
क्लस्टर बीन यानी कि ग्वार की वैज्ञानिक खेती Publish Date : 14/07/2026
क्लस्टर बीन यानी कि ग्वार की वैज्ञानिक खेती
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
ग्वार की खेती करना भारतीय किसानों के लिए एक फायदेमंद विकल्प हो सकता है। ग्वार की फसल कम पानी और कम लागत में अच्छी पैदावार देती है।
भारत में ग्वार मुख्य रूप से राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में प्रमुखता से उगाया जाता है। राजस्थान अकेले देश के 70-85 प्रतिशत भाग ग्वार का उत्पादन करता है।
ग्वार की फलियां सब्जी के रूप में और इसके बीज ग्वार गम बनाने के लिए उपयोगी हैं, जो खाद्य, दवा और तेल उद्योग में काम आता है।
आज हम आपको ग्वार की खेती के बारे में बताएंगे, ताकि आप इसे सही समय और सही तरीके से कर अधिक लाभ प्राप्त कर सकें।
ग्वार की खेती का महत्व
ग्वार एक ऐसी फसल है जो कम पानी में भी अच्छी तरह उगती है। यह सूखे वाले इलाकों में उगाने के लिए सबसे अच्छा विकल्प है। ग्वार की जड़ें मिट्टी में नाइट्रोजन को बढ़ाती हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरक शक्ति बढ़ती है। यह फसल खरीफ और गर्मी दोनों मौसम में उगाई जा सकती है। ग्वार की फलियां सब्जी के रूप में बाजार में बिकती हैं और इसके बीज से ग्वार गम बनाया जाता है, जो विदेशों में भी भेजा जाता है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा ग्वार उत्पादक देश है और हर साल 1087-1723 हजार टन ग्वार पैदा करता है। इसकी खेती से किसानों को अच्छा मुनाफा हो सकता है, खासकर अगर सही तरीके और उन्नत किस्मों का उपयोग किया जाए।
ग्वार की खेती का सही समय
खरीफ मौसम में खेती
भारत में ग्वार की खेती मुख्य रूप से खरीफ मौसम में की जाती है। यह मौसम जून से सितंबर तक का समय होता है। ग्वार की बुवाई के लिए सबसे अच्छा समय पहली बारिश के 10-15 दिन बाद है। अगर आप जल्दी पकने वाली किस्में उगा रहे हैं, तो 10-15 जुलाई तक बुवाई करें।
देर से पकने वाली किस्मों के लिए 25-30 जुलाई तक का समय सही है। इस समय हल्की बारिश हो चुकी होती है और मिट्टी में नमी अच्छी होती है, जो ग्वार की बुवाई के लिए जरूरी है।
गर्मी के मौसम में खेती
ग्वार को गर्मी के मौसम में भी उगाया जा सकता है। यह मौसम फरवरी से मई तक होता है। जल्दी पकने वाली किस्मों के लिए 15-25 फरवरी और देर से पकने वाली किस्मों के लिए 1-10 मार्च का समय सही माना जाता है। गर्मी में ग्वार की खेती करने पर ज्यादा पैदावार मिलती है, लेकिन इसके लिए 2-3 बार सिंचाई की जरूरत पड़ती है।
ग्वार की खेती के लिए सही मिट्टी और मौसम
मिट्टी का चयन
ग्वार की खेती हर तरह की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन बलुई दोमट मिट्टी इसकी ख्ेाती लिए सबसे अच्छी मानी जाती है। इस मिट्टी में पानी अच्छे से निकल जाता है, जिससे जड़ें सड़ती नहीं हैं। ग्वार की खेती हल्की रेतीली या नमकीन मिट्टी में भी की जा सकती है, जहां मिट्टी का पीएच 7 से 8 के बीच हो। उत्तर-पश्चिमी भारत की रेतीली मिट्टी भी ग्वार के लिए सही रहती है।
मौसम
ग्वार को उगाने के लिए 30-36 सेंटीमीटर बारिश और 32-38 डिग्री सेल्सियस तापमान सही है। यह फसल सूखे को सहन कर सकती है, इसलिए कम बारिश वाले इलाकों में भी उगाई जा सकती है। लेकिन फूल आने और फलियां बनने के समय मिट्टी में नमी का होना जरूरी है, नहीं तो पैदावार कम हो सकती है।
ग्वार की खेत की तैयारी

खेत की जुताई
ग्वार की खेती शुरू करने से पहले खेत को अच्छे से तैयार करना जरूरी है। सबसे पहले मिट्टी पलटने वाले हल से खेत की जुताई करें। इसके बाद 2-2.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की सड़ी हुई खाद डालें और इसे अच्छे से मिट्टी में मिला दें। फिर कल्टीवेटर से दो बार जुताई करें और आखिर में पाटा चलाकर खेत को समतल कर लें। इससे खेत बुवाई के लिए तैयार हो जाएगा।
खाद और उर्वरक का उपयोग
खेत तैयार करने के गोबर की सड़ी हुई खाद। इससे ग्वार की पैदावार अच्छी होगी।
ग्वार की उन्नत किस्में
अच्छी पैदावार के लिए सही किस्म का चयन करना बहुत जरूरी है। भारतीय बाजार में ग्वार की कई उन्नत किस्में उपलब्ध हैं, जो ज्यादा पैदावार देती हैं। कुछ अच्छी किस्में इस प्रकार से हैः
जल्दी पकने वाली किस्में: पूसा मौसमी, पूसा नवबहार, आरजीसी-936, आरजीसी-986, आरजीसी-1002, एचडी-365, जी-563।
देर से पकने वाली किस्में: पूसा सदाबहार, दुर्गा पहाड़, शरद बहार, लंपिरा, सिग्मा, मंजरी, टेस्टी तारा।
इन किस्मों से 600-900 किलो प्रति हेक्टेयर (खरीफ) और 2500-3000 किलो प्रति हेक्टेयर (गर्मी) तक की पैदावार मिल सकती है। सही किस्म का चयन करने से न केवल पैदावार बढ़ती है, बल्कि फसल की गुणवत्ता भी अच्छी होती है।
बीज की मात्रा और बीजोपचार
बीज की मात्रा
ग्वार की बुवाई के लिए 15-20 किलो बीज प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है। खरीफ मौसम में जल्दी पकने वाली किस्मों के लिए 15-18 किलो और देर से पकने वाली किस्मों के लिए 25 किलो बीज प्रति हेक्टेयर लें। गर्मी के मौसम में 40-45 किलो बीज प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है।
बीज उपचार
बुवाई से पहले बीजों का उपचार करना जरूरी है, ताकि बीज कीटों और बीमारियों से बचे रहें। 2 ग्राम थिरम प्रति किलो बीज की दर से उपचार करें। इसके साथ 5 ग्राम प्रति किलो की दर से राइजोबियम, पीएसबी और सूडोमोनास मिलाएं। यह उपचार बीजों को अंकुरण में मदद करता है और फसल को स्वस्थ रखता है।
बुवाई का सही तरीका
ग्वार की बुवाई छिटकाव विधि से करने की बजाय लाइन में करें। इससे पैदावार ज्यादा मिलती है। लाइन से लाइन की दूरी 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 15 सेंटीमीटर रखें। खरीफ मौसम में लाइन की दूरी 40-50 सेंटीमीटर और गर्मी में 20 सेंटीमीटर रखें। बीज को 5-10 सेंटीमीटर गहराई पर बोएं।
बुवाई का समय
जैसा कि पहले बताया गया है, खरीफ में जुलाई और गर्मी में फरवरी-मार्च में बुवाई करें। सही समय पर बुवाई करने से फसल अच्छे से बढ़ती है और पैदावार ज्यादा होती है।
ग्वार की फसल में खरपतवार प्रबंधन
ग्वार की फसल के साथ कई तरह के खरपतवार उग आते हैं, जो फसल की बढ़वार को रोकते हैं। बुवाई के 20-25 दिन बाद पहली निराई-गुड़ाई करें। इससे खरपतवार निकल जाएंगे और पौधों की जड़ों में हवा का संचार अच्छा होगा। अगर खरपतवार ज्यादा हैं, तो पेंडिमेथालिन (0.75-1 किलो प्रति हेक्टेयर) का छिड़काव करें। समय-समय पर खेत की जांच करते रहें और खरपतवार हटाते रहें।
ग्वार की फसल में सिंचाई
खरीफ मौसम में
खरीफ मौसम में अगर बारिश सही समय पर होती है, तो अतिरिक्त सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन अगर बारिश कम हो, तो 1-2 सिंचाई करें। फूल आने और फलियां बनने के समय मिट्टी में नमी जरूरी है, इसलिए इस समय पानी की कमी न होने दें।
गर्मी के मौसम में
गर्मी में ग्वार की फसल को 2-3 सिंचाई की जरूरत होती है। पहली सिंचाई बुवाई के 15-20 दिन बाद करें। इसके बाद फूल आने और फलियां बनने के समय पानी दें। ज्यादा गर्मी में नमी बनाए रखने के लिए हल्की सिंचाई करें।
कीट और बीमारी से बचाव
ग्वार की फसल में कई बार कीट और बीमारियां लग सकती हैं। जड़ सड़न और अन्य बीमारियों से बचने के लिए बुवाई से पहले बीजोपचार करें। अगर फसल में कीट दिखें, तो कीटनाशक का उपयोग करें, लेकिन पहले किसी कृषि विशेषज्ञ से सलाह लें। फसल की नियमित जांच करें और किसी भी समस्या को तुरंत दूर करें।
फसल की बढ़वार की निगरानी
फसल की बढ़वार पर नजर रखें। अगर पौधे पीले पड़ रहे हैं या बढ़वार रुक रही है, तो मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी हो सकती है। ऐसे में उर्वरक का छिड़काव करें। पौधों को हवा और धूप अच्छे से मिलनी चाहिए, इसलिए खेत में ज्यादा भीड़ न होने दें।
कटाई का सही समय
ग्वार की फलियां 50-60 दिन में तैयार हो जाती हैं। जब फलियां हरी और मुलायम हों, तब उनकी कटाई करें। अगर बीज के लिए फसल उगा रहे हैं, तो 90-100 दिन बाद कटाई करें, जब फलियां सूख जाएं। कटाई सुबह के समय करें, ताकि फलियां ताजी रहें।
पैदावार

अगर सही तरीके से खेती की जाए, तो खरीफ मौसम में 600-900 किलो प्रति हेक्टेयर और गर्मी में 2500-3000 किलो प्रति हेक्टेयर तक की पैदावार मिल सकती है। अच्छी किस्में और सही देखभाल से पैदावार और भी बढ़ सकती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।