चने की किस्म पीबीजी-10 मतलब अधिक उत्पादन      Publish Date : 29/11/2025

             चने की किस्म पीबीजी-10 मतलब अधिक उत्पादन

                                                                                                                                                                प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के द्वारा किसानों के लिए चने की नई किस्म पीबीजी-10 जारी की गई है। यह किस्म न केवल पोषण की दृष्टि से उत्तम है बल्कि यह किसानों की आर्थिक स्थिति को भी मजबूत करने में सहायक है। विश्वविद्यालय के प्लांट बिल्डिंग और जेनेटिक्स विभाग ने इंटरनेशनल क्रॉप रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर थेसेमी एरिड टॉपिक्स हैदराबाद के सहयोग से 12 वर्ष के शोध और फील्ड ट्रायल के बाद इस किस्म को विकसित किया है।

पीजीबी-10 की सबसे बड़ी विशेषता इसका उच्च प्रोटीन युक्त होना है। इस किस्म में 21.63 प्रतिशत प्रोटीन है, जो चने की पारंपरिक किस्म में 19 से 20 प्रतिशत तक ही होता है। इसके साथ ही इस किस्म के दाने भी बड़े हैं और 100 दोनों का वजन 25.9 ग्राम तक होता है, चने की जो पुरानी किस्में है उनका वजन 14 से 15 ग्राम तक ही होता है।

इस किस्म का वजन तो अधिक है ही, साथ ही उत्पादन के मामले में भी पीजी-10 एक शानदार किस्म है। फील्ड ट्रायल में इसकी औसत पैदावार प्रति एकड़ 8.6 कुंतल तक दर्ज की गई, जो पंजाब की मौजूद किस्मों की अपेक्षा लगभग दोगुनी है। इससे सीधे तौर पर किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी होगी। किसान इसकी बिजाई 25 अक्टूबर से 15 नवंबर के बीच कर सकते हैं। यह लगभग 150 दिनों में पककर तैयार हो जाती है और पानी की कम आवश्यकता के कारण यह सिंचाई संसाधनों के दबाव वाले क्षेत्रों के लिए भी बेहद उपयोगी किस्म है।

                                                             

पीजीबी-10 को तैयार करने वाले टीम के मुख्य रूप से डॉक्टर शैल बिंद्रा, डॉक्टर सर्वजीत सिंह, डॉक्टर रंजीत सिंह और इकबाल सिंह, हरप्रीत कौर उपासना रानी रविंद्र सिंह और हरप्रीत कौर ओबराय शामिल है। हालांकि अब इस टीम के कई वैज्ञानिक सेवा निवृत भी हो चुके हैं।

चने की यह किस्म मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी बढ़ाने में भी है सहायक

चने की जड़ों पर राइजोबियम बैक्टीरिया द्वारा नोड्यूल्स बनाए जाते हैं, जो मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन स्थाई अर्थात फिक्स करते हैं। इससे न सिर्फ अगली फसल को खाद मिलने में मदद मिलती है बल्कि रासायनिक उर्वरकों की जरूरत भी कम हो जाती है। कई क्षेत्रों में मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम होने की समस्या बढ़ रही है, ऐसे में पीजीबी-10 जैसी किस्म कृषि संतुलन और पर्यावरण संरक्षण दोनों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।