मक्का की खेती वैज्ञानिक विधि से करें और लाभांश बढ़ाएं      Publish Date : 01/07/2026

मक्का की खेती वैज्ञानिक विधि से करें और लाभांश बढ़ाएं

                                                                                             प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी  

मक्का दुनिया की मोटे अनाज वाली एक विशेष फसल है। भारत में उगाए जाने वाले मोटे अनाजों में ज्वार के बाद मक्का का एक विशेष स्थान है। यदि मक्का की खेती वैज्ञानिक विधियों से किया जाए तो इसके उत्पादन में काफी बढ़ोत्तरी जा सकती है।

मक्का गरीबों को भोजन उपलब्ध कराने के साथ ही पशुओं के चारे के लिए भी विशेष रूप से उपयोगी है। भारत में 6.2 मिलियन हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल पर मक्का की खेती की जाती है और इस का कुल 8.7 मिलियन टन उत्पादन होता है।

मक्का के दानों से बना कार्नफ्लेक्स भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी शहरी लोगों का खास नाश्ता है। मक्का से स्टार्च, ग्लूकोज, अल्कोहल, एसीटिक व लैक्टिक अम्ल, रेयान, कागज, गोंद, कृत्रिम रबड़, जूते की पालिश, रंग और पैकिंग आदि अनेक पदार्थ बनाए जाते हैं। मक्के की वैज्ञानिक तरीके से खेती कर के इसके उत्पादन में काफी बढ़ोत्तरी की जा सकती है।

                                    

जमीन का चुनावः मक्का की खेती करने के लिए उपजाऊ, गहरी, अच्छे जलनिकास वाली जीवांश पदार्थ से भरपूर जमीन उत्तम रहती है। मक्का की खेती हल्की बलुई दोमट मिट्टी से ले कर मध्यम मटियार दोमट मिट्टी तक की भूमियों में आसानी से की जा सकती है।

जलवायुः मक्का की खेती तमाम देशों में विभिन्न प्रकार की जलवायु में की जाती है। वैसे मूलरूप से यह एक गरम जलवायु वाली फसल है। इस के साथ ही आजकल विभिन्न प्रकार की जलवायु में उगाने योग्य मक्का की अनेक किस्में भी विकसित की जा चुकी हैं और अब इसे शीत और उष्ण कटिबंध दोनों ही तरह की जलवायु वाले स्थानों पर समान रूप से उगाया जा रहा है।

मक्का की प्रजातियों का चुनाव रकबे और उसके पकने की अवधि के अनुसार करना उचित रहता है। उत्तराखंड के लिए मक्का की उन्नत प्रजातियां निम्न प्रकार से हैं:-

मैदानी क्षेत्रों के लिए संकर प्रजातियाँ

लंबी अवधि में पकने वालीः एचक्यूपीएम 1, एचक्यूपीएम 4, एचक्यूपीएम 5 और एचएम 11 आदि।

मध्यम अवधि में पकने वालीः एचएम 10 और एचएम 4।

जल्दी पकने वालीः डीएचएम 107, प्रकाश आदि।

अतिशीघ्र अवधि में पकने वालीः विवेक संकर मक्का 17, विवेक संकर मक्का 21, विवेक संकर मक्का 25, विवेक संकर मक्का 33, विवेक संकर मक्का 39 और विवेक क्यूपीएम 9 आदि।

मैदानी क्षेत्रों के लिए संकुल प्रजातियाँ:

मध्यम अवधिः प्रताप मक्का 4, बिन औरेंज स्वीट कार्न, बजोरा मक्का, तरुण और श्वेता आदि।

शीघ्र अवधि वालीः विवेक संकुल मक्का 11, नर्मदा, मोती, गौरव, कंचन, सूर्या और नवीन।

अतिशीघ्र अवधि वालीः बीएल बेबी कार्न 1, प्रताप और कचंन 2 आदि।

पहाड़ी क्षेत्रों के लिए प्रजातियाँ:

संकर प्रजातियाँ: विवेक संकर मक्का 23, विवेक क्यूपीएम 9 और प्रकाश आदि।

संकुल प्रजातियाँ: विवेक संकुल मक्का 11, विवेक संकुल मक्का 31, विवेक संकुल मक्का 35 और वीएल अंबर पापकौर्न आदि।

बीजों की मात्रा

मक्का की फसल की बुवाई के लिए हमेशा प्रमाणित बीजों का ही इस्तेमाल करना चाहिए। मक्का की संकुल किस्मों के लिए 14-16 किलोग्राम, संकर किस्मों के लिए 18-20 किलोग्राम और दाने की फसल के लिए 40-45 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करना चाहिए।

बुवाई का समयः खरीफ की फसल की बुवाई मध्य जून से जुलाई तक कर दी जानी चाहिए। रबी की फसल की बुवाई सितंबर के अंत से मध्य नवंबर तक किसी भी समय की जा सकती है। फसल की बुवाई 60 सेंटीमीटर दूर बनी कतारों में 20-30 सेंटीमीटर की दूरी पर की जाती है।

बीज उपचारः रोगों से बचाव के लिए बीज को थीरम या कार्बेंन्डाजिम से 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित करना चाहिए। प्ररोह बेधक कीट के प्रकोप से बचने के लिए बीज को 5 मिलीलीटर इमिडाक्लोप्रिड से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।

बुवाई की विधिः अधिकतर किसान मक्का की बुवाई बिखेर कर करते हैं। इस तरीके से कम उपज प्राप्त होती है। अतः मक्का की बुवाई लाइनों में ही करनी चाहिए और लाइन से लाइन की दूरी 60 से 75 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 20 से 25 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। इस तरह बुवाई करने से 1 हेक्टेयर क्षेत्र में 66000 से 83000 पौधों की संख्या प्राप्त हो जाती है। खेत की मेंड़ों पर बुवाई कर के सिंचाई की जरूरत को 20-30 फीसदी कम किया जा सकता है। इस विधि में भी मेड़ की दूरी 20-25 सेंटीमीटर रखनी चाहिए।

उर्वरकों की मात्रा व उपयोग का तरीकाः उर्वरकों का प्रयोग मिट्टी की जांच के आधार पर करना चाहिए। आमतौर पर मक्का के लिए 10 टन गोबर की खाद, 120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस, 40 किलोग्राम पोटाश व 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए।

सड़ी हुई गोबर की खाद को बुवाई से 10 से 15 दिनों पहले खेत में डाल कर मिट्टी में मिला देना चाहिए। फास्फोरस, पोटाश व जिंक सल्फेट की पूरी मात्रा बुवाई के समय कूंड़ों में इस्तेमाल करनी चाहिए। नाइट्रोजन का उपयोग 5 भागों में निम्न अनुसार करने से अधिक उपज प्राप्त की जा सकती हैं:

  • 10 प्रतिशत यूरिया का प्रयोग बुवाई के समय।
  • 20 प्रतिशत नाइट्रोजन का प्रयोग पौधे में 4 पत्तियों के आ जाने पर करना चाहिए।
  • 30 प्रतिशत नाइट्रोजन का प्रयोग पौधे में 8 पत्तियां आ जाने के बाद करना चाहिए।
  • 30 प्रतिशत नाइट्रोजन का प्रयोग नरमंजरी निकलते समय करना उत्तम रहता है।
  • 10 प्रतिशत नाइट्रोजन का प्रयोग दानों के भरने की अवस्था में करना चाहिए।

निराई-गुड़ाई व खरपतवार नियंत्रणः खरपतवारों को बढ़ने से पहले (बोने के 5-6 हफ्ते तक) नष्ट कर के खेत को खरपतवार रहित रखना जरूरी होता है। प्रयोगों के आधार पर पाया गया है कि फसल की बुवाई के 45 दिनों तक खेत को खरपतवारों से रहित रखने से पूरे जीवनकाल तक खरपतवारों को नष्ट करने के समान ही उपज प्राप्त होती है।

यांत्रिक विधिः शाकनाशी पदार्थों के न होने पर मक्के की फसल में 2-3 बार निराई-गुड़ाई करना जरूरी होता है। इस में पहली निराई बोने के 15 दिन बाद, दूसरी 25-30 दिन बाद और तीसरी 40-45 दिन बाद की जानी चाहिए। दूसरी निराई के समय कमजोर पौधों की छंटनी भी की जाती है। फसल के घुटनों तक बढ़ जाने पर निराई-गुड़ाई नहीं करनी चाहिए। निराई खुरपी, हैंडहो व बैलों या ट्रैक्टर चालित हो या कल्टीवेटर से की जाती है, पर ध्यान रखना चाहिए कि गुड़ाई 4-5 सैंटीमीटर से अधिक गहरी न की जाए।

रासायनिक विधिः मक्का की फसल में रसायनों के प्रयोग से खरपतवार नियंत्रण के लिए टैफाजीन 2.5 किलोग्राम, सिमैजीन 2.5 किलोग्राम, मेटाबुट्रीन 1.2 किलोग्राम, एट्राजीन 1.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 1000 लिटर पानी के साथ घोल कर बुवाई के एकदम बाद छिड़काव करना चाहिए। छिड़काव के समय जमीन में नमी रहने पर इन रसायनों की क्रिया बढ़ जाती है। वैसे ये रसायन पानी में कम घुलनशील होते हैं और इन के पानी के साथ बह कर बेकार होने की उम्मीद कम होती है, परन्तु इनका प्रयोग करने के बाद खेत में निराई-गुड़ाई नहीं करनी चाहिए।

सिंचाईः मक्का की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए दूसरी फसलों की अपेक्षा अधिक पानी की आवश्यकता होती है। मक्के में बढ़वार के 25 से 30 दिनों व मादा फूल आते समय भुट्टे बनने की दशा में किसी भी हाल में पानी की कमी नहीं होनी चाहिए।

खरीफ मौसम में बारिश की स्थिति में आवश्यकतानुसार 2-3 सिंचाई करना जरूरी है। यदि 6 बार सिंचाई की सुविधा हो तो 4-5 पत्ती अवस्था, पौध घुटनों तक आने से पहले व तुरंत बाद, नरमंजरी निकलते समय, दाना भरते समय और दाना सख्त होते समय सिंचाई करना लाभकारी रहता है। मक्का के खेत में जलभराव की स्थिति में फसल को भारी नुकसान होता है, लिहाजा, खेत में जलनिकासी की उचित व्यवस्था करना भी जरूरी है।

                                     

कटाईः मक्का की विभिन्न प्रजातियों की फसल बुवाई के 80-115 दिन बाद पक कर तैयार हो जाती है। साधारणतया मक्का की फसल निषेचन के 40-50 दिन बाद पक जाती है। लिहाजा, इस के बाद फसल के सूखने का इंतजार न कर के कटाई कर लेनी चाहिए। भुट्टे के लिए फसल की कटाई बुवाई के 75-90 दिनों बाद की जाती है। इस अवस्था में पौधे में 30-35 फीसदी के आसपास नमी होनी चाहिए।

उपजः मक्का की फसल की औसतन उपज 80 से 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। खरीफ की मक्का के मुकाबले रबी मक्के से अधिक उपज मिलती है, क्योंकि खरीफ के मुकाबले रबी में खेत की तैयारी अच्छी हो जाती है।

भंडारणः गहाई के बाद दानों को धूप में अच्छी तरह इतना सुखाना चाहिए कि नमी 12 प्रतिशत से अधिक न हो, तब इसे भंडारित करना चाहिए। सुरक्षित भंडारण के लिए 1 ईडीबी एंपुल प्रति क्विंटल के हिसाब से रखना चाहिए। एंपुल को चिमटी की सहायता से टंकी की आधी गहराई तक ले जा कर फोड़ देना चाहिए और ढक्कन बंद कर देना चाहिए।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।