वैश्विक कल्याण के लिए हिंदू जीवन शैली का महत्व      Publish Date : 21/10/2025

         वैश्विक कल्याण के लिए हिंदू जीवन शैली का महत्व

                                                                                                                                                                                       प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

धर्म के अभाव में मानव समाज निरंतर परस्पर विनाश में संलग्न रहने वाला जंगली जानवरों का एक समुदाय बनकर ही रह जाएगा। अतः सम्पूर्ण मानव जाति के प्रति अपने प्रेम को अभिव्यक्त करने के लिए, हमें अपने निहित स्वार्थों का परित्याग करना होगा, समाज में पूर्णतः एकाकार होना होगा और हिन्दू धर्म के प्रति दृढ़ निष्ठा के आधार पर अपनी पावन भारतभूमि का पुनर्निर्माण भी करना होगा।

हमें सच्चे हिन्दू धर्म का जागरण करना होगा और उसकी गरिमा को सभी के हृदय में स्थापित करना होगा। हमें सम्पूर्ण विश्व के समक्ष अपने देश और समाज की छवि एक आदर्श, विश्व-प्रेमी, सर्वसमावेशी राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करने का दृढ़ संकल्प लेना होगा। हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि चूँकि हमने एक हिन्दू रूप में जन्म लिया हैं, इसलिए एकता की यह भावना हमारे रक्त में प्रवाहित हो रही है।

कुछ लोग तर्क देते हैं कि व्यक्ति हिंदू, मुसलमान या ईसाई के रूप में नहीं, बल्कि एक इंसान के रूप में जन्म लेता है। यह बात कुछ दूसरे लोगों के लिए तो सच हो सकती है, लेकिन हम हिंदुओं के लिए कदापि भी नहीं। एक हिंदू का पहला संस्कार उसकी माँ के गर्भ में ही होता है और अंतिम संस्कार तब होता है जब उसके इस नश्वर शरीर को अग्नि में समर्पित किया जाता है।

                                                              

कुल मिलाकर ऐसे 16 संस्कार हैं जो एक हिंदू को हिंदू बनाते हैं। दरअसल, हम इस दुनिया में पहली सांस लेने से पहले ही हिंदू होते हैं। हम जन्म लेते ही हिंदू हो जाते हैं, जबकि कुछ लोग अनाम मानव प्राणी के रूप में जन्म लेते हैं और सुन्नत या बपतिस्मा होने के बाद मुसलमान या ईसाई बनाए जाते हैं।

इसलिए, यह हमारा स्वाभाविक दायित्व है जो कि हमें जन्म से ही प्राप्त होता है - कि हम अपने समाज में एकता और अखंडता को शक्तिशाली बनाएं। भगवद्गीता के अनुसार - “सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमावापि न त्यजेत्।”

अतः सभी मतभेदों और विवादों को समाप्त कर एक संगठित, सामंजस्यपूर्ण और सुव्यवस्थित सामाजिक जीवन का निर्माण करना हमारा परम कर्तव्य है। अतः हमें अपने मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं को पार करने, प्रत्येक हिन्दू परिवार को अंतर्निहित एकता का संदेश देने तथा प्रत्येक हिन्दू हृदय में जीवंत दैवीय-समाज की उज्ज्वल मूर्ति की स्थापना करने के लिए स्वयं को तैयार करना होगा।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।