
भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाएं Publish Date : 24/10/2025
भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाएं
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
दूसरे देशों में रहने वाले हमारे लोगों ने वहाँ सुख, समृद्धि और सम्मान के साथ जीवन जीने और उस देश में अपनी छवि को ऊँचा करने के लिए विचारों और व्यवहार का एक बिल्कुल अलग दृष्टिकोण अपनाया है। उनके मन में यह बात होनी चाहिए कि भारत एक महान देश है और नियति ने विश्व के प्रति उसका एक निश्चित मिशन निर्धारित किया है जिसके लक्षण स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं।
हमारे पूर्वजों द्वारा परिभाषित सफल जीवन के उच्च आदर्शों को समस्त मानव जाति तक पहुँचाना हमारा दायित्व है। आज विश्व अनेक समस्याओं से जूझ रहा है, निस्संदेह, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित हिंदू दर्शन इन सभी समस्याओं का समाधान करने की क्षमता रखता है। यह मिशन हमारे सामने होने पर अन्य सभी विचार स्वतः ही स्पष्ट हो जाते हैं। हमें किस मार्ग पर चलना चाहिए? इस प्रश्न का कोई संतोषजनक उत्तर दूसरों के पास नहीं है, लेकिन हम इसका उत्तर दे सकते हैं। इसका उत्तर भौतिकवाद में नहीं है बल्कि भौतिकवाद सभी लोगों में विभाजन का कारण बन सकता है। इसलिए, वैश्विक एकता के लिए, भौतिकवाद से ऊँचा एक मंच आवश्यक है।
अब हमें यह सोचना होगा कि ऐसा मंच क्या हो सकता है और इसे बनाते समय हिंदू समाज को संगठित करने के हमारे कार्य द्वारा इसमें क्या योगदान दिया जा सकता है।
दुर्भाग्यवश, आज इस महान सांस्कृतिक विरासत का उपहास और उपेक्षा माँ भारती की अपनी ही संतानों द्वारा की जाती दिखाई देती है। अपनी परंपराओं और आदर्शों का उपहास करना और आधुनिक “वादों”के अनुरूप अपने सामाजिक जीवन के पुनर्गठन की बात करना एक “फैशन”बन गया है। अपनी स्वाभाविक प्रवृत्तियों को विकसित करने के स्थान पर, अपनी ही जीवन-शैली को उखाड़कर उसके स्थान पर कोई नई जीवन-व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है।

किन्तु इससे केवल विनाश और पतन ही होगा। इस प्रवृत्ति के भयंकर परिणाम अब दृष्टिगोचर होने लगे हैं। विभिन्न वादों और संप्रदायों के नाम पर सक्रिय हिंसक शक्तियाँ हमारे विभाजित और आत्मविश्वासविहीन समाज को निगलती प्रतीत हो रही हैं। जो समाज स्वयं को धिक्कारता है, जो विभाजन और अलगाववादी प्रवृत्तियों से दुर्बल हो गया हों वह संसार को कैसे कुछ सिखा सकता है? जो व्यक्ति अपने जीवन को विकसित करने का प्रयत्न नहीं करता, वह दूसरों को श्रेष्ठता का पाठ नहीं पढ़ा सकता। यदि हम अपने अद्वितीय ज्ञान भंडार को सम्पूर्ण मानव जाति तक फैलाना चाहते हैं।
यदि हम वास्तव में वैश्विक एकता और वैश्विक कल्याण के प्रयासों में अपना योगदान देते हुए भी अपनी पहचान बनाए रखना चाहते हैं, तो सबसे महत्वपूर्ण बात जो हमें करनी होगी, वह यह है कि हमें सम्पूर्ण विश्व के समक्ष एक आत्मविश्वासी, शक्तिशाली और विजय-प्रधान राष्ट्र के रूप में उभरना होगा ।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
