत का दीर्घकालिक लक्ष्य कुपोषण-मुक्त पीढ़ी है, तो पोषण माह का महीना वह अवसर बनता है जब देश न केवल अपनी प्रतिबद्धता को दोहराता है, बल्कि मापता, सीखता और परिवर्तन की मशीनरी को मजबूत करता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।