
पशुओं के लिए स्वादिष्ट एवं पौष्टिक बरसीम की खेती Publish Date : 26/09/2026
पशुओं के लिए स्वादिष्ट एवं पौष्टिक बरसीम की खेती
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
बरसीम, भारत में पशुओं के लिए हरे चारे के रूप में उपयोग की जाने वाली एक प्रमुख फसल है। बरसीम की फसल, पशुओं के लिए बहुत पौष्टिक होती है और इसका स्वाद भी अन्य चारे वाली फसलों से कहीं अधिक बेहतर होता है, इसलिए पशु इसे बड़े चाव से खाते हैं। यह तेजी से बढ़ती है और बरसीम की खेती करने से मिट्टी की उर्वरता क्षमता भी बढ़ती है। इसलिए, बरसीम की खेती करके किसान कम समय में अधिक लाभ कमा सकते हैं। बरसीम की खेती से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातों के बारे में जानकारी प्रदान कर रहें हैं हमारे कृषि विशेषज्ञ डॉ0 आर. एस. सेंगर-
बरसीम की खेती के लिए आवश्यक मिट्टी और जलवायु
- बरसीम की खेती के लिए भारी मिट्टी सबसे अधिक उपयुक्त मानी जाती है।
- यदि सिंचाई की अच्छी सुविधा उपलब्ध हो तो बरसीम को हल्की दोमट मिट्टी में भी आसानी से उगाया जा सकता है।
- खेत का चयन करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि मिट्टी की जल धारण क्षमता बेहतर होनी आवश्यक है।
- ठंडी जलवायु में बरसीम की खेती करने पर इसकी बेहतर फसल प्राप्त की जा सकती है।
खेत की तैयारी और उर्वरक की मात्रा
- सबसे पहले, मिट्टी पलटने वाले हल से खेत की एक बार गहरी जुताई करनी चाहिए।
- इसके बाद, हल या कल्टीवेटर से 3 से 4 बार हल्की जुताई करनी चाहिए।
- खेत की जुताई के बाद, खेत में एक गड्ढा बना दें। इससे खेत की मिट्टी समतल हो जाएगी।
बरसीम की फसल के लिए प्रति एकड़ खेत में 10 किलोग्राम नाइट्रोजन, 32 किलोग्राम फास्फोरस और 8 किलोग्राम पोटाश का उपयोग करना बेहतर रहता है।
बरसीम में सिंचाई
- हल्की मिट्टी में, 3 से 5 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए।
- भारी मिट्टी में 6 से 8 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करना आवश्यक है।
- शीत ऋतु में सिंचाई 10 से 12 दिनों के अंतराल पर करनी चाहिए।
- यदि आप ग्रीष्म ऋतु में बरसीम की खेती कर रहे हैं तो इसके लिए 8 से 10 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए।
फसल की कटाई
- बुवाई के लगभग 50 से 55 दिन बाद पहली बार फसल की कटाई की जा सकती हैं।
- इसके बाद, इसे 25 से 30 दिनों के अंतराल पर काटते रहना चाहिए।
- वहीं ग्रीष्म ऋतु के दौरान 35 से 40 दिनों के अंतराल पर फसल की कटाई करनी चाहिए।
- फसल को जमीन की सतह से 5 से 7 सेंटीमीटर की ऊंचाई पर काटना उचित रहता है।
लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।