
सदैव ही कठिन रहा है राष्ट्र सेवा का मार्ग Publish Date : 31/03/2026
सदैव ही कठिन रहा है राष्ट्र सेवा का मार्ग
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
23 मार्च का दिन आते ही मन में यह विचार और प्रभावी हो जाता है की धर्म का मार्ग सरल नहीं है। 23 मार्च 1931 जब आजादी के 3 मतवाले अपने यौवन को मां भारती को अर्पित कर सदा-सदा के लिए भारत की पीढ़ियों को राष्ट्र पर मर मिटने की प्रेरणा दी गए। जिस आयु में सामान्य लोग अपनी शान शौकत पूरी करते हैं उस आयु में हंसते-हंसते फांसी के फंदों को चूम जाना इस युग की अद्भुत घटना है। युग कोई भी रहा हो धर्म की स्थापना का मार्ग सदैव बलिदानों की मांग करता रहा है।
त्रेता युग में भगवान राम के जीवन के 14 वर्षों का बलिदान और द्वापर युग में पांडवों को भी अनेक प्रकार से बलिदान करना पड़ा तब जाकर धर्म स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो सका। जब भारत माता गुलामी की बेड़ियों में जकड़ी थी तब देश का बहुत बड़ा वर्ग सरकारी नौकरी आर्थिक वैभव को सुनिश्चित करने में लगा था उसी समय में भारत माता की गोद से क्रान्तिकारियों के रूप में अनेक योद्धाओं ने भी जन्म लिया। आज हम उन्हें न केवल स्मरण कर रहे हैं बल्कि अपने जीवन का कुछ भाग भी उनकी प्रेरणा से बना सके तो धन्यता अनुभव कर रहे हैं।

उस दौर में राष्ट्र की स्वाधीनता के लिए स्वयं का जीवन दांव पर लगाने की आवश्यकता थी और आज राष्ट्र की वैभव के लिए स्वयं का जीवन राष्ट्रभक्ति से उत्प्रोत बनाने की आवश्यकता है। मातृभूमि की भक्ति मे कष्ट ना हो तो उस भक्ति का कोई आनंद नहीं है अर्थात यह मार्ग तो कांटो भरा है जो लोग इन कांटों का आनंद लेकर चल सकते हैं वास्तव में वही भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को अपना पूर्वज कहलाने योग्य हैं। मुट्ठी भर अंग्रेज 200 वर्षों तक भारत को पराधीन बनाए रख सके क्योंकि एक बड़ा स्वार्थी समाज उनकी जी हुजूरी करता था, अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए अपने ही क्रांतिकारी बंधुओं पर गोली चलता था।
1857 के स्वातंत्र्य समर के समय कानपुर के पास का कलेक्टर ए ओ ह्यूम अपने मुख्यालय से बहुत मुश्किल से जान बचाकर भागा, क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम शुरू हो गया था। जब उसको यह समझ में आया कि भारतीय जनता अब विद्रोह की स्थिति में आने लगी है तब आगे चलकर 1885 में इसने ही एक रास्ता निकाला विद्रोह भड़के ना बल्कि संतुलित बना रहे और पराधीनता का यह कालखंड लंबा होता गया।

यह भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों का बलिदान ही था जिसके कारण अंग्रेजों को न चाहते हुए भी और तय समय से पहले ही भारत छोड़कर भागना पड़ा।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
