ज्वार की खेती करने की उन्नत विधि      Publish Date : 28/06/2026

       ज्वार की खेती करने की उन्नत विधि

                                                                                            प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

ज्वार (Sorghum) भारत की प्रमुख फसलों में से एक है। यह एक बहुपयोगी अनाज है, जिसका उपयोग आटा, चारा, और जैव-ऊर्जा उत्पादन में आदि के लिए किया जाता है। ज्वार की फसल आमतौर पर ऐसे क्षेत्रों में उगाई जाती है जहां पानी की कमी होती है और मिट्टी भी कम उपजाऊ होती है। आज के अपने प्रस्तुत लेख में हम ज्वार की खेती से जुड़ी सभी महत्वपूर्ण जानकारियों को साझा करेंगे, जिससे हमारे किसान भाई अपनी खेती की पैदावार को बढ़ाकर अपनी आय को बढ़ा सकें।

ज्वार की खेती के लिए उचित मौसम और जलवायु

                                    

हमारे देश में ज्वार मुख्य रूप से तीन मौसमों में उगाई जाती हैः

1. खरीफ ज्वार (जून-जुलाई बुवाई, अक्टूबर-नवंबर कटाई)- इस मौसम में ज्वार सबसे अधिक उगाई जाने वाली फसल है।

2. रबी ज्वार (अक्टूबर-नवंबर बुवाई, फरवरी-मार्च कटाई)- ठंडे मौसम में उगाई जाने वाली ज्वार की खेती को रबी ज्वार की खेती के नाम से जाना जाता है।

3. जायद ज्वार (फरवरी-मार्च बुवाई, मई-जून कटाई)- गर्मी के मौसम में उगाई जाती है, लेकिन इस मौसम में बोयी जाने वाली ज्वार को सिंचाई की आवश्यकता अधिक होती है।

ज्वार के लिए आवश्यक जलवायुः

  • ज्वार की खेती के लिए 25-35°C तापमान उपयुक्त माना जाता है।
  • ज्वार की फसल 40°C तक के तापमान को सहन कर सकती है, इसलिए सूखाग्रस्त क्षेत्रों में भी इसकी खेती संभव और सफल होती है।
  • ज्वार के लिए 40-100 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा उपयुक्त होती है।

मिट्टी का चुनाव और खेत की तैयारीः

1. मिट्टी का प्रकारः

  • ज्वार, बलुई, दोमट, काली कपासीय और अच्छे जल निकास वाली भूमि में अच्छी उपज देती है।
  • ज्वार की खेती के लिए 6.0 से 7.5 pH मान वाली भूमि सबसे अच्छी मानी जाती है।

2. खेत की तैयारीः

  • खेत की अच्छी तैयारी करने के लिए खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए।
  • इसके बाद 2-3 जुताई देशी हल या रोटावेटर से जुताई करनी चाहिए।
  • इसके बाद पाटा लगाकर मिट्टी को समतल और भुरभुरी बना लें।
  • ज्वार की खेती के लिए जल निकासी की उचित व्यवस्था बनाकर रखें।

ज्वार की उन्नत किस्में:

                                   

अच्छी पैदावार के लिए उन्नत और प्रमाणित बीजों का चुनाव करना आवश्यक है। कुछ प्रमुख उन्नत किस्में इस प्रकार से हैं:

खरीफ ज्वार के लिएः CSH 16, CSH 14, CSV 17 और CSV 20 आदि।

रबी ज्वार के लिएः M 35-1, CSV 22 और Phule Vasudha (फुले वसुधा) आदि।

जायद की ज्वार के लिएः CSH 13 और CSH 18 आदि।

बीज की मात्रा और बोने की विधिः

1. बीज की मात्राः

खरीफ की ज्वार के लिएः 8-10 किलो बीज प्रति हेक्टेयर की दर से।

रबी की ज्वार के लिएः 12-15 किलो बीज प्रति हेक्टेयर की दर से।

जायद की ज्वार के लिएः 15-20 किलो बीज प्रति हेक्टेयर की दर से।

2. बीज उपचारः

  • बुवाई से पहले बीज को 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम या 5 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति किलो बीज से उपचारित करें।
  • जैविक खेती करने वाले किसान जैविक ट्राइकोडर्मा या नीम अर्क का उपयोग कर सकते हैं।

3. बुवाई का तरीकाः

  • ज्वार की बुवाई कतारों में करने से अच्छी उपज प्राप्त होती है।
  • कतार से कतार की दूरीः 45-60 सेंटीमीटर तक रखनी चाहिए।
  • पौधे से पौधे की दूरीः 12-15 सेंटीमीटर तक रखनी चाहिए।
  • बीज की गहराईः 3-5 सेंटीमीटर तक रखनी चाहिए।

ज्वार की खेती में सिंचाई प्रबंधनः

  • खरीफ ज्वार वर्षा आधारित होती है, लेकिन सूखे की स्थिति में 1-2 सिंचाई आवश्यक होती हैं।
  • रबी और जायद ज्वार में 4-5 सिंचाई आवश्यक होती हैं।
  • फसल की बढ़वार के महत्वपूर्ण चरणों (बुवाई के 25-30 दिन बाद और फूल आने के समय) पर सिंचाई करना आवश्यक है।

ज्वार की खेती में उर्वरक प्रबंधनः

ज्वार की अच्छी उपज के लिए नव्यकोष आर्गेनिक खाद या गोबर की खाद का उपयोग करे।

खरपतवार नियंत्रणः

  • ज्वार की फसल में पहले 30-40 दिनों तक खरपतवार नियंत्रण करना आवश्यक होता है।

  • निंदाई-गुड़ाई करें या प्री-इमर्जेंस खरपतवारनाशक जैसे एट्राजिन (Atrajine) 1.5 किग्रा का प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

रोग और कीट नियंत्रणः

1. प्रमुख रोगः

तना गलन रोगः कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

ज्वार का अंगमारी रोगः जैविक नियंत्रण के लिए ट्राइकोडर्मा या नीम तेल का छिड़काव करें।

2. प्रमुख कीटः

तना छेदक कीटः क्लोरोपाइरीफॉस 2 मिली लीटर प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

फसल के रेशेदार कीटः नीम तेल 5 मिली लीटर प्रति लीटर पानी में छिड़कें।

फसल की कटाई और उपजः

  • फसल पकने में 100-120 दिन का समय लेती है।

  • ज्वार की बालियां हल्के पीले रंग की होने पर फसल तैयार मानी जाती है।

  • कटाई के बाद अच्छी तरह धूप में सुखाकर भंडारण करें।

उपजः

खरीफ ज्वारः 25-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर।

रबी ज्वारः 35-40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर।

ज्वार की खेती कम पानी में भी अच्छी पैदावार देती है, इसलिए यह भारत के किसानों के लिए एक लाभकारी फसल है। सही मौसम, उन्नत किस्में, उचित खाद एवं कीटनाशक प्रबंधन अपनाकर किसान अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। ऊपर दी गई जानकारी का उपयोग कर आप अपनी ज्वार की खेती को लाभदायक बना सकते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।