
चने की किस्म पीबीजी-10 से प्राप्त करें दोगुनी पैदावार Publish Date : 17/12/2025
चने की किस्म पीबीजी-10 से प्राप्त करें दोगुनी पैदावार
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं गरिमा शर्मा
पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (पीएयू) ने किसानों के लिए चने की नई किस्म ‘पीबीजी-10’ विकसित की है। चने की यह किस्म न केवल पोषण की दृष्टि से श्रेष्ठ है, बल्कि किसानों की आर्थिकी को भी मजबूत बनाने वाली है। यूनिवर्सिटी के प्लांट ब्रीडिंग और जेनेटिक्स विभाग ने इंटरनेशनल क्राप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी एरिड ट्रापिक्स (आइसीआरआइसैट) हैदराबाद के सहयोग से 12 वर्ष के शोध और फील्ड ट्रायल के बाद इस किस्म को विकसित किया है।
पीबीजी-10 की सबसे बड़ी विशेषता इसका उच्च प्रोटीन युक्त होना है। इसमें 21.63 प्रतिशत प्रोटीन है, जो चने की पारंपरिक किस्मों में 19-20 प्रतिशत तक ही होता है और साथ ही इस किस्म के दाने भी बड़े हैं।
इसके 100 दानों का वजन 25.9 ग्राम होता है, जो पुरानी किस्मों (14-15 ग्राम) की तुलना में अधिक है। उत्पादन के मामले में भी पीबीजी 10 शानदार है। फील्ड ट्रायल में इसकी औसत उपज प्रति एकड़ 8.6 क्विंटल दर्ज की गई, जो पंजाब की मौजूदा किस्मों से लगभग दोगुनी है। इस किस्म से सीधे तौर पर किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी होगी।

किसान इसकी बुवाई 25 अक्टूबर से 15 नवंबर के बीच करें तो करीब 150 दिनों में फसल तैयार हो जाती है। पानी की कम जरूरत के कारण यह सिंचाई संसाधनों के दबाव वाले क्षेत्रों के लिए भी बेहद उपयोगी किस्म है।
पीबीजी-10 को तैयार करने वाली टीम में मुख्य रूप से डा. शायला बिन्द्रा, डा. सर्बजीत सिंह, डा. इंद्रजीत सिंह, गुरइकबाल सिंह, हरप्रीत कौर, उपासना रानी, रविंदर सिंह और हरप्रीत कौर ओबराय शामिल हैं। टीम के कई वैज्ञानिक अब सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं।
मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में सहायक

चने की जड़ों पर राइजोबियम बैक्टीरिया द्वारा नोड्यूल्स बनते हैं जो मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन स्थायी (फिक्स) करते हैं। इससे न सिर्फ अगली फसल को खाद मिलने में मदद मिलती है, बल्कि रासायनिक उर्वरकों की जरूरत भी कम हो जाती है। कई क्षेत्रों में मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम होने की समस्या बढ़ रही है। ऐसे में पीबीजी-10 जैसी किस्में कृषि संतुलन और पर्यावरण संरक्षण दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
