अरावली संकट पर एक विशेष      Publish Date : 21/12/2025

                         अरावली संकट पर एक विशेष

                                                                                                                                                                            प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं अन्य

रेगिस्तान के आगे ‘ढाल‘ बनकर खड़ी है अरावली, ऐसे में यह एक पर्वत श्रृंखला ही नहीं बल्कि जीवन का आधार है।

अरावली के अस्तित्व पर सेकट आ खड़ा हुआ है। ऐसे में जानिए कि अरावली क्यों मानव जीवन से लेकर पर्यवारण संतुलन के लिए अपना एक विशेष महत्व रखती है।

करोड़ों साल से प्राकृतिक सुरक्षा कवच के रूप में सीना ताने खड़ी अरावली पर्वत शृंखला, मानव जीवन के लिए एक अनुपम ‘वरदान’ है। अरावली न केवल प्राकृतिक रूप से देश के 692 किलोमीटर के हिस्से की रक्षा करती है, बल्कि रेगिस्तान के विस्तार के आगे भी यह ‘ढाल’ बनकर खड़ी है। दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखलाओं में शामिल अरावली कई नदियों का उद्गम स्थल है तो गर्म हवाओं और धूल भरी आंधियों से मैदानी इलाकों की रक्षा करती आ रही है। जैव विविधिता से लेकर प्राकृतिक संरक्षक के रूप में मानव जीवन को संभाल रही अरावली के अस्तित्व पर आज संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

अरावली पर छाए संकट का कारण हाल में सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला है, जिसमें कहा गया कि 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियां ही अरावली मानी जाएंगी, इस एक लाइन के कारण पर्यावरणविदों से लेकर आमजन के माथे पर चिंता की लकीर उभर आई है और हर कोई ‘अरावली बचाव’ अभियान के साथ आ खड़ा हुआ है। इस पहाड़ी को बचाने और संरक्षित करने की मुहिम लिए सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक मुहिम शुरू हो चुकी है। आज के अपने इस लेख के माध्यम से हम आपको बताएंगे कि अरावली का महत्व क्या है और अरावली क्यों मानव जीवन के लिए विशेष स्थान रखती है। साथ ही अगर ये पहाड़ियां कमजोर हुईं तो प्रकृति के साथ ही कैसे मानव जीवन भी प्रभावित होगा।

                                                              

अरावली पर बहस तेजः अरावली पर्वत शृंखला का मुद्दा सिर्फ पहाड़ों की परिभाषा या खनन की अनुमति का नहीं है, बल्कि यह बहस पर्यावरण, जलवायु, जल स्रोत, जैव विविधता और करोड़ों लोगों के भविष्य से जुड़ा है।

‘सस्टेनेबल माइनिंग’ जैसे शब्दों के साथ अरावली क्षेत्र में खनन की संभावनाओं पर चर्चा ने पर्यावरण कार्यकर्ताओं, विशेषज्ञों और राजनीतिक दलों को आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया है। इस पूरे मामले पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने जहां सरकार का पक्ष रखा है. वहीं, राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। इस बीच वॉटर मैन राजेंद्र सिंह भी मुखर हो चुके हैं।

क्यों उठ रही है ”सेव अरावली’ की आवाजः सामाजिक कार्यकर्ता और वाटरमैन राजेंद्र सिंह बताते हैं कि अरावली पर्वत शृंखला दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक मानी जाती है। इसका निर्माण प्रोटेरोजोइक युग में हुआ था, यानी यह करोड़ों साल पुरानी है। अरावली गुजरात से लेकर दिल्ली तक लगभग 692 किलोमीटर लंबाई में फैली हुई है। यह पर्वत शृंखला राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात के कुल 39 जिलों को प्रभावित करती है।

अरावली केवल पहाड़ों की शृंखला नहीं है, बल्कि यह उत्तर-पश्चिम भारत का प्राकृतिक सुरक्षा कवच है। यह थार मरुस्थल को आगे बढ़ने से रोकती है, गर्म हवाओं और धूल भरी आंधियों को मैदानी इलाकों तक पहुंचने से रोकती है और भूजल रिचार्ज में अहम भूमिका निभाती है। अरावली की नई परिभाषा, ऊंचाई आधारित मानक और खनन को लेकर उठे सवालों ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। पर्यावरणविदों का मानना है कि अगर अरावली को केवल ऊंचाई या चौड़ाई के आधार पर परिभाषित किया गया तो बड़ी संख्या में पहाड़ी क्षेत्र खनन के लिए खोल दिए जाएंगे।

राजेंद्र सिंह के अनुसार यह लाइफ लाइन का सवालः पर्यावरण संरक्षण के लिए दशकों से काम कर रहे ‘वॉटर मैन’ के नाम से मशहूर राजेंद्र सिंह ने अरावली को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि अरावली में खनन की दी जा रही परिभाषा सिर्फ कानूनी मसला नहीं है, बल्कि यहां रहने वाले लोगों की लाइफलाइन का सवाल है। अरावली संरक्षण की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से हुई थी और इसका केंद्र अलवर रहा है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने अपने रिटायरमेंट से ठीक पहले अरावली को भारत की ‘रीढ’ बताया था।

                                                                        

उन्होंने ‘सस्टेनेबल माइनिंग’ शब्द पर आपत्ति जताते हुए कहा कि यह उसी तरह है, जैसे सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को अंडे निकालने के लिए काट देना। उनका तर्क है कि खनन चाहे सीमित ही क्यों न हो, पहाड़ की संरचना टूटते ही पूरा पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर पड़ जाता है।

सरिस्का से गुरुग्राम तक खनन पर रोक का इतिहासः राजेंद्र सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए बताया कि सरिस्का टाइगर रिजर्व में खनन बंद होने के बाद अलवर और गुरुग्राम क्षेत्र में भी खनन पर रोक लगाई गई थी। उनका कहना है कि इसी जनआंदोलन और न्यायिक हस्तक्षेप के कारण अरावली क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खनन गतिविधियों पर रोक लगाई गई थी। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर अब अरावली में दोबारा खनन शुरू हुआ तो इसका असर तापमान, बारिश और जलवायु पर बिलकुल साफ दिखाई देगा।

बाहर प्रदर्शन

अरावली क्यों है भारत की ‘रीढ़’: राजेंद्र सिंह अरावली को ‘आड़ा पर्वत’ कहते हैं। इसकी वजह यह है कि अरावली उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा में फैली है। जबकि, अधिकांश पर्वत उत्तर-दक्षिण दिशा में होते हैं। इसी अनोखी संरचना के कारण अरावली पश्चिम से आने वाली गर्म हवाओं और धूल को रोकने का काम करती है। उनका कहना है कि खेती, पशुपालन, वन उपज और औषधीय पौधों पर आधारित स्थानीय अर्थव्यवस्था अरावली पर ही निर्भर है। यही कारण है कि अब लोग अरावली को बचाने के लिए एकजुट हो रहे हैं।

भूपेंद्र यादव ने रखा सरकार का पक्षः केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने हाल में दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान अरावली को लेकर केंद्र सरकार का रुख साफ किया था। उनका कहना है कि अरावली को बचाने के लिए यदि किसी सरकार की सबसे अधिक प्रतिबद्धता है तो वह वर्तमान केंद्र सरकार की है। उन्होंने तर्क दिया कि अरावली को केवल वन्यजीव क्षेत्र के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अरावली में ऐतिहासिक किले, मंदिर, झीलें, शहर और दुर्लभ खनिज भी मौजूद हैं, जो देश की जरूरत हैं।

उन्होंने वर्ष 2002 की उस रिपोर्ट का भी जिक्र किया, जो वर्ष 1968 के लैंड रिफॉर्म एक्ट के आधार पर तैयार की गई थी। उनके अनुसार तत्कालीन सरकारों ने जिस रिपोर्ट को स्वीकार किया था, आज उसी का विरोध किया जा रहा है। उस समय राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत थे और भूपेंद्र यादव ने तत्कालीन गहलोत सरकार की मंशा पर सवाल भी खड़े किए।

परिभाषा उत्तर भारत के भविष्य के लिए खतरा

केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि सरकार प्रकृति के साथ समझौता नहीं करेगी, बल्कि प्रकृति की सेवा करेगी। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अरावली क्षेत्र को लेकर अभी तक न तो पूर्ण सर्वे हुआ है और न ही अंतिम सस्टेनेबल प्लान तैयार हुआ है। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि अरावली रेंज के दायरे में चार बड़े खनन वाले क्षेत्रों में राजस्थान का उदयपुर और राजसमंद जिला है तो गुजरात का बनासकांठा और हरियाणा का महेंद्रगढ़ जिला शामिल है। किसी भी क्षेत्र में मापदंडों के विरुद्ध खनन नहीं हो रहा है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश क्या कहता हैः सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण और वन मंत्रालय को निर्देश दिए हैं कि वह भारतीय वानिकी अनुसंधान और शिक्षा परिषद के माध्यम से गुजरात से दिल्ली तक फैली अरावली पहाड़ियों के लिए एक स्पष्ट और व्यावहारिक योजना तैयार करें। यह योजना झारखंड के सारंडा क्षेत्र के लिए बनी MPSM नीति की तर्ज पर होगी। इसमें यह तय किया जाएगा कि किन क्षेत्रों में खनन की अनुमति दी जा सकती है और किन क्षेत्रों में पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा। साथ ही पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र, संरक्षण योग्य क्षेत्र और पुनर्स्थापन की आवश्यकता वाले क्षेत्रों की पहचान भी की जाएगी।

राजस्थान में अरावली की स्थितिः देश के चार राज्य दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के 692 किलोमीटर क्षेत्र में फैली अरावली पर्वत शृंखला का लगभग 550 किलोमीटर हिस्सा राजस्थान में ही फैला हुआ है। यह राज्य के कुल क्षेत्रफल का करीब 12.65 प्रतिशत है। राजस्थान में यह गुजरात सीमा के खेड़ ब्रह्मा से लेकर उत्तर में खेतड़ी तक जाती है। चार राज्यों में उत्तर में दिल्ली से प्रारम्भ होकर गुजरात में पालनपुर तक लगभग 692 किलोमीटर तक की लंबाई में यह पर्वत शृंखला है। इसके दायरे में देश के 39 जिले आते हैं। वहीं, राजस्थान का लगभग 13 फीसदी हिस्सा यह पर्वतमाला कवर करती है। राज्य के सात जिलों सिरोही, उदयपुर, राजसमंद, अजमेर, जयपुर, दौसा और अलवर आदि में इसका विस्तार है।

अरावली का पर्यावरणीय महत्वः अरावली राजस्थान को दो प्रमुख भौगोलिक हिस्सों में बांटती है, जिसमें पश्चिमी मरुस्थलीय क्षेत्र और पूर्वी उपजाऊ मैदान है। अरावली के तीन प्रमुख भाग हैं, जिसमें दक्षिणी अरावली, सबसे ऊंचा और सघन पहाड़ी क्षेत्र है। यहीं प्रदेश की सबसे ऊंची चोटी गुरु शिखर स्थित है, जिसकी ऊंचाई 1722 मीटर है। माउंट आबू, कुम्भलगढ़ और अचलगढ़ इसी क्षेत्र में आते हैं। इसी तरह मध्य अरावली क्षेत्र अजमेर और जयपुर के बीच फैला है। यहां टूटे-फूटे पहाड़ और घाटियां हैं। पश्चिमी राजस्थान की जीवनरेखा लूणी नदी का उद्गम भी इसी क्षेत्र से होता है। उत्तर-पूर्वी अरावली क्षेत्र में जयपुर, अलवर, सीकर और झुंझुनू में फैला हुआ है। यहां के पहाड़ सबसे ज्यादा क्षरणग्रस्त हैं। रघुनाथगढ़ और खोह यहां के प्रमुख शिखर हैं।

राजेंद्र सिंह कहते हैं कि अगर अरावली कमजोर हुई तो दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और पूर्वी राजस्थान में तापमान और प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ेगा। अरावली से बनास, लूणी, साबरमती और साहिबी जैसी नदियां निकलती हैं। यह क्षेत्र तेंदुआ, सियार, नीलगाय, सांभर और कई दुर्लभ प्रजातियों का प्राकृतिक आवास स्थल भी है। सरिस्का टाइगर रिजर्व और कुम्भलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य अरावली की जैव विविधता के प्रमुख उदाहरण हैं। अरावली में खनिजों की भरमार है। यहां तांबा, जस्ता, सीसा, संगमरमर और ग्रेनाइट आदि खनिज पाए जाते हैं। यही कारण है कि संरक्षण और विकास के बीच टकराव लगातार बढ़ता जा रहा है।

अरावली कमजोर होने के यह दुष्प्रभाव होंगेः

                                                                

अशोक गहलोत और ‘सेव अरावली’ अभियानः राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अरावली की नई परिभाषा को उत्तर भारत के भविष्य के लिए खतरा बताया है। उन्होंने ऊंचाई आधारित परिभाषा का विरोध करते हुए कहा कि अरावली को उसके पर्यावरणीय योगदान के आधार पर आंका जाना चाहिए। उनका कहना है कि अरावली दिल्ली-एनसीआर के लिए फेफड़ों की तरह काम करती है। अगर इसमें छेड़छाड़ हुई तो जल संकट, प्रदूषण और तापमान तीनों ही बढ़ेंगे। इसमें 159 क्षेत्र ऐसे हैं, जहां गढ़ किले या फिर ऐतिहासिक मंदिर मौजूद है। यह सभी क्षेत्र पूरी तरह से प्रोटेक्ट या फिर रिजर्व है।

संचेती बोले, सिर्फ पहाड़ नहीं, भविष्य का सवालः राजस्थान के पूर्व चीफ टाउन प्लानर एच. एस. संचेती मानते हैं कि अरावली सिर्फ पहाड़ों की शृंखला नहीं, बल्कि उत्तर-पश्चिम भारत की जीवनरेखा है। अरावली को नहीं बचाया गया, तो इसका असर खेती, पानी, जलवायु, वन्यजीव और मानव जीवन पर पड़ेगा। उनके मुताबिक अरावली पर्वत शृंखला एक बायोडायवर्सिटी का केंद्र है, जहां प्राकृतिक संसाधनों के बीच पर्यटन और धार्मिक आस्था के केंद्र है। यह पर्वत श्रृंखला राजस्थान की ऐतिहासिक विरासत और धरोहर की भी गवाह है। इसके अस्तित्व के साथ भविष्य को बेहतर बनाया जा सकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।