रागी (मडुआ) की खेती की वैज्ञानिक तकनीक      Publish Date : 27/06/2026

 रागी (मडुआ) की खेती की वैज्ञानिक तकनीक

                                                                                               प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

रागी की खेती किसानों की आय बढ़ाने का एक बहुत अच्छा विकल्प हो सकता है। रागी की खेती आमतौर पर मोटे अनाज के रूप में की जाती है। दरअसल, रागी की फसल से किसान साल भर पैदावार प्राप्त कर अपनी आय को बढ़ा सकते हैं।

रागी की खेती मोटे अनाज के रूप में की जाती है। रागी मुख्य रूप से अफ्रीका और एशिया महाद्वीप में उगाई जाती है, जिसको मडुआ, अफ्रीकन रागी, फिंगर बाजरा और लाल बाजरा आदि के नामों से भी जाना जाता है। इसके पौधे पूरे साल पैदावार देने में सक्षम होते हैं और रागी की खेती पूरे साल किसी भी मौसम में की जा सकती है। रागी के दानों में खनिज पदार्थों की मात्रा बाकी अनाज वाली फसलों के मुकाबले अधिक पाई जाती है।

रागी में कैल्शियम की मात्रा सर्वाधिक पायी जाती है, जिसका भोजन के रूप में उपयोग करने पर हड्डियां मजबूत होती है। इस प्रकार रागी, बच्चों एवं बड़ों के लिए उत्तम आहार हो सकता है।

रागी में प्रोटीन, वसा, रेशा, व कार्बोहाइड्रेट प्रचुर मात्रा में पाये जाते है। महत्वपूर्ण विटामिन जैसे थायमीन, रिबोफ्लेविन, नियासिन एवं आवश्यक अमीनों अम्ल की प्रचुर मात्रा पायी जाती है जो कि शारीर की विभिन्न क्रियाओं के लिये आवश्यक होते है। कैल्शियम एवं अन्य खनिज तत्वों की प्रचुर मात्रा होने के कारण ओस्टियोपोरोसिस से संबंधित बीमारी तथा बच्चों के आहार (बेबी फूड) के रूप में विशेष लाभकारी होता है।

वैज्ञानिक तकनीक से खेती करने के कुछ प्रमुख बिन्दु:

                                       

बीज, बीज दर एवं बुवाई करने का उचित समयः-

बीज का चुनाव मृदा की किस्म के आधार पर करना चाहिए और जहां तक संभव हो सके रागी की बुवाई करने हेतु प्रमाणित बीज का ही प्रयोग करना चाहिए। यदि किसान स्वयं के बीज को ही उपयोग में लाते हैं तो बुवाई करने से पूर्व बीज साफ कर किसी फफूंदनाशक दवा जैसे कार्बेन्डाजिम/ कार्बोक्सिन/क्लोरोथेलोनिल से उपचारित कर बुवाई करें। रागी की सीधी बुवाई अथवा रोपाई पद्धति से की जाती है।

रागी की सीधी बुवाई जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई माह के मध्य तक मानसून वर्षा के शुरू होने पर की जाती है। छिटकवां विधि या कतारों में रागी की बुवाई की जाती है। कतार में बुवाई करने हेतु बीज दर 8 से 10 किलो प्रति हेक्टेयर और छिटकवां विधि से बुवाई करने पर बीज दर 12-15 किलो प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहती है। कतार पद्धति से बुवाई करने में दो कतारों के बीच की दूरी 22.5 से.मी. एवं पौधे से पौधे की दूरी 10 से.मा. रखनी चाहिए। रोपाई के लिये नर्सरी में बीज जून के मध्य से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक बो देना चाहिए।

इस प्रकार एक हेक्टेयर खेत में रोपाई के लिये बीज की मात्रा 4 से 5 किलोग्राम तक पर्याप्त रहती है एवं 25 से 30 दिन की पौध होने के बाद पौध की रोपाई मुख्य खेत में कर देनी चाहिए। रोपाई के समय कतार से कतार व पौधे से पौधे की दूरी क्रमशः 22.5 से.मी. एवं 10 से.मी. बनाकर रखनी चाहिए।

बीज चयनः रागी की बुवाई करने के लिए ऐसे बीज का चयन करना उचित रहता है जो उचित वातावरण और मिट्टी में अच्छी प्रकार के अनुकूल रहें। अच्छी गुणवत्ता से युक्त बीजों का चयन करना उचित रहता है।

बीज की प्रकृतिः अपने क्षेत्र में स्थानीय प्रकृति के अनुसार ही बीजों का चयन करना चाहिए। इससे बीज मौसम और मिट्टी की अनुकूल होते हैं और अधिक खेती में सफलता के अवसर प्राप्त होते हैं।

परीक्षित बीजः परीक्षित और प्रमाणित बीजों का चयन करना उचित रहता है। यह सुनिश्चित करता है कि आप उचित और अच्छी गुणवत्ता वाले बीज का प्रयोग कर रहे हैं।

बीज की गुणवत्ताः रागी की बुवाई करने हेतु उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का चयन करना चाहिए, इसके लिए एक प्रमाणित बीज विक्रेता से खरीदें या किसानों या अन्य खेती संबंधित संगठनों से सलाह प्राप्त करने के बाद बीज क्रय करना उत्तम है।

संरक्षण के लिए बीजः बुवाई करने के लिए ऐसे बीज का चयन करें जो पर्यावरणीय बदलावों और आधुनिक खेती तकनीकों के साथ संगत हों। इससे फसल की सुरक्षा और सफलता सुनिश्चित होती है।

बीज का प्राकृतिक संरक्षणः रागी में संभावित रोग और कीटों से बचाव करने के लिए प्राकृतिक उपायों का उपयोग अधिक से अधिक करना चाहिए, जैसे कि नीमाटोड का प्रबंधन, प्राकृतिक रोग प्रतिरोधी प्रजातियों का चयन करना आदि।

बुवाई करने का उचित समय: बीज की बुवाई उचित समय पर ही करनी चाहिए ताकि उत्तम उत्पादन हो सके। रागी की बुवाई मुख्य रूप से गर्मियों में की जाती है। रागी की बुवाई करने का सबसे उत्तम समय मार्च से जून तक के दिनों को माना जाता है। यह समय रागी के पौधों के विकास के लिए उत्तम होता है। बीज को बोने से पहले मौसम की भविष्यवाणी का पालन करें और यह सुनिश्चित करें कि वर्षा के समय कोई बड़ी बारिश तो नहीं होगी। बारिश के बाद बुवाई करने से बीज बहुतायत में पानी को सोख सकते हैं और पौधे बढ़ने में परेशानी हो सकती है।

समयानुसार सिंचाई की व्यवस्थाः नियमित सिंचाई करें, विशेष रूप से पौधों के विकास के समय में, ताकि उत्तम फलन हो सके। रागी के बीजों को बोने से पहले खेत की अच्छी तरह से तैयारी कर लेनी चाहिए। उपयुक्त खाद और मिट्टी के मिश्रण का उपयोग करें ताकि पौधों को अच्छी ग्रोथ मिल सके। बीज को बोने के बाद, नियमित रूप से सिंचाई रहें, जिससे कि बीज का अंकुरण अच्छा हो। जल संचयन तंत्र का उपयोग करके पानी की बचत करनी चाहिए।

उर्वरक और कीटनाशक का उपयोगः उर्वरक और कीटनाशकों का सही समय पर उपयोग करना भी अपने आप में काफी महत्वपूर्ण है जो कि उत्पादन को बढ़ाने और कीटों और रोगों से बचाव करने में पर्याप्त मदद करते हैं।

उचित प्रबंधनः समय पर खेत की सफाई, पोषण और विकसित रोगों का प्रबंधन करना अति आवश्यक है।

नवाचारिक तकनीकों का उपयोगः नयी तकनीकों का अधिकतम उपयोग करना चाहिए जैसे कि ड्रिप सिंचाई और ग्रीनहाउस, आदि जो आपके उत्पादन को बढ़ा सकते हैं।

खरपतवार नियंत्रणः

रागी की खेती में खरपतवार नियंत्रण रासायनिक और प्राकृतिक दोनों तरीकों से किया जा सकता हैं। रासायनिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए बीज रोपाई के पहले आइसोप्रोट्यूरॉन या ऑक्सीफ्लोरफेन की उचित मात्रा का छिडक़ाव खेत में कर देना चाहिए जबकि प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण पौधों की निराई गुड़ाई के माध्यम से किया जाता है। इसके लिए शुरुआत में पौधों की रोपाई के लगभग 20 से 22 दिन बाद उनकी पहली गुड़ाई करनी चाहिए। रागी की खेती में प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए दो बार गुड़ाई करना ही पर्याप्त रहता है। इसलिए पहली गुड़ाई के लगभग 15 दिन बाद पौधों की एक बार और गुड़ाई कर देनी चाहिए।

फसल की कटाई और मढ़ाईः

                                 

रागी के पौधे बीज रोपाई के लगभग 110 से 120 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं। जिसके बाद इसके सिरों को पौधों से काटकर अलग कर लेना चाहिए। सिरों की कटाई करने के बाद उन्हें खेत में ही एकत्रित कर कुछ दिन तक सूखाने के बाद जब दाना अच्छी से सूख जाए तब मशीन की सहायता से दानों को अलग कर एकत्रित कर बोरो में भरकर नमी रहित स्थान पर भण्ड़ारित कर लेना चाहिए।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।