
वैश्विक शांति में हिंदू जीवन पद्धति महत्वपूर्ण Publish Date : 23/09/2025
वैश्विक शांति में हिंदू जीवन पद्धति महत्वपूर्ण
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
केवल आर्थिक व्यवस्था में परिवर्तन से सदियों पुराने मानव स्वभाव में परिवर्तन नहीं आता। आर्थिक समानता के प्रचार वाली एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ बचपन से ही धन-प्रधान साम्यवाद को मन में बिठाया जाता है और अन्य सभी विचारों और मूल्यों के प्रति अरुचि पैदा की जाती है।
लेकिन यह इन सबसे परे, घृणा का प्रशिक्षण सत्ता-लोलुपता, अहंकार, व्यक्तिगत प्रभाव और ऐसी अन्य प्रवृत्तियों को पोषित करता है, जो कहीं गहरे में छिपी होती हैं, लेकिन बार-बार उभरकर मानव संघर्ष को जन्म देती हैं। आज यह सब होता हुआ हमे प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे रहा हैं। उपभोग की प्रधानता का वास्तविक विनाशकारी स्वरूप समय के साथ सभी को स्पष्ट हो रहा है। दूसरों को नष्ट करके लोगों को सुखी बनाने का दावा कितना अजीब है।

यह विश्वास करना कठिन है कि यह कभी भी संपूर्ण मानव जाति की गरिमा और भाईचारे, प्रेम और विश्वास की भावना जैसे गुणों को स्थापित कर पाएगा। केवल भोले-भाले लोग या केवल वे अदूरदर्शी लोग जो कि जीवन की अपनी वर्तमान स्थिति से किसी भी तरह से राहत पाने के लिए आतुर रहते हैं, वे ही इस प्रकार से सोच सकते हैं।
भौतिक दृष्टि से प्रगति करने वाले लोगों ने भारत के ऋषियों, मुनियों और दार्शनिकों तथा उनके जीवन एवं दर्शन के आदर्शों पर पर्याप्त रूप से ध्यान नहीं दिया है। लोगों ने विश्वव्यापी एकता का स्वप्न देखा था और उसके समर्थन में सिद्धांत प्रतिपादित किए थे। वस्तुतः हिंदू दर्शन यह सिखाता है कि एक सार्वभौमिक परम सत्य सर्वव्यापी है, केवल यही दर्शन मानव जीवन को गरिमा प्रदान कर सकता है, जो मानवता और बंधुत्व की भावना से अभिव्यक्त होती है।
विविधता में व्याप्त एकता इस दर्शन की सत्यता का परिचायक है। इस महान दर्शन की आराधना करने और इसे जीवन का आधार बनाने के लिए यह आवश्यक है कि एक एकात्म, शांतिपूर्ण और संतुष्ट मानवतावाद की स्थायी नींव रखी जाए।
इस ज्ञान की नींव पर जीवन को गढ़ने का कोई वास्तविक, गहन प्रयोग जब भी हुआ है, चाहे वह छोटे स्तर पर ही क्यों न हुआ हो, उसकी झलक मात्र से भी परस्पर प्रेम, विश्वास, आत्मीयता और सहयोग आदि मूल्यों का जीवन में समावेश हुआ है और उस समाज का समग्र विकास भी हुआ है। संशय और संघर्ष से भरी दुनिया के लिए हिंदू विचार ही शांति प्रदान कर सकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
