
चावल उत्पादन में एसआरआई (श्री) तकनीक Publish Date : 13/07/2026
चावल उत्पादन में एसआरआई (श्री) तकनीक
प्रो0 शालिनी गुप्ता एवं डॉ0 आर. एस. सेंगर
भारत में धान महत्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है। राष्ट्रीय स्तर पर धान की खेती करीब 4.5 करोड़ हेक्टेयर में की जाती है। कृषि वैज्ञानिकों की ओर से चावल उत्पादन में चावल गहनीकरण पद्धति यानी एसजारआई (श्री) अपनाई जा रही है। श्री खेती के अंतर्गत जलभराव होने पर धान जलमग्न नहीं होता है लेकिन वानस्पतिक अवस्था के दौरान मिट्टी को आर्द्र बनाए रखता है, बाद में सिर्फ एक इंच जल गहनता पर्याप्त होती है। जबकि एसआरआई तकनीक में सामान्य की तुलना में सिर्फ आधे जल की आवश्यकता होती है। श्री खेती की उपयोगिता को देखते हुए वर्तमान में विश्वभर में लगभग एक लाख से ज्यादा किसान इस कृषि पद्धति से लाभ उठा रहे हैं। एसआरआई में धान की खेती के लिए बहुत कम पानी तथा कम खर्च की आवश्यकता होती है और उपज भी अच्छी होती है।
छोटे और सीमान्त किसानों के लिए ये अधिक लाभकारी है। एसआरआई तकनीक (श्री) के इतिहास पर गौर करें तो वर्ष 1980 के दशक के दौरान मेडागास्कर में पहली बार इस तकनीक को विकसित किया गया। इसका क्षमता परीक्षण चीन, इंडोनेशिया, कम्बोडिया, थाइलैंड, बांगलादेश, श्रीलंका एवं भारत में किया गया। आंध प्रदेश में वर्ष 2003 में एसआरआई की खरीफ फसल के दौरान राज्य के 22 जिलों में परीक्षण किया गया। इस पद्धति से धान की खेती को लेकर औपचारिक प्रयोग वर्ष 2002-03 में प्रारंभ हुआ। अब तक इस पद्धति को आंध्रप्रदेश तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़ एवं गुजरात में प्रारंभ किया गया है। इस विधि की खासियत यह है कि इसमें मात्र दो किलोग्राम धान बीज एक एकड़ खेत के लिए पर्याप्त होता है। इतना ही नहीं इसकी रोपाई के लिए नर्सरी की उम्र सिर्फ 8 से 10 दिन रखी जाती है। इससे बीज की मात्रा कम लगती है तो दूसरी तरफ नर्सरी तैयार होने में लगने वाला समय बचता है।

इतना ही नहीं आमतौर पर परंपरागत तकनीक से होने वाली धान की खेती की अपेक्षा इस तकनीक में पैदावार भी अधिक होती है। एसआरआई तकनीक से धान की खेती में 2 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर बीज की और प्रति यूनिट 25-25 सेंटीमीटर क्षेत्रफल की दर से कुछ पौधों की आवश्यकता होती है। जबकि धान की पारंपरिक सघन कृषि में प्रति एकड़ 20 किलो की दर से बीज की आवश्यकता होती है। इस तकनीक से धान की पौध में 8 से 12 दिन बाद जब दो छोटी पत्तियां दिखने लगे तभी रोपाई कर देनी चाहिए। रोपाई में अभिधात को कम करें। धान के छोटे पौधे को नर्सरी से बीज, मिट्टी और जडसहित सावधानीपूर्वक उखाड़कर कम गहराई पर उसकी रोपाई करनी चाहिए।
धान का पौधा समूह के बजाय अकेले में अधिक बढ़ता है। इसलिए इसे वर्गाकार रूप में 25 गुना 25 रोमी की दूरी पर रोपा जाना चाहिए। इससे अधिक जड़ वृद्धि की संभावना होती है।
निराई और हया की व्यवस्था का ध्यान रखना चाहिए। इसके लिए धान की फसल के लिए निराई और हया अत्यंत आवश्यक होती है। घान के छूटने या पुष्पित होने तक कम से कम दो निराई अवश्य करानी चाहिए, लेकिन 4 बार की निराई को उत्तम माना जाता है। पहली निराई रोपाई के 10 दिन बाद होनी चाहिए। घास की सफाई से धान के पौधों के जड़ों का अधिक विकास होता है। और पौधे को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन एवं नाइट्रोजन भी प्राप्त हो पाता है। दो निराई के बाद प्रत्येक अतिरिक्त निराई से 2 टन प्रति हेक्टेयर की दर उत्पादन में वृद्धि संभव है। मिट्टी को आई बनाये रखने के लिए नियमित जल प्रयोग आवश्यक है। लेकिन कभी-कभी पानी को सूखने भी दिया जाना चाहिए ताकि पौधों की जड में आसानी से हवा की आवाजाही हो सके।
खेत में रासायनिक खाद के स्थान पर या उसके अलावा खाद का उपयोग 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से किया जाना चाहिए। बेहतर उर्वराशक्ति एवं संतुलित पोषक तत्व से अधिक उपज संभव है। झारखंड में धान की खेती वर्ष 2007 में लगभग 16 लाख हेक्टेयर में की गई थी तथा इसकी औसत उपज 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर थी। झारखंड में संकर धान की खेती चावल उत्पादन में वृद्धि के लिए अत्यन्त आवश्यक है। संकर धान की विभिन्न किस्मों की उत्पादन क्षमता लगभग 80 से 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है जबकि धान की अधिक उपज देने वाली सर्वोत्तम किस्मों की उत्पादन क्षमता 50 से 60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। संकर धान की 110 से 140 दिनों में तैयार होने वाली कई किस्में विकसित की गई हैं एवं देश के विभिन्न क्षेत्रों में लगाने के लिए अनुशंसा की गई है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।