
बसंत के साथ अक्षर अभ्यास Publish Date : 27/02/2026
बसंत के साथ अक्षर अभ्यास
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
बसंत पंचमी के दिन चंद्रमा ज्ञान के कारक गुरु की राशि में होने से गजकेसरी योग बन रहा है। यह तिथि छात्रों के लिए उत्तम संयोग बना रही है। यह पर्व बसंत के आगमन का संदेश देता है।मां सरस्वती की कृपा से जिनके पास ज्ञान होता है, वह परिस्थितियों से हारते नहीं हैं, उन्हें अवसरों में बदल लेते हैं। ज्ञान ही सही कर्म और सही दिशा का बोध कराता है, यही कारण है कि मां सरस्वती के प्राकट्य दिवस, बसंत पंचमी को भारतीय परंपरा में ज्ञान का महापर्व माना गया है। माघ मास, शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि, बसंत पंचमी का पर्व इस बार 23 जनवरी, दिन शुक्रवार को है। बसंत पंचमी पर पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र तदोपरांत उत्तराभाद्रपद नक्षत्र रहेगा। प्रातः 7 बजकर 41 मिनट से चंद्रमा का संचरण मीन राशि में होगा। पंचमी तिथि देर रात तक रहेगी, जिसके चलते स्नान, दान, पूजा-पाठ का क्रम पवित्र नदियों के तट पर सूर्योदय से देर रात तक रहेगा। दोपहर 11:30 से 12:30 तक पूजन का श्रेयस्कर मुहूर्त है।

ज्योतिष के मुहूर्त ग्रंथों के अनुसार, पंचमी तिथि पूर्ण फल देने वाली होती है, माघ मास शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि, यानी बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती का आशीर्वाद सभी प्राणियों में ज्ञान का संचार करता है, इसलिए जनमानस संयुक्त रूप से सरस्वती वंदन, पूजन एवं स्नान, ध्यान और आराधना से सरस्वती कृपा प्राप्त करने के लिए इंस दिन अग्रसर रहता है। बसंत पंचमी का दिन विद्यारंभ आदि कार्यों के लिए अतिशुभ माना गया है, लेखन, कला एवं साहित्य के लिए यह विशेष शुभ दिन है।
पूजन विधि:प्रातः काल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल में पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके मां सरस्वती का ध्यान करें। बसंत पंचमी को भगवान श्रीविष्णु एवं मां सरस्वती की पूजा पीले पुष्पों, गुलाल, अर्क, धूप, दीप, नैवेद्य आदि द्वारा करनी चाहिए, तदुपरांत पीले एवं मीठे चावलों तथा पीले हलुए आदि का भोग लगाकर प्रसाद वितरण के साथ स्वयं सेवन करना चाहिए। मान्यताओं के अनुसार, कहीं-कहीं श्रीकृष्ण एवं राधा का पूजन करने की भी परंपरा है।
दिव्य पर्व है बसंत पंचमी: प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, बसंत पंचमी का महत्व पांच प्रमुख कारणों से सर्वोपरि है। सर्वप्रथम मां सरस्वती का जन्म इस दिन हुआ था और इसी दिनश्रीकृष्ण ने मां सरस्वती की पूजा सर्वप्रथम की थी। दूसरा, इस दिन शंकर जी की लगुन लिखी गई थी, तभी जाकर उनका विवाह महाशिवरात्रि पर संपन्न हुआ था। तीसरा, इस दिन को श्री पंचमी भी कहते हैं, इस दिन मां सरस्वती के साथ मां लक्ष्मी जी की पूजा भी की जाती है। चौथा, कामदेव एवं रती की पूजा कर मदनोत्सव मनाया जाता है। पांचवा, यह पर्व बसंत के आने की सूचना देता है।
बिना सरस्वती अधूरी है त्रिवेणी: प्रयागराज में गंगा और यमुना प्रत्यक्ष रूप से दिखाई पड़ती हैं, किंतु सरस्वती अदृश्य रूप में हैं। ज्ञान और वाणी की देवी सरस्वती के बिना त्रिवेणी पूर्ण नहीं होती, सरस्वती पूजा का खास दिन होने के कारण बसंत पंचमी के दिन श्रद्धालु सरस्वती पूजन के साथ त्रिवेणी संगम में स्नान-दान करते हैं।
विशेष उपाय: बसंत पंचमी के दिन से प्रारंभ कर पीले पुष्पों से शिवलिंग की पूजा करने से अल्पायु योग की समाप्ति होकर दीर्घायु की प्राप्ति होती है। बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती के द्वादश नामावली का पाठ करने से मां भगवती प्रसन्न होकर ज्ञान वृद्धि के साथ सुख-कन्याओं को पीले चावल आदि का समृद्धि प्रदान करती हैं। इस दिन भोजन कराने व पीले वस्त्र दान करने का विधान है। इस दिन विद्यार्थियों को सरस्वती जी की पूजा कर सरस्वती यंत्र धारण करने पर मनोवांछित परिणाम प्राप्त होते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
