
अधिक मुनाफे के लिए करें सफेद मूसली की खेती Publish Date : 06/09/2026
अधिक मुनाफे के लिए करें सफेद मूसली की खेती
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
खेती के सम्बन्ध में सामान्य जानकारी
सफेद मुसली का वानस्पतिक नाम क्लोरोफाइटम बोरिविलियानम है। इसकी जड़ों का उपयोग विभिन्न औषधियाँ बनाने में किया जाता है। यह एक वार्षिक पौधा होता है जिसकी औसत ऊँचाई लगभग 1 से 1.5 फीट तक की होती है। इसके फूल तारे के आकार के 2 सेंटीमीटर व्यास के और पीले या हरे रंग के होते हैं। इसके फल हरे से पीले रंग के होते हैं और मुख्य रूप से जुलाई से दिसंबर के बीच लगते हैं। इसकी जड़ें गुच्छों में होती हैं जिनमें काले बीज पाए जाते हैं। सफेद मूसली का पौधा मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय अफ्रीका में पाया जाता है। वहीं भारत में असम, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक आदि सफेद मुसली के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं।
इसकी खेती के लिए उपयुक्त मृदा
सफेद मूसली को दोमट से लेकर बलुई मिट्टी तक, अच्छी जल निकासी वाली विभिन्न प्रकार की मिट्टी में आसानी से उगाया जा सकता है। इसका पौघा पहाड़ी ढलानों या ढलान वाली भूमि में भी उग सकता है। जैविक पदार्थों से भरपूर लाल मिट्टी में उगाने पर यह सर्वोत्तम परिणाम देता है। जलभराव वाली स्थितियों में इसकी खेती करने से बचना चाहिए। सफेद मूसली की खेती के लिए 6.5 से 8.5 pH वाली मिट्टी पौधे की वृद्धि के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है।
सफेद मूसली की लोकप्रिय किस्में और उनकी उपज
आरसी-2, आरसी-16, आरसी-36, आरसी-20, आरसी-23, आरसी-37 और सीटी-1 आदि किस्मों का संरक्षण और संग्रह आरएयू, उदयपुर द्वारा किया जाता है। इन किस्मों से अच्छी उपज और उच्च सैपोनिन सामग्री प्राप्त होती है।
एमडीबी-13 और एमडीबी-14: इन किस्मों को चिकलपुटी स्थित मां दंतेश्वरी हर्बल रिसर्च सेंटर द्वारा विकसित किया गया है। इस किस्म में उच्च उपज, रोग/फफूंद प्रतिरोधक क्षमता, अधिकतम सैपोनिन और एल्कलॉइड की मात्रा पाई जाती है।
जवाहर सफेद मूसली 405 और राज विजय सफेद मूसली 414: राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्व विद्यालय, मंदसौर, मध्य प्रदेश के द्वारा जारी, यह किस्में इसकी खेती के लिए बहुत अच्छी है।
खेत की तैयारी
सफेद मूसली की खेती के लिए अच्छी तरह से तैयार नर्सरी बेड की आवश्यकता होती है। खेत तैयार करने के लिए, बुवाई से पहले एक बार गहरी जुताई की जाती है और फिर 2-3 बार कल्टीवरिंग की जाती है। खेत की तैयारी मुख्य रूप से अप्रैल-मई के महीने में की जाती है।
बुवाई के लिए उचित समय
सफेद मूसली की बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त समय जून से अगस्त तक का होता है।
पौधों के बीच उचित दूरीः
पौधे की वृद्धि की प्रवृत्ति के आधार पर 10 इंच X 12 इंच की दूरी रखना उचित माना जाता है।
बुवाई करने की विधिः अच्छी तरह से तैयार किए गए खेत में अंकुरित पौध को रोप देना चाहिए।
उचित बीज दरः
आमतौर पर कंद या बीजों द्वारा प्रवर्धन किया जाता है। उचित वृद्धि के लिए प्रति एकड़ 450 किलोग्राम बीज दर का प्रयोग करन उचित माना जाता है।
बीज उपचारः
फसल को कीटों, बीमारियों और कीटों से बचाने के लिए फफूंदनाशक और वृद्धि प्रवर्धक का प्रयोग किया जाता है। मृदा जनित रोगों से फसल की रक्षा के लिए 1 लीटर पानी में 5 मिलीलीटर ह्यूमिसिल या 5 ग्राम प्रति लीटर डाइथेन एम-45 का प्रयोग किया जाता है। रासायनिक उपचार के बाद, बीजों को बोने के लिए प्रयोग किया जाना चाहिए।
नर्सरी प्रबंधन और रोपण
सफेद मूसली के बीज 1.2 मीटर चौड़ी और उपयुक्त लंबाई की उठी हुई क्यारियों में बुवाई करना सही रहता है। नर्सरी की क्यारी अच्छी तरह से तैयार होनी चाहिए, जिस पर पौधे उगाए जाते हैं। बीज बिखेर कर बोए जाते हैं। बुवाई के बाद क्यारी को हल्की मिट्टी से ढक दें। बेहतर वृद्धि के लिए मल्चिंग की जाती है।
बीज लगभग 5-6 दिनों में अंकुरित होने लगते हैं। पौधे लगभग 5-6 दिनों में रोपने के लिए तैयार हो जाते हैं। रोपने से 24 घंटे पहले क्यारियों में पानी दें ताकि रोपने के समय पौधे आसानी से उखाड़े जा सकें और पौधे स्वस्थ बने रहें।
खरपतवार नियंत्रण
नियमित रूप से निराई-गुड़ाई, कुदाल चलाना और मिट्टी चढ़ाना चाहिए तथा खेत को तीन महीने तक खरपतवार मुक्त रखना चाहिए। अंकुरण के बाद एक बार निराई करें और खेत को खरपतवार मुक्त रखने के लिए दो बार निराई करें। यदि पौधे की वृद्धि में कोई कमी दिखाई दे तो तुरंत आवश्यक दवा अथवा रसायन का स्प्रे करना चाहिए।
सिंचाई करने की विधि
अच्छी वृद्धि और बेहतर विकास के लिए 20-22 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए। बरसात के मौसम में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है, लेकिन बारिश न होने की स्थिति में उचित अंतराल पर सिंचाई आवश्यक है। जलवायु और मिट्टी के अनुसार सिंचाई की मात्रा भिन्न हो सकती है।
पौध संरक्षण
प्रमुख कीट और उनका नियंत्रणः
सफेद ग्रबः यह ग्रब पौधों की जड़ों को कुतरकर पौधों को नष्ट कर देते हैं।
सफेद ग्रब से छुटकारा पाने के लिए एल्ड्रिन का प्रयोग 10 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से करना चाहिए है।
पत्ती झुलसा रोगः यह एक रोगजनक होता है जिसके कारण पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं, फिर मुरझा जाती हैं और अंततः प्रभावित पौधे की पूरी पत्ती मर जाती है।
लाल धब्बे रोग को नियंत्रित करने के लिए 1 लीटर पानी में 1 ग्राम बैविस्टिन घोल मिलाकर 25 दिनों के अंतराल पर दो बार प्रयोग किया जाना चाहिए।
प्रमुख रोग और उनका नियंत्रणः
लाल धब्बा रोगः यह एक ऐसी बीमारी है जिससे पौधों की पत्तियों पर लाल, नारंगी और पीले धब्बे पड़ जाते हैं।
लाल धब्बा रोग को नियंत्रित करने के लिए 1 लीटर पानी में 1 ग्राम बैविस्टिन घोल मिलाकर 25 दिनों के अंतराल पर दो बार प्रयोग किया जाता है।
पत्ती खाने वाली इल्लीः यह इल्लियाँ पौधों की ताज़ी और स्वस्थ हरी पत्तियों को खा जाती हैं।
सफेद मूसली के इस कीट से बचाव के लिए मेटासिड का 0.2 प्रतिशत का प्रयोग बड़ी संख्या में किया जाता है।
पौध के रोपण के लगभग 90 दिनों बाद इसके पौधों से फल आने शुरू हो जाते हैं। इसकी कटाई सितंबर या अक्टूबर में की जाती है। कटाई तब की जाती है जब पत्तियाँ पीली पड़ने लगती हैं और फिर सूख जाती हैं।
पत्तियाँ गिरने के बादः कंदों की कटाई तब की जाती है, जब उनका रंग हल्के से गहरे काले रंग में बदल जाता है। परिपक्व होने पर कंदों से अधिकतम मात्रा प्राप्त होती है। मुख्य रूप से कंदों की कटाई मार्च या अप्रैल में की जाती है।
कटाई करने के बाद
कटाई के बाद, कंदों को सुखाया जाता है। सफेद कंदों को अलग करके लगभग 4-7 दिनों तक हवा में सुखाया जाता है। फिर उन्हें छीलकर वायुरोधी थैलों में भरकर परिवहन के लिए तैयार किया जाता है ताकि वे जल्दी खराब न हों। सूखे हुए कंदों से प्रसंस्करण के बाद सफेद मूसली पाउडर और सफेद मूसली टॉनिक जैसे कई उत्पाद बनाए जाते हैं।
लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।