
भारत में कपास की खेती Publish Date : 05/07/2026
भारत में कपास की खेती
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं अन्य
कपास की खेती भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण रेशा और नगदी फसल में से एक है। कपास लगभग पुरे विश्व में उगाई जाती है। कपास की खेती वस्त्र उद्धोग को बुनियादी कच्चा माल प्रदान करती है। भारत में कपास की खेती लगभग 6 मिलियन किसानों को प्रत्यक्ष तौर पर आजीविका प्रदान करती है और 40 से 50 लाख लोग इसके व्यापार या प्रसंस्करण में कार्यरत है। कई लोगो के लिए कपास कमाई का साधन भी है।
हमारे देश में कपास की खेती को सफेद सोना भी कहा जाता है। देश में व्यापक स्तर पर कपास उत्पादन की आवश्यकता है, क्योंकी कपास का महत्व इन कार्याे से देखा जा सकता है इसे कपड़े बनते है, इसका तेल निकाला जाता है और इसका विनोला बिना रेशा का पशु आहर में व्यापक तौर पर उपयोग में लाया जाता है।
कपास को तीन श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है-

देखा जाये तो लम्बे रेशा वाले कपास को सबसे अच्छा माना जाता है, जिसकी लम्बाई 5 सेंटीमीटर इसको उच्च कोटि की वस्तुओं में शामिल किया जाता है। मध्यम रेशा वाला कपास (Cotton) जिसकी लम्बाई 3.5 से 5 सेंटीमीटर होती है इसको मिश्रित कपास कहा जाता है। तीसरे प्रकार का कपास छोटे रेशा वाला होता है, जिसकी लम्बाई 3.5 सेंटीमीटर होती है।
बीज की मात्राः-
बीज की मात्रा बीजों की किस्म, उगाए जाने वाले इलाके, सिंचाई आदि पर निर्भर करती है। अमेरिकन हाइब्रिड कपास के लिए 1.5-2 किलो प्रति एकड़ जबकि अमेरिकन कपास के लिए बीज की मात्रा 3.5-4 किलो प्रति एकड़ होनी चाहिए। देसी कपास की हाइब्रिड किस्म के लिए बीज की मात्रा 1.25-2 किलो प्रति एकड़ और कपास की देसी किस्मों के लिए 3-4 किलो प्रति एकड़ होनी चाहिए।
बीज उपचारः-
- बीज जनित रोग से बचने के लिये बीज को 10 लीटर पानी में एक ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन या ढाई ग्राम एग्रीमाइसिन के घोल में 8 से 10 घंटे तक भिगोकर सुखा लेने के बाद ही कपास की बुवाई करनी चाहिए।
- जिन स्थानों पर जड़ गलन रोग का प्रकोप होता है, ट्राइकोडर्मा हारजेनियम या सूडोमोनास फ्लूरोसेन्स जीव नियंत्रक से 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें या रासायनिक फफूंदनाशी जैसे कार्बोक्सिन 70 डब्ल्यू पी, 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज या कार्बेन्डेजिम 50 डब्ल्यू पी से 2 ग्राम या थाईरम 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।
- कुदरती ढंग से रेशा हटाने के लिए बीजों को पूरी रात पानी में भिगोकर रखें, फिर अगले दिन गोबर और लकड़ी के बुरे या राख से बीजों को मसलने से रेश साफ हो जाता है और इसके बाद बुवाई से पहले बीजों को छाया में सुखाकर बुवाइ करनी चाहिए।
- रासायनिक ढंग बीज के रेशे पर निर्भर करता है। शुद्ध सल्फियूरिक एसिड (औद्योयोगिक ग्रेड) अमेरिकन कपास के लिए 400 ग्राम प्रति 4 किलो बीज और देसी कपास के लिए 300 ग्राम प्रति 3 किलो बीज को 2-3 मिनट के लिए मिक्स करें इससे बीजों का सारा रेशा उतर जाता है। फिर बीजों वाले बर्तन में 10 लीटर पानी डालें और अच्छी तरह से हिलाकर पानी निकाल दें। बीजों को तीन बार सादे पानी से धोयें और फिर चूने वाले पानी (सोडियम बाइकार्बानेट 50 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी) से एक मिनट के लिए धो लेना चाहिए। फिर एक बार दोबारा धोयें और छाया में सुखाकर बीज की बुवाई करें।
- रासायनिक ढंग के लिए धातु या लकड़ी के बर्तन का प्रयोग ना करें, बल्कि प्लास्टिक का बर्तन या मिट्टी के बने हुए घड़े का प्रयोग करें। इस क्रिया को करते समय दस्तानों का प्रयोग जरूर करें।
- रेशे रहित एक किलोग्राम नरमे के बीज को 5 ग्राम इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यू एस या 4 ग्राम थायोमिथोक्साम 70 डब्ल्यू एस से उपचारित कर पत्ती रस चूसक हानिकारक कीट और पत्ती मरोड़ वायरस को कम किया जा सकता है।
- असिंचित स्थिति में कपास की बुवाई के लिये प्रति किलोग्राम बीज को 10 ग्राम एजेक्टोबेक्टर कल्चर से उपचारित कर बोने से पैदावार में वृद्धि होती है।
बुवाई का समयः-
कपास की बुवाई का उपयुक्त समय अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न होता है। इस फसल की बुवाई अप्रैल और मई के महीने में अवश्य ही कर लेनी चाहिये।
बीज रोपाई का तरीका-
देसी कपास की बुवाई के लिए बुवाई वाली मशीन का प्रयोग करें और हाइब्रिड या बी टी किस्मों के लिए गड्ढे खोदकर बुवाई करें। आयताकार के मुकाबले वर्गाकार बुवाई लाभदायक होती है। कुछ बीजों के अंकुरन ना होने के कारण और नष्ट होने के कारण कईं जगहों पर फासला बढ़ जाता है। इस फासले को खत्म करना जरूरी है। बुवाई के दो सप्ताह बाद कमज़ोर, बीमार और प्रभावित पौधों को नष्ट कर दें।
फासलाः-
अमेरिकन कपास के लिए सिंचित स्थिति में 75x15 से.मी और बारानी स्थिति में 60x30 से.मी का फासला रखें। देसी कपास के लिए सिंचित और बारानी स्थिति में 60x30 का फासला रखें।
खाद एवं उर्वरकः-
कपास की बुवाई से पहले खेत तैयार करते समय 15-20 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हैक्टेयर की दर से भूमि में अच्छी तरह मिलानी चाहिए।
अमेरिकन और बीटी किस्मों में प्रति हैक्टेयर 75 किलोग्राम नत्रजन तथा 35 किलोग्राम फास्फोरस व देशी किस्मों को प्रति हैक्टेयर 50 किलोग्राम नत्रजन और 25 किलो फास्फोरस की आवश्यकता होती है।
पोटाश उर्वरक मिट्टी परीक्षण के आधार पर दें, फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा और नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई से पहले दें। नत्रजन की शेष आधी मात्रा फूलों की कलियां बनते समय दें।
हानिकारक कीट एवं रोग और उनकी रोकथामः-

हानिकारक कीट-
हरा मच्छर- इसकी रोकथाम के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल या मोनोक्रोटोफॉस 36 एस एल की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर करें।
तेला- इसके रोकथाम के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल या थायोमिथाक्जाम 25 डब्लू जी की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर करें।
थ्रिप्स- थ्रिप्स की रोकथाम के लिए मिथाइल डेमेटान 25 ई सी 160 मि.ली बुप्रोफेंज़िन 25 प्रतिशत एस सी 350 मि.ली फिप्रोनिल 5 प्रतिशत एस सी 200-300 मि.ली., इमीडाक्लोप्रिड 70 प्रतिशत डब्लयू जी 10-30 मि.ली, थाइमैथोक्सम 25 प्रतिशत डब्लयू जी 30 ग्राम में से किसी एक को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
सफेद मक्खी- इसकी रोकथाम के लिए एसेटामीप्रिड 4 ग्राम या एसीफेट 75 डब्लयू पी 800 ग्राम को प्रति 200 लीटर पानी या इमीडाक्लोप्रिड 40 मि.ली को 200 लीटर पानी में मिलाकर या थाइमैथोक्सम 40 ग्राम को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
मिली बग- इसकी रोकथाम के लिए क्विनलफॉस 25 ई सी 5 मि.ली या क्लोरपाइरीफॉस 20 ई सी 3 मि.ली को प्रति लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें।
चितकबरी सुंडी - अमेरिकन सुंडी - तंबाकू सुंडी - गुलाबी सुंडीः-
इसकी रोकथाम के लिए क्यूनालफॉस 25 ई सी, 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या इन्डोक्साकार्ब 14.5 एस सी, 1.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या स्पाईनोसेड 45 एस सी, 0.33 मिलीलीटर प्रति लीटर या फ्लूबेन्डियामाइड 480 एस सी, 0.40 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से किसी एक कीटनाशी का छिड़काव करें।
हानिकारक रोग -
झुलसा रोग - इसकी रोकथाम के लिए काँपर ऑक्सीक्लोराइड का छिडकाव पौधे पर करना चाहिए।
पौध अंगमारी रोग - इसकी रोकथाम के लिए एन्ट्राकाल या मेन्कोजेब 40 ग्राम/15 लीटर पानी में मिलाकर छिडकाव करे।
अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा रोग- इसकी रोकथाम के लिए टैबुकोनाज़ोल 1 मि.ली या ट्राइफलोकसीट्रोबिन + टैबुकोनाज़ोल 0.6 ग्राम प्रति लीटर की स्प्रे बुवाई के 60वें, 90वें, और 120वें दिन बाद करें। यदि बीमारी खेत में दिखे तो कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या कप्तान 500 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें या कार्बेनडाज़िम 12 प्रतिशत $ मैनकोज़ेब 63 प्रतिशत डब्लयू पी 25 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
जड़ गलन रोग - इसकी रोकथाम के लिए बीज को उपचारित करना आवश्यक होता है।
खरपतवार नियंत्रणः-
पहली निराई-गुड़ाई अंकुरण के 15 से 20 दिन के अंदर कर कोल्पा या डोरा चलाकर करना चाहिए। खरपतवारनाशकों में पायरेटोब्रेक सोडियम (750 ग्रा/हे) या फ्लूक्लोरिन /पेन्डामेथेलिन 1 किग्रा सक्रिय तत्व को बुवाई पूर्व उपयोग किया जा सकता है।
सिंचाईः-
कपास की फसल में 3-4 सिंचाई देनी आवश्यक होती है। पहली सिंचाई देर से करनी चाहिये। कपास की खेती को काफी कम पानी जरूरत होती हैं। अगर बारिश ज्यादा होती है तो इसे शुरूआती सिंचाई की जरूरत नही होती। लेकिन बारिश टाइम पर नही होने पर इसकी पहली सिंचाई, बुवाई के लगभग 45 से 50 दिन बाद चाहिए। गूलर व फूल आते समय खेत की सिंचाई अवश्य की जानी चाहिये।
कपास की तुड़ाईः-
कपास की पहली तुड़ाई जब कपास की टिंडे 40 से 60 प्रतिशत खिल जाएँ तब करनी चाहिए। उसके बाद दूसरी तुड़ाई सभी टिंडे खिलने के बाद करते हैं। कपास की चुनाई का कार्य 3-4 बार में पूरा होता है।
उत्पादनः-
उपरोक्त उन्नत विधि से खेती करने पर देशी कपास की 20 से 25, संकर कपास की 25 से 32 और बी टी कपास की 30 से 50 क्विण्टल प्रति हैक्टेयर पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।