
संबंधों की दुनिया में संवेदना का अभाव Publish Date : 14/11/2025
संबंधों की दुनिया में संवेदना का अभाव
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
इस पूरे संसार में सभी लोग किसी न किसी से किसी न किसी प्रकार जुड़े हुए हैं अर्थात कोई यह नहीं कह सकता कि मैं सब प्रकार से बिल्कुल स्वतंत्र हूं। हिंदू दर्शन की दृष्टि में मनुष्य, पशु, पत्थर, जल और वनस्पति सबमें ब्रह्म है। इसी लिए यह सब एक दूसरे का पोषण करते हैं, मनुष्य को दूध पशु देता है जल से वह अपनी प्यास बुझाता है और खाद्य पदार्थ वनस्पतियां उपलब्ध करवाती है और अपने रहने के लिए पत्थरों का घर बनाता है।
इन सबमे जो अंतर्निहित ब्रह्म है वही एक दूसरे की आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए स्वयं को प्रस्तुत करता है। मनुष्य से मनुष्य का संबंध भी ऐसा ही है, एक मनुष्य दूसरे की आवश्यकता पूरी करता है या कर सकता है जिससे उनका आपस में जुड़ाव होता है। आवश्यकताएं अलग अलग प्रकार की हो सकती हैं । शरीर, मन और बुद्धि की अपनी जरूरतें होती हैं वे सब जरूरतें अधिकांशतः कोई दूसरा पूरी करता है।
हिंदू जीवन मूल्यों के कारण इस संबंध में विवशता नहीं बल्कि स्वाभाविक दायित्व का बोध रहने के कारण देने वाले को अहंकार नहीं और लेने वाले में अधिकार का भाव नहीं आता है। लेकिन इन संबंधों में संवेदना समाप्त या कम हो जाने के कारण अहंकार और अधिकार का प्रभाव बढ़ रहा है।

यह दोनों ही संसार में दुःख के कारण के रूप में देखे जा सकते हैं। जब मनुष्य अकेला नहीं है तो स्वाभाविक है कि वह जो कुछ अच्छा या बुरा अनुभव कर रहा है वह केवल उसके कृत्यों के कारण ही नहीं बल्कि जिनसे उसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध है यह उन सबके कर्मों का परिणाम है।
अतः हमे यह समझना होगा कि मेरे व्यवहार का परिणाम केवल मुझे नहीं बल्कि और लोगों के सुख दुख का कारण होता है इसलिए मैं किसी के दुख का कारण न बन सकूं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
