
विवेकानंद : राष्ट्रीय युवा दिवस Publish Date : 14/01/2026
विवेकानंद : राष्ट्रीय युवा दिवस
"यह हमारा दायित्व है कि हम हर किसी को उसके उदात्त जीवन आदर्शों के अनुसार जीवन जीने के लिए प्रोत्साहित करें और प्रयास करें कि यथा संभव वे आदर्श को सत्य के निकटतम हों"
12 जनवरी 1863 को सूर्योदय से चंद क्षण पहले ही कलकत्ता के श्री विश्वनाथ दत्त तथा श्रीमती भुवनेश्वरी देवी जी के यहां पुत्र का जन्म हुआ।उसका नाम था नरेंद्रनाथ दत्त, जो बाद में विश्व के विख्यात पूज्यनीय गुरुओं में से एक,स्वामी विवेकानंद के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
स्वामी विवेकानंद जी की जन्म जयंती, जो देश में राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाई जाती है, आइए, इस अवसर पर उनकी प्रेरणाप्रद जीवन यात्रा और जीवन दर्शन, जो आज भी हमारा मार्ग दर्शन कर रहे हैं, उसके बारे में कुछ जानें।
नरेंद्र, बचपन से ही जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे, जो कुछ कहा जाता उसके पीछे क्या कारण है, यह जानने के लिए उत्सुक रहते। छोटी ही आयु में आध्यात्मिकता के प्रति उनका रुझान होने लगा, भ्रमण करते यायावरी साधु संत उन्हें आकर्षित करते। बचपन में एक दिन जब एक साधु उनके पास दान मांगने आया तो उन्होंने किंचित भी झिझके बिना, एक नए कपड़े का छोटा सा टुकड़ा उसे दान में दे दिया। छोटी सी अवस्था में ही वे ध्यान लगाने का अभ्यास करने लगे थे।
एक बालक के रूप में वे विलक्षण प्रतिभाशाली रहे, पढ़ाई लिखाई के साथ साथ संगीत और शारीरिक सौष्ठव में भी पारंगत। वे अध्ययनशील भी थे। जो कुछ पढ़ा उसे फौरन समझ कर ग्रहण भी कर सकने की अद्भुत क्षमता उनमें थी। एक बार उन्होंने पुस्तकालय से सर जॉन लुड्डॉक की लिखी कुछ पुस्तकें मांगी और अगले उन्हें पढ़ कर वापस भी कर दीं। लाइब्रेरियन को विश्वास ही न हुआ कि उन्होंने सारी किताबें एक दिन में ही पढ़ डालीं। वो उन किताबों में से सवाल पूछने लगा और नरेंद्र ने उसके सारे प्रश्नों के सही उत्तर दे दिए। लाइब्रेरियन आश्चर्य चकित था, उसे यकीन हो गया कि नरेंद्र ने सच ही एक ही दिन में सभी किताबें पढ़ लीं है।
नरेंद्र को ईश्वर और उसके अस्तित्व को ले कर जिज्ञासा रहती। उनकी यह जिज्ञासा उन्हें दक्षिणेश्वर के काली मंदिर के श्री रामकृष्ण तक ले गई। पहले पहल तो उन्होंने रामकृष्ण को गुरु मानने से इंकार कर दिया लेकिन जैसे जैसे उनके बारे में जानकारी बढ़ी, वे नरेंद्र के जीवन के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों में से बन गए। नरेंद्र एक समृद्ध परिवार से आते थे,लेकिन पिता के देहांत के बाद उन्हें वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। कठिनाई की इस अवधि ने उनकी आध्यात्मिक चेतना को जगाया और उनके जीवन की दिशा बेहतरी की ओर मुड़ गई।
1887 में अपने गुरु श्री रामकृष्ण के देहांत के बाद, नरेंद्र और अन्य शिष्यों ने संन्यास ग्रहण कर लिया। सन्यास लेने के बाद उनका नामकरण किया गया "विवेकानंद" अर्थात विवेक का आनंद प्राप्त करने वाला। इसके बाद स्वामी विवेकानंद ने देश पर्यन्त यात्रा की। अपने चारों ओर विपन्नता और गरीबी देख कर उन्होंने प्रण किया कि वे लोगों के जीवन को इस विपन्नता से मुक्त कराने के मार्ग खोजेंगे।

स्वामी विवेकानन्द ने पश्चिमी जगत को भारत के वेदांत दर्शन से परिचित कराया। शिकागो में 1893 में आयोजित विश्व धर्म संसद में उनके ओजस्वी भाषण ने विश्व को भारत और उसकी सांस्कृतिक समृद्धि की ओर आकर्षित किया।
राष्ट्रीय युवा दिवस-
श्री अरबिंदो ने एक बार कहा था कि ये विवेकानंद ही थे जिन्होंने भारत को आध्यात्मिक रूप से जागृत किया। यह आध्यात्मिक जागरण और साथ में उनकी प्रेरणा से जगा हुआ राष्ट्रवाद, दोनों ने मिल कर उस समय के युवाओं को जीवन का एक उद्देश्य दिया,उनको मार्ग दिखाया। महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, डॉ बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर भी स्वामी विवेकानंद से प्रभावित रहे। उनके शब्दों में अद्भुत ओज था। राष्ट्र के युवाओं को प्रोत्साहित करना, प्रेरित करना, उनमें जागृति फैलाना, उन्होंने इसे ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। इसीलिए प्रति वर्ष उनकी जन्म जयंती के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है।
स्वामी जी की शिक्षा, उनके द्वारा स्थापित आदर्श आज के युवाओं का भी मार्गदर्शन कर सकते हैं। आज जब युवा तात्कालिक सफलता के प्रति आकर्षित हो रहे हैं और एक ही विफलता में आसानी से बिखर जाते हैं, ऐसे समय में स्वामी जी की शिक्षा आज कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। राज योग पर अपने व्याख्यान में विवेकानंद कहते हैं " किसी भी एक विचार को चुनें। उसे अपना जीवन बना लें, उसके बारे में और विचारें, उसी के सपने देखें, उसी के अनुसार जीवन बिता दें। आपका मानस, आपके शरीर की मांस पेशियां, अपने स्नायु, आपके शरीर का हरेक अंग उसी एक विचार से भरा हो, उसी के अनुकूल हो, उसी में रत हो, बाकी अन्य सभी विचार गौण हो जाएं। सफलता का यही मार्ग है।" ये विचार कुछ भी हो सकता है यदि आप कोई स्टार्ट अप शुरू करना चाहें या फिर कोई खिलाड़ी ही बनना चाहें, कुछ भी...उस लक्ष्य को कभी भी छोड़ें नहीं। उसके लिए प्रयास करते रहें, सतत श्रम, और अधिक श्रम।
इसी प्रकार स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि हम किसी के जीवन से प्रेरणा ले सकते हैं, उससे शिक्षा ले सकते हैं पर अपनी अलग पहचान कभी न छोड़ें। एक बीज का उदाहरण देते हुए वो कहते हैं ज़मीन पर पड़े बीज को मिट्टी, वायु, जल और भूमि की मदद की जरुरत तो होती है पर वह स्वयं मिट्टी या वायु या जल नहीं बन जाता। बीज इन सभी तत्वों को अपनी प्रगति के लिए आत्मसात कर लेता है और एक वृक्ष बन जाता है। आज के युवाओं में अपने हीरो या आदर्शों की नकल करने का रिवाज़ प्रचलित है। आप सफल लोगों के जीवन से प्रेरणा और शिक्षा तो ले सकते हैं पर याद रखें कि सफलता के लिए अपना मार्ग खुद ही बनाना है, खुद ही तय भी करना है, दूसरों की अंधी नकल नहीं करनी है, न ही पूरी तरह से दूसरों की सलाह के भरोसे रहना है।
और यह सिद्धांत जीवन के हर क्षेत्र में लागू होता है। विश्व से अच्छी चीज़े सीखते हुए भी हमें अपनी संस्कृति, संस्कार, इतिहास और सामाजिक आर्थिक संदर्भ भूलने नहीं चाहिए। याद रखे हमारी विकास गाथा हमारी अपनी होनी चाहिए।
आज का युवा ध्रुवीकरण की चुनौती का सामना भी कर रहा है। सूचना के संकीर्ण दायरे बन गए हैं, सब अपनी ही बात और अपनी ही प्रतिध्वनि सुनना चाहते हैं। एक युवा मानस में विविध विचारों को आत्मसात करने की अद्भुत क्षमता होती है, वो प्रबुद्ध विमर्श में भाग ले सकता है फिर भी वह अपनी अलग सोच को बनाए रखता है। इस संदर्भ में स्वामी विवेकानंद जी द्वारा सुनाई गई कुएं के मेढक की कथा नितान्त प्रासंगिक है कि कैसे नया सीखने के प्रति हमारी अनिच्छा हमारे दृष्टिकोण को संकुचित कर देती है। सीखना, अध्ययन करना तो जीवन भर की यात्रा है और युवाओं को समझना चाहिए कि सीखने की कोई सीमा नहीं, ये प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती। हमें सिर्फ दूसरों की अच्छाई सीखना ही नहीं है बल्कि सार्वभौमिक सहिष्णुता की भावना से उसे आत्मसात भी करना है और ऐसा करते हुए हमें अपने संस्कारों और परम्पराओं से भी जुड़े रहना है।
स्वामी विवेकानंद के संदेश के मर्म में विश्व बंधुत्व की भावना ही है। उनका मत था कि सभी संप्रदायों में अंतर्निहित एकता का सूत्र है। हर धर्म का मूल उद्देश्य हर मनुष्य में निहित दिव्यता को उजागर करना है। विश्व धर्म संसद में भगवत गीता को उद्दृत करते हुए, उन्होंने कहा " जिस प्रकार से विभिन्न स्रोतों से निकली भिन्न भिन्न नदियां अपने जल को समुद्र में मिला देती है उसी प्रकार से विभिन्न प्रवृत्तियां, तरह तरह के विचार चाहे वो सद्विचार हों या कुविचार, सभी एक ही ईश्वर की दिशा में जाते है "
इसी संबोधन में उन्होंने साम्प्रदायिकता, कट्टरवाद और धर्मांधता को "भयावह राक्षस" बताया था " अगर ये भयावह राक्षस न होते तो मानव समाज आज के मुकाबले कहीं अधिक प्रगति कर चुका होता..."
उनके शब्द आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने कि वे 1893 में थे। अतः आज के युवा को संकीर्ण सांप्रदायिकता, धार्मिक कट्टरता, असहिष्णुता के खतरों से बचना चाहिए, युवा वसुधैव कुटुंबकम् के हमारे सनातन चिंतन के अनुरूप एक समन्वयवादी विश्व दर्शन को अपनाएं।
स्वामी विवेकानन्द ने भारतीय दर्शन की सार्वभौमिकता को विश्व पटल पर पहचान दिलाई तो साथ ही साथ भारतीयों को धार्मिक रूढ़िवाद से मुक्ति दिलाने के प्रयास भी किए। इस अद्भुत आध्यात्मिक गुरु ने विश्व भर के असंख्य नागरिकों को प्रभावित किया है और वे भावी पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा के स्रोत रहेंगे। उनकी यह अमर वाणी सदैव ही याद की जाएगी कि " आप जो सोचते हैं, आप वही बनेंगे। अगर आप खुद को कमज़ोर मानते हैं, आप कमज़ोर ही बनेंगे, अगर आप खुद को शक्तिशाली मानते हैं तो आप शक्ति संपन्न ही बनेंगे।"
आज उनकी जन्मजयंती पर स्वामी विवेकानंद को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके गुणों का अनुकरण करें, उनके दिखाए मार्ग का अनुसरण करें।
