
स्वयं को जानना Publish Date : 27/12/2025
स्वयं को जानना
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
ज्ञान मात्र सूचनाओं का भंडार नहीं है। यह चेतना के विस्तृत आकाश में फैला वह प्रकाश है, जो वस्तुओं, अनुभूतियों और सत्य को पहचानने की क्षमता देता है। सामान्यतः ज्ञान दो प्रकार का माना गया है- सांसारिक ज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान । सांसारिक ज्ञान वह है, जो बाहरी भौतिक दुनिया से प्राप्त होता है-विज्ञान, कला, भाषा, घटनाएं और परिस्थितियां।

यह ज्ञान जीवन की गति को दिशा देता है, परंतु इसकी पहुंच बाहरी सतह तक सीमित रहती है। इसके विपरीत आध्यात्मिक ज्ञान आत्मा का आंतरिक स्वरूप है। यह भीतर की गहराइयों में उतरने पर प्राप्त होता है जहां मन, बुद्धि और चित्त मिलकर अपने ही स्रोत को पहचानने लगते हैं। यह जानना कि संसार क्या है, एक बात है, पर यह जानना कि 'मैं कौन हूं' - यह आध्यात्मिक ज्ञान का प्रवेश द्वार है।
ज्ञान की चर्चा केवल बुद्धि से नहीं पूरी होती। यहां स्मृति और अनुभव की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्मृति वह क्षमता है, जिसके द्वारा मन पहले देखी या सुनी वस्तु की छवि को पुनः रच सकता है। मान लीजिए आपने एक हाथी देखा। उसी क्षण आपके मन में 'हाथी जैसा' भाव बना - यही अनुभूति है। मन वस्तु का रूप अपने भीतर धारण कर लेता है। यही कारण है कि अनुभव केवल देखा जाना नहीं है, अनुभव वह है जब मन उसी वस्तु जैसा बन जाता है।

संगीत इसका सुंदर उदाहरण है। यदि आपने कोई राग सुना तो मन उसी राग की लय में झूमने लगता है। धुन मन में उतरकर उसे अपने अनुरूप बना लेती है। भोजन में अत्यधिक मसाला महसूस हो तो मन भी कुछ क्षणों के लिए उसी तीखेपन से भर जाता है। ज्ञान वह है जब किसी वस्तु की पूर्ण समझ और उसकी प्रकृति का संपूर्ण भाव स्पष्ट करा दे। जब कोई व्यक्ति किसी राग को न केवल याद रखता है, बल्कि उसके स्वरों, उसके समय, उसके भाव और उसके आत्मा तभी यह ज्ञान कहलाता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
