बाकला की खेती के हैं बड़े लाभ      Publish Date : 16/09/2026

          बाकला की खेती के हैं बड़े लाभ

                                                                                          प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

बाकला की फसल वास्तव में एक ऐसी फसल है जो कि आज भी भारत में अपने आप को पूरी तरह से स्थापित नहीं कर पाई है। भारत में इस फसल को हकीकत में एक अनाथ फसल के रूप में ही जाना जाता है और यह फसल अभी भी किसानों की उपेक्षा की शिकार बनी हुई है।

दुनियाभर में उगाई जाने वाली तमाम दलहनी फसलों में सोयाबीन और मटर के बाद बाकला का स्थान आता है। इस प्रकार से बाकला का उपयोग न केवल अनाज की फसल के रूप में किया जाता है बल्कि इसमें औषधीय गुण भी उपलब्ध होते हैं। बाकला से अधिक उत्पादन देने की क्षमता अन्य किसी भी दलहनी फसल में नहीं पाई गई है।

बाकला सूखे को तो सहन कर ही लेता है साथ ही कुछ समय के लिए पानी को भी सहन कर लेता है और कुछ सीमा तक अम्लीय मिट्टी में भी इसको उगाया जा सकता है। इस के पौधे में बढ़ने की अच्छी क्षमता पाई जाती है।

कम समय में तैयार होने वाली फसल

इस की फसल के पकने यानी तैयार होने की अवधि भी मटर के बाद सब से कम होती है। इसकी शुष्क खेती करने के दौरान यह 105 से 107 दिनों व सिंचित अवस्था में 115 दिनों में फसल तैयार हो जाती है, चूंकि इसकी फसल पर पाले का असर नहीं होता, इसलिए किसी विशेष सावधानी की भी आवश्यकता नहीं होती है।

बाकला द्वारा हर साल प्रति हेक्टेयर 150-300 किलोग्राम नाइट्रोजन का फिक्सेशन यानी भूमि में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण होता है, जो 3 सौ से 6 सौ किलोग्राम से भी अधिक यूरिया के बराबर होता है।

खेत की तैयारी

बकला को किसी भी प्रकार की भूमि में अच्छे से उगाया जा सकता है, लेकिन बलुई दोमट मिट्टी में इस की पैदावार अच्छी होती है। खेत को 1-2 जुताई कर के तैयार करना चाहिए। जुताई के बाद पाटा जरूर लगाना चाहिए, जिससे कि मिट्टी के बडे ढेले फूट जाएं और जमीन समतल हो जाए।

बुवाई करने का उचित समय

अगेती बुवाई करने पर इस की बढ़वार अच्छी होती है। इस की बुवाई धान की सीधी बोआई में जून-जुलाई के माह में भी उतेरा के रूप में की जाती है। सामान्यतः इसकी बुवाई का सबसे अच्छा समय नवंबर व दिसंबर महीने को माना जाता है। इसे 15 दिसंबर तक अवश्य ही बो देना चाहिए। इस को खेत की मेंड़ पर डिबलिंग कर के भी लगाया जा सकता हैं। इसके अतिरिक्त बाकला की फसल को मसूर, आलू, मक्का व गन्ना के बीच अंतरवर्ती फसल के रूप में भी उगाया जा सकता हैं।

बाकला की उत्तम वैरायटी

केंद्रीय प्रजाति नामांकन समिति ने आज तक बाकला की मात्र 2 किस्मों को ही अधिसूचित किया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, पटना द्वारा इस की 2 प्रजातियां तैयार की गई हैं:

विक्रांत (वीएच-82-1): हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार ने इस किस्म को विकसित किया है। इस की औसत बीज उपज पहाड़ों पर 8-10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, जबकि मैदानों में 15-35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। विक्रांत 130-140 दिनों की फसल है।

पूसा सुमितः इस किस्म को आईएआरआई, नई दिल्ली पूसा के द्वारा विकसित किया गया है। इस किस्म के पौधे 75 सेंटीमीटर तक लंबे होते हैं और पौधे में करीब 10 शाखाएं होती हैं। एक पौधे में सौ फलियां तक लगती हैं।

हरी फली की औसत उपज क्षमता 180 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। आमतौर पर हरी फलियां बुवाई के बाद 65 से 75 दिनों के बाद आनी शुरू हो जाती हैं।

2011215: बाकला की इस प्रजाति का विकास भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, पटना में एकल पौध चयन तकनीक को अपना कर किया गया है। यह किस्म सिंचित व असिंचित दशा के लिए साल 2012 में जारी की गई है। इस की फसल अवधि के परिपक्व होने की अवधि 115-120 दिनों की होती है।

2011410: इस प्रजाति को भी भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने एकल पौध चयन तकनीक से तैयार किया है। यह किस्म केवल सिंचित दशा के लिए ही अनुमोदित की गई है, इस किस्म के पौधे का आकार झाड़ीनुमा होता है।

पहली फली जमीन से 7.5 सेंटीमीटर ऊंचाई पर ही आ जाती है। पैदावार सिंचित अवस्था में 50-60 क्विंटल और फसल 120-125 दिनों की होती है।

बीज दरः बाकला की बुवाई हमेशा लाइन में करें। लाइन से लाइन की दूरी 30 सेंटीमीटर रखें। बीज 6-7 सेंटीमीटर गहराई पर बोएं। एक हेक्टेयर के लिए 75-80 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है।

बोआई से पहले बीज की 10 किलोग्राम मात्रा का 15 ग्राम थीरम और 5 ग्राम बाविस्टीन के पानी में बनाए घोल से उपचार करने से बीमारियों से बचाव हो जाता है। बीज उपचार करने के बाद छाया में सुखा लें। एक दिन बाद राइजोबियम कल्चर से इस को उपचारित करें। उपचार के लिए 5 पैकेट यानी 5 सौ ग्राम कल्चर प्रति हेक्टेयर इस्तेमाल करें। डेढ़ लीटर पानी में 150 ग्राम गुड़ घोल कर उसे धीमी आंच पर 25 मिनट तक पकाएं, घोल को ठंडा होने पर उस में कल्चर डाल दें।

प्लास्टिक की चादर या सीमेंट के फर्श पर इस मिश्रण को बीज के ढेर पर चारों तरफ थोड़ाथोड़ा डाल दें, जिस से सारे दोनों पर कल्चर अच्छी तरह लग जाए। इन उपचारित बीजों को 2-3 घंटे छाया में सुखा कर सुबह 11 बजे से पहले या शाम को 3 बजे के बाद बुवाई करें।

खाद व उर्वरक

खेत की जुताई के समय ही अगर हो सके तो कंपोस्ट खाद या गोबर की खाद का इस्तेमाल 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट व 5 किलोग्राम बोरेक्स के साथ करना चाहिए। फसल बुवाई के समय ही खेतों के कूंड़ में 45 किलोग्राम यूरिया और 325 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट व 40 किलोग्राम पोटाश का इस्तेमाल करें।

सिंचाई

वैसे तो बाकला सूखा अवरोधी फसल है, लेकिन 1-2 सिंचाई करने पर पैदावार अच्छी होती है। शुद्ध फसल में एक सिंचाई की जरूरत 45 से 50 दिनों पर फूल लगने से पहले होती है, जिस से दाने अच्छे बनते हैं।

खरपतवार

बकला में खरपतवार की समस्या बहुत कम पाई जाती है, फिर भी बुवाई के 30-35 दिनों बाद एक गुड़ाई कर दें तो खरपतवार खत्म हो जाते हैं। खरपतवार के रासायहनक नियंत्रण के लिए वासालिन 2 लीटर को बुवाई के 2-3 दिनों बाद 1000 लीटर पानी में घोल कर खेतों में छिड़काव करें।

बीमारी व कीट

फफूंद से होने वाली पत्र चित्ती व चूर्ण फफूंद का हमला कई बार देखा गया है। इस के लिए डेढ़ लीटर कैराथेन या 3 किलोग्राम सल्फेक्स को 1000 लीटर पानी में चूर्ण फफूंद के लिए और इंडोफिल का इस्तेमाल अन्य बीमारियों के लिए करना उचित होता है।

कीटों में पत्र छेदक, लाही की रोकथाम के लिए रोगर नामक दवा की 2 लीटर मात्रा का छिड़काव प्रति हेक्टेयर की दर से करना चाहिए।

अगर यह फसल सब्जी के लिए उगाई गई है, तो जिस समय फलियों में दाने पड़ जाएं, तुड़ाई कर लेनी चाहिए। इस की 100-150 क्विंटल फलियां प्रति हेक्टेयर मिल जाती हैं। जब इस को दाने के लिए उगाया जाता है, तो कटाई करने में सावधानी अपनानी चाहिए। कटाई में देर कर दी जाती है, तो दाना चटक कर गिर जाता है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।