उड़द खेती की उन्नत खेती से भरपूर कमाई प्राप्त करें किसान      Publish Date : 19/09/2026

उड़द खेती की उन्नत खेती से भरपूर कमाई प्राप्त करें किसान

                                                                                        प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

किसान भाइ्रयों आज हम बात करने जा रहे हैं उड़द की उन्नत खेती के बारे में। दलहनी उद्यम में उड़द का अपना प्रमुख स्थान है और विश्व स्तर पर उदद के उत्पादन में भारत एक अग्रणी देश है। भारत के मैदानी उद्यमों में इसकी खेती का मुख्य स्थान, बाजार के अनुसार होता है। लेकिन पिछले दो दशकों से फ्लाएड की खेती ग्रीष्म ऋतु में भी लोकप्रिय हो रही है। देश में उड़द की खेती महाराष्ट्र, आंधप्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और बिहार में मुख्य रूप से की जाती है। वहीं यदि पोषक तत्वों की बात करें तो उड़द की दाल में 23 से 27 प्रतिशत तक प्रोटीन पाया जाता है। भूमि को भी पोषक तत्त्व प्रदान करता है। इसके याथ इसकी फलियों को हरी खाद के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है।

उड़द की खेती के लिए उपयुक्त मौसम

उड़द की खेती के लिए नम और गर्म मौसम की जरूरत होती है। उड़द की फ़सल का उत्पादन अधिकांश प्रोटीन एवं एक पोषक दाल के लिए की जाती है। उड़द वृद्धि का समय उचित तापमान 25-35 डिग्री सेंटीग्रेड अधिकतम को माना जाता है। हालांकि यह 43 डिग्री सेंटीग्रेट तक का तापमान आसानी से सहन कर सकता है। 700-900 मिमी वर्षा वाले क्षेत्र में उड़द की फसल को आसानी से लिया जा सकता है। अधिक जल भराव वाले स्थान पर इसकी खेती करना सही नहीं होता है। फूल अवस्था पर अधिक वर्षा उड़द की खेती लिए अच्छी नहीं मानी जाती है। इस समय हुई वर्षा से बड़े स्तर पर इसका दाना ख़राब हो जाता है।

उदद की खेती के लिए उपयुक्त भूमि का चयन

उड़द की खेती विभिन्न प्रकार की भूमि में की जा सकती है। पुरानी रेतीली, दोमट या मध्यम प्रकार की भूमि जिसमें पानी का सूखा अच्छा हो, उड़द की खेती के लिए अधिक उपयुक्त होती है। मृदा का पी.एच. मान 7-8 के बीच वाली भूमि को इसकी खेती के लिए अच्छा माना जाता है। अम्लीय एवं अम्लीय भूमि इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती है। वर्षा आरंभ होने के बाद दो-तीन बार हलके कृषि क्षेत्र में मामूली गिरावट आती है। वर्षा आरंभ होने से पहले सही तरीके से देखभाल करने से फसल की वृद्धि अच्छी होती है। साथ ही खेत को समलत करके जल सुविधा की व्यवस्था भी बेहतर आवश्यक है।

उड़द की फसल में खाद एवं विभिन्न प्रबंधन

दलहनी फसल के कारण उड़द को अधिक होना नाइट्रोजन की आवश्यकता नहीं होती है, क्योंकि उडद की जड़ में उपस्थित राजोबियम बैक्टीरिया वायुमंडल की स्वतंत्र नाइट्रोजन को ग्रहण करना और पौधों को प्रदान करने में सक्षम होते है। उपचार की प्रारंभिक अवस्था में जब तक नवजात पौधों में नाइट्रोजन एकत्रित करने वाले बैक्टीरिया क्रियाशील हो तब तक के लिए 15 से 20 किलोग्राम नाइट्रोजन 40-50 किलोग्राम अनाज और 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हैक्टेयर की दर से प्रारंभ के समय में समझाना शामिल है। संपूर्ण खाद्य पदार्थों की मात्रा उड़द की बुवाई के समय कूंडों में बीच के ठीक नीचे दिया जाना चाहिए। डेलहनी डाइजेस्ट में गंधक युक्त स्टैंडर्ड जैसे सिंगल सुपर फास्फेट, अमोनियम मोनो, जिप्सम आदि का उपयोग करना चाहिए।

विवरणः गंधक की कमी वाले क्षेत्र में 8 बैरल गंधक प्रति बैरल गंधक युक्तियों के माध्यम से दिया जाना चाहिए।

उड़द की खेती में बीज की मात्रा एवं बीजोपचार

उड़द की अकेले करने पर 15 से 20 किलोग्राम बीज प्रति हैक्टेयर तथा मिश्रित फसल के रूप में 6-8 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से देनी चाहिए। पहले बीज को 3 ग्राम थायरम या 2.5 ग्राम डायथेन एम-45 प्रति किलो बीज के साथ उपचारित करना चाहिए। बायोलॉजिकल बीजोपचार के लिए ट्राइकोडर्मा कलर्स मास्क 5 से 6 ग्राम प्रति किलो बीज की मात्रा का उपयोग किया जाता है।

उड़द की बुवाई का सही तरीका व समय

मानसून के आगमन या जून के अंतिम सप्ताह में साम्यवादी वर्षा पर होना। डिस्ट्रीब्यूशन या ड्रिप सिंचाई से करें, लाईन से लाईन की दूरी 30 सेमी और पौधे से पौधे के बीच की दूरी 10 सेमी रखनी चाहिए और इसके साथ उड़द के बीज को 4-6 सेमी की गहराई पर बोये। ग्रीष्मकाल में इसकी बुवाई फरवरी के अंत तक या अप्रैल के पहले सप्ताह से पहले करना चाहिए।

उड़द की खेती में सिंचाई

उड़द की खेती में सामान्यतः सिंचाइ्र की बहुत अधिक आवश्यकता नहीं होती है। हालांकि वर्षा के अभाव में फलियों के निर्धारित समय पर सिंचाई करना जरूरी होता है। इसके फ़सल को 3 से 4 बार सिंचाई करनी पड़ती है। पहली सिंचाई पलेवा के रूप में और बाकी की सिंचाई 20 दिन के लिए अंतराल से करनी चाहिए।

निराई-गुड़ाई

उड़द की फसल को खरपतवार बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाते हैं। अतः अच्छे खरपतवार के अच्छे प्रबन्धन के लिए समय-समय पर निराई-गुड़ाई खुरपी और डोरा आदि को अन्य आधुनिक नींदनाशक की रसायनों का उपयोग करना चाहिए। नींदानाशक वसालीन 800 मिली से 1000 मिली प्रति 250 लीटर पानी में ग्लूकोज़ भूमि बुकरने से पूर्व खेत में छिड़कने से अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं।

उड़द बीज का राइजोबियम से उपचार

उड़द के दल्हनी फल होने के कारण पुराने जमाव निर्माण और बैक्टीरिया में जीवाणुरोधी दवाओं की सही तरीके से काम करने के लिए राइजोबियम कलचर से बीज का उपचार करना जरूरी है। एक पौधा (200 ग्राम) कल्चर 10 किलोग्राम बीज के लिए सही रहता है। उपचार करने से पहले आधा किलो पानी का 50 ग्राम गुड या चीनी के साथ घोल बना लें। उसके बाद कल्चर को जलवायु तैयार कर लें। अब इस मसाले को अच्छी तरह से अलग करके देखें। ऐसा बुवाई आरंभ करने से 7-8 घंटे पहले करना चाहिए।

उड़द में रोग नियंत्रण

उड़द की फसल में वर्षाकालीन कीट एवं रोगों का प्रकोप अधिक होता है जिससे उपज में 40-50 प्रतिशत हानि हो सकती है। रसायनिक विधि द्वारा कीट नियंत्रण के लिए 1 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से 1000 लीटर पानी के घोल का विनाश पूर्व क्षेत्र में किया जा सकता है। फ़ासल के दस्तावेज़ीकरण के बाद, लेकिन बीज के आकार से पेंडिमिथलीन 1.25 किलो 1000 लीटर पानी में घोलकर नाइट्रोजन पर नियंत्रण किया जा सकता है। यदि नारियल फसल में उगते हैं तो 15-20 दिन की अवस्था में पहली निराई तथा गुड़ाई खुरपी की सहायता से कर-सुथरा तथा पुनः प्राप्त किया जा सकता है। खरपतवार उगने पर 15 दिन बाद निराई करनी चाहिए।

उड़द के फसल चक्र और मिश्रित खेती

वर्षा ऋतु में बाढ़ की फसल अवधिः मिश्रित रूप से मक्का, ज्वार, बाजरा, कपास और अरहर आदि के साथ उगाई जा सकती हैं। उड़द के साथ अपनाए जाने वाले साधन फसल चक्र कुछ इस प्रकार से हैं-

  • सिंचित क्षेत्रः उड़द-सरसों, उड़द-गेहूँ।
  • असिंचित क्षेत्रः उड़द-पड़त-मक्का, उड़द-पड़त-ज्वार

उड़द की फ़सल में कीटों की रोकथाम

फली छेदक कीटः इस कीट की सूड़ियां फलियों में छेदकर दानों को खाती है, जिससे उपज का भारी नुकसान होता है।

रोकथामः मोनोक्रोटोफास का एक लीटर प्रति हैक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

सफ़ेद मक्खीः यह कीट उड़द फसल का प्रमुख कीट है। जो येलो मोजैक वायरस के वाहक के रूप में कार्य करता है।

रोकथामः ट्रायाज़ॉफ़ॉस 40 ई.सी. एक लीटर का 500 लीटर पानी में घोल बनाएं। इमिडाक्लोप्रिड की 100 लीटर मात्रा या 51 इमेथोएट की 25 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकऱ प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें।

अर्ध कुंडलक (सेमी ल्यूपर): यह कीट मुख्यतः उड़द की कोमल पत्तियों को खाकर फसल को चुनौती देता है।

रोकथामः प्रोफ़ेनोफ़ॉस 50 ई.सी. 1 लीटर का 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

एफआईडीः यह कीट मुलांकुर का रस चूसता है जिससे फसल की बढ़ोतरी रुक जाती है।

रोकथाम के उपायः क्लोर पेरीफॉस 20 ई.सी. 500 मिली लीटर 1000 लीटर पानी के घोल में समग्र छिडकाव करना चाहिए।

उड़द की फसल के रोग और उनकी रोकथाम

पीला मोजेक विषाणु रोगः यह उड़द का सामान्य रोग है और वायरस से नष्ट हो जाता है। इसका प्रभाव 4-5 सप्ताह बाद ही दिखाई देने लगता है। इस रोग में सबसे पहले पीले रंग के सॉसेज़ स्टॉक में दिखाई देते हैं। कुछ ही दिनों में पौधे पूरी तरह से पीला बन जाते हैं। अंत में ये सूखकर मर जाते है।

रोकथाम के उपायः सफेद मक्खी से रोग पर नियंत्रण संभव है। व्हाउड का पीला मोजैक रोग क्रिटिकल पैंट यू-19, पंत यू-30, यू.जी. 218, टी.पी.यू.-4, पंत फ्लोयड-30, बरखा, के.यू.-96-3 प्रजातियों की बुवाई करनी चाहिए।

पत्ती मोड रोगः नई पत्तियों पर हरिमाहीनता अनैच्छिकता के रूप में पत्ती की मध्य शिराओं पर दिखाई देते हैं। इस रोग में पशु मध्य शिराओं के ऊपर की ओर मुड़े होते हैं और नीचे की ओर के जीव अंदर की ओर मुड़े होते हैं और फसल की वृद्धि रुक जाती है और अंत में प्रभावित पौधे मर जाते हैं।

रोकथाम के उपायः यह एक विषाणु जनित रोग है। जिसका परिमाण थ्रिप्स द्वारा होता है। तीन एप्स के लिए एसीफेट 75 प्रतिशत एस.पी. या 2 मिली डायमैथोएट प्रति लीटर के खाते से बचत करना चाहिए और फसल की लागत पर समय निकालना चाहिए।

धब्बा रोगः यह इस रोग की विशेषता है। इसके लक्षण छोटे-छोटे धब्बेदार के रूप में दिखाई देते हैं।

उपायः कार्बेन्डाजिम 1 किलो 1000 लीटर पानी के घोल के साथ बड़ा डोज देना चाहिए।

उड़द की कटाई

उड़द की फसल लगभग 85-90 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। हंसिया के फल की कटाई के लिए हंसिया का उपयोग करना चाहिए। कटिंग का काम 70 से 80 प्रतिशत फलियों के तैयार होने पर किया जाना चाहिए। फ़सल को खलिहान में ले जाने के लिए अच्छी परिवहन व्यवस्था का होना जरूरी है।

फैलाव

दानों में मौजूद नमी को दूर करने के लिए धूप में अच्छी तरह से सुखाना जरूरी है। इसके बाद फसल को भंडारित किया जा सकता है।

उड़द की उपज

शुद्ध फ़सल में 10-15 सामान्य प्रति हैक्टेयर और मिश्रित फ़सल में 6-8 सामान्य प्रति हैक्टेयर की उपज होती है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।