आत्मबोध      Publish Date : 30/04/2026

                   आत्मबोध

                                                                                                      प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

आत्मबोध वह ज्ञान है, जिससे व्यक्ति अपनी शारीरिक, मानसिक और सामाजिक पहचान को समझता है। यह एक प्रकार से स्वयं का स्वयं से साक्षात्कार है। प्रायः जीवन में मनुष्य ऐसी अवस्था में पदार्पण करता है, जब उसे अपनी परिस्थितियों, परिवार, समाज और संसार की वास्तविकता का बोध होना प्रारंभ होता है। आत्मबोध व्यक्ति को एक बेहतर इंसान के रूप में विकसित होने और चरित्र सुधारने में सहायता करता है। यह अंतर्मुखी होने की वह प्रक्रिया है, जो बाहरी संसार के कोलाहल से हटकर विपरीत परिस्थितियों में भी समभाव रखने की सामथर्य प्रदान करती है।

न जानें कितने जीवन ऐसे ही बीत जाते हैं, जहां न तो स्वयं को जानने की उत्सुकता होती है और न ही समय। स्वयं को जानने की प्रक्रिया में मिथया के लिए कोई स्थान नहीं होता, वहां केवल खुलापन और सच्चाई से सामना होता है। मानो स्वयं को दर्पण दिखाना हो। ऐसी स्थिति में अपने दोषों और अपराध बोध से परिचय होना भी स्वाभाविक है। कई बार नियति ग्लानि से भरे मन को प्रायश्चित का अवसर भी नहीं देती और तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। यह दंश मनुष्य को जीवन भर चैन नहीं लेने देता।

                               

यदि संवेदनशील हृदय समय रहते यह समझ पाते कि कहीं वे स्वयं ही तो गलत नहीं थे तो अपराध बोध के तले दबने की स्थिति नहीं आती। इस भाग-दौड़ भरे जीवन में स्वयं को समझने का अवसर देना आवश्यक है, जिससे जीवन की जटिलताओं को सुलझाना सरल हो जाए। यही वह आत्मबोध है, जिससे अपराध बोध क्षीण हो सकता है। जब जीवन के बिखरे हुए यथार्थ से सामना होता है और विलाप के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं बचता, तब ध्यान, आत्मचिंतन और गुरु के मार्गदर्शन में भक्ति भाव ही एकमात्र उपाय रह जाता है। ऐसे प्रयास ही आंतरिक शक्ति को पुनः स्थापित कर भविष्य के मार्ग को सुलभ और आनंदित बनाने में सक्षम हो सकते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।