
सांवा उत्पादन की उन्नत तकनीक Publish Date : 30/06/2026
सांवा उत्पादन की उन्नत तकनीक
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
सांवा की खेती दानों के साथ-साथ अच्छे गुणों से युक्त चारे के लिये मैदानी के साथ पर्वतीय स्थानों पर भी की जाती है। हमारे देश भारत में सांवा की खेती उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़ व मध्यप्रदेश के कुछ क्षेत्रों में की जाती है।
भूमि की तैयारीः-
सांवा की खेती मैदानी एवं पर्वतीय स्थानों पर छोटे-छोटे खेतों में की जाती है। हल्की एवं कम उर्वरता वाली भूमि में खेती हेतु एक से दो गहरी जुताई वर्षा पूर्व करना आवश्यक है।
बीज, बीजदर एवं बोने का उचित समयः-
अधिक उत्पादन हेतु उन्नत किस्मों का चुनाव करें। हल्की व पथरीली भूमि हेतु जल्द पकने वाली तथा मध्यम उर्वरता वाली भूमि हेतु मध्यम समय में पकने वाली किस्मों का चयन करें। कतार में बोआई हेतु बीज दर 8 से 10 किलो प्रति हेक्टेयर तथा छिड़काव पद्धति से बोआई के लिये 12 से 15 किलो बीज प्रति हेक्टेयर हेतु आवश्यक है। तमिलनाडु में असिंचित फसल की बोआई सितम्बर-अक्टूबर माह में तथा सिंचित फसल की बोआई फरवरी-मार्च में की जाती है जबकि उत्तराखंड के पर्वतीय स्थानों पर अप्रैल-मई माह बोआई हेतु उत्तम है। मध्यप्रदेश के लिये मानसून प्रारम्भ होने के साथ व 10-12 जुलाई के पूर्व बुवाई करने पर सर्वाधिक उपज प्राप्त होती है। बोआई पूर्व फफूंदनाशक दवा कार्बेन्डाजिम या कार्बेक्सिन का 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार आवश्यक है।
सांवा की उन्नतशील किस्में
व्ही.एल. 29:- सांवा की यह किस्म 80 से 90 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इसकी उत्पादन क्षमता 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। पौधे में लम्बी व सघन दाने वाली बालियां लगती है। यह किस्म कण्डवा रोग के प्रति प्रतिरोधी भी होती है।
व्ही.एल. 172:- सांवा की यह किस्म 90 से 95 दिन में पककर तैयार हो जाती है तथा इसकी उत्पादन क्षमता 21 से 23 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इस किस्म की बालियां खुली, सीधी तथा हरे रंग की होती है। कण्डवा रोग के लिये यह प्रतिरोधी किस्म है।
व्ही.एल. 181:- सांवा की इस नव विकसित किस्म के पकने की अवधि 80-90 दिन तथा औसत उपज क्षमता 16 से 17 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इस किस्म की बालियों के सिरे हल्के रंगीन तथा चार एकान्तर दानों की कतारें होती है। इसके अलावा यह किस्म कण्डवा रोग के प्रति प्रतिरोधी भी होती है।
व्ही.एल. 207:- सांवा की इस नई किस्म की बालियां हरे रंग की व दाने भूरे रंग के होते है। सांवा की इस किस्म के पकने की अवधि 85 से 90 दिन और इसकी औसत उपज क्षमता 16.4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। यह किस्म भी कण्डवा रोग के प्रति सहनशील रहती है।
खाद एवं उर्वरक का प्रयोगः-
फसल की बुवाई से पूर्व गोवर की खाद का प्रयोग 5 टन प्रति हेक्टेयर के दर से करना चाहिए। इसके अतिरिक्त रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग 20 किलो नत्रजन व 20 किलो फास्फोरस प्रति हेक्टेयर के दर से करना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा व फास्फोरस की पूरी मात्रा बोआई से पूर्व तथा शेष नत्रजन की आधी मात्रा बोआई के 3-4 सप्ताह बाद प्रथम निंदाई के उपरान्त खेत में डालें। जैव उर्वरक एग्रोवेक्टीरियम, रेडियोबेक्टर तथा एस्परजिलस अवामूरी से बीजोपचार 10 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से करें।
अन्तः सस्य क्रियाएं:-
बुवाई के 20 से 30 दिन के अंदर एक बार हाथ से निंदाई अवश्य करें। अधिक घने पौधों को उखाड़ कर जहां पौधे न उगे हो वहा इन पौधों की रोपाई कर देनी चाहिए।
पौध संरक्षण

1. रोग-व्याधियाँ:-
सांवा की फसल में मुख्यरूप से कण्डवा व पर्णछाद झुलसन रोग आदि का प्रकोप होता है, जिनका समय पर निदान करना अत्यंत आवश्यक है।
कण्डवाः- सांवा का यह सबसे प्रमुख फफूंदजनित रोग है। रोग के लक्षण बालियाँ निकलने के बाद ही परिलक्षित होने लगते है। कंडवा के संक्रमण से ग्रसित दाने स्वस्थ दानों की अपेक्षा 3-4 गुना बड़े हो जाते है, जिनमें काले-रंग के बीजाणु भरे होते है। बाली के अलावा तना व पत्तियों के कक्ष में भी हरे रंग की गोल या अनियमित आकार की संरचनाएं बन जाती है, जिनमें काले बीजाणु भरे होते है।
रोग की रोकथाम
- जून के अंतिम सप्ताह से लेकर जुलाई के द्वितीय सप्ताह तक बोआई करें। बोआई से पूर्व कॉर्बेन्डाजिम या कॉर्बेक्सिन फफूंदनशक दवा से (2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से) बीजो को अवश्य उपचारित करें।
- बीजोपचार जैव रसायन ट्रइकोडर्मा द्वारा 5 ग्राम प्रति किलो बीज दर से करना भी लाभप्रद होता है।
- रोग प्रतिरोधक किस्मों जैसे व्ही.एल. 29, व्ही.एल. 172, व्ही.एल. 181 व व्ही.एल. 107 का उपयोग करें।
(ब) पर्णछाद झुलसनः- इस फफूंदजनित रोग का प्रकोप पौधे की सभी अवस्थाओं में होता है। संक्रमित पौधे की पर्णछाद पर अनियमित धब्बे बन जाते है जिनकी परिधि गहरे व मध्य का भाग धूसर रंग का हो जाता है। अनुकूल परिस्थितियों व परिपक्वता पर धब्बों के ऊपर गोल-चपटे स्क्लेरोशिया भी बन जाते है, जिनका रंग प्रारम्भ में सफेद व परिपक्वता पर भूरा हो जाता है।
रोग की रोकथाम
1. बीजों को बोने से पूर्व फफूंदनाशक दवा कॉर्बेन्डाजिम या वेलिडामाइसिन या हेक्साकोनेजाल (2 मि.ली. प्रति लिटर पानी की दर) से उपचारित करें।
2. जैव रसायन ट्राइकोडर्मा से बीजोपचार (5 ग्राम प्रति किलो बीज) + भूमि उपचार (1 किलो प्रति एकड) लाभप्रद होता है।
3. संतुलित उर्वरक एवं रोग प्रतिरोधी किस्मों का प्रयोग करें।
सांवा में लगने वाले कीट
(अ) तना मक्खीः-
तना मक्खी सांवा का प्रमुख कीट है, जिससे उपज में सार्थक हानि होती है। कीट की इल्ली मध्यकलिका में नीचे पहंचकर उसे काट देती है, जिससे मध्यकलिका सूख जाती है एवं उपज प्रभावित होती है।
कीट की रोकथाम
1. तना मक्खी के नियंत्रण के लिये फसल की जल्दी बोआई करीब 10 जुलाई तक अवश्य कर देनी चाहिए।
2. बीजो को बोने से पूर्व क्लोरपायरीफास 20 ई.सी. दवा 25 मि.ली. प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करना आवश्यक है।
3. बीज बुवाई से पूर्व थीमेट 10 जी. दवा का 10-15 कि. ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि उपचार भी प्रभावी होता है।
4. इसके अलावा कीट प्रतिरोधी किस्मों का प्रयोग करें।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।