
ग्वार की खेती की विधि Publish Date : 25/06/2026
ग्वार की खेती की विधि
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
ग्वार जिसे क्लस्टर बीन या गंवार फली भी कहा जाता है, यह एक बहुउपयोगी फसल है। हमारे घरों में ग्वार का सेवन सब्जी के रूप में भी किया जाता है और औद्योगिक उपयोग के लिए भी इसकी अच्छी मांग है। सब्जी के लिए ग्वार की खेती विशेष रूप से राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और गुजरात आदि राज्यों में की जाती है।
ग्वार की खेती के लिए भूमिः अच्छे जल निकास वाली मध्यम से हल्की दोमट भूमि को ग्वार की खेती के लिए उपयोगी माना जाता है।

खेत की तैयारीः खेत की तैयारी करने के लिए पहले खेत की एक या दो जुताई अच्छी तरह से करनी चाहिए और जुताई के बाद सुहागा लगाकर खेत को अच्छी तरह से तैयार कर लेना चाहिए।
बुवाई करने का उचित समयः
ग्वार, जून से लेकर मध्य जुलाई तक, अगेती फसल जो सिंचिंत हालातों में अच्छी तरह से वृद्वि करती है। पछेती पकने वाली फसल की बिजाई मध्य जुलाई तक अवश्य कर देनी चाहिए।
पौध पोषण प्रबन्धनः
बेहतर पोषण प्रबंधन के लिए अर्बोईंट कोपडाईन 10 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से ग्वार की बुवाई करते समय प्रयोग करना चाहिए।
बीज की मात्राः
5 से 6 कि०ग्रा० प्रति एकड़ अगेती पकने वाली किस्म के लिए बीज की आवश्यकता होती है, तो वहीं 7 से 8 कि०ग्रा० प्रति एकड़ मध्यम अवधि वाली किस्मों के लिए बीज की आवश्यकता होती है।
उचित दूरीः
ग्वार की उत्तम पैदावार के लिए कतार से कतार 45 से०मी० और पौधे से पौधा 15 से०मी० दूरी बेहतर रहती है।
निराई-गुड़ाईः ग्वार की बुवाई करने के 25 से 30 दिन बाद निराई-गुड़ाई करनी चाहिए।
खरपतवार प्रबन्धनः
खरपतवारों की रोकथाम के लिए बैसालीन 400 मि०ली० ए०आई० प्रति एकड़ 250 लीटर पानी में मिलाकर फसल की बुवाई से पहले जमीन में अच्छी प्रकार मिलाकर भूमि का शोधन कर लेना चाहिए। इसके साथ ही यदि खेत की मिट्टी भारी है तो इस दवा की मात्रा को 25 प्रतिशत दवाई बढ़ा लेना चाहिए।
बीजोपचार: ग्वार के बीज को बुवाई करने से पूर्व राइजोबियम कल्चर से उपचारित कर लेना चाहिए।
उर्वरक का प्रयोगः 20 किलो फास्फोरस (125 किलो सिंगल सुपर फास्फेट) व 8 किलो नाईट्रोजन (32 किलो किसान खाद 25) प्रति एकड़ की दर से बुवाई के समय ही प्रयोग करना उचित रहता है।
सिंचाई व्यवस्थाः ग्वार में आमतौर पर 1 से 2 सिंचाई ही पर्याप्त रहती है।
फसल में लगने वाले विभिन्न रोगः हरा तेला, ग्वार की फसल को प्रारम्भ में नुकसान पहुँचाता है। इसकी रोकथाम के लिए 200 मि०ली० मैलाथियान 50 ई०सी० को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ की दर से हाथ से चलने वाले स्प्रे यंत्र की सहायता से छिड़काव करना चाहिए।
नोटः कई बार ग्वार की अगेती बुवाई कर देने पर वर्षा की अधिकता या अधिक सिंचाई करने से पौधों की वानस्पतिक वृद्धि अधिक होती है जिससे फलियाँ पौधों के केवल ऊपरी हिस्से पर एवं संख्या में कम लगती है और कई बार तो फलियाँ बिल्कुल भी नहीं लगती है।
ग्वार की अधिक फल व पैदावार लेने के लिए फूल आने की अवस्था पर अर्बाेईंट एक्सलरेट का स्प्रे 2-2.5 एम.एल प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने से लाभ प्राप्त होता है।
अधिक तापमान या पौधे में तनाव जैसी स्थिति के दिखाई देने पर 2-2.5 एम.एल अर्बोईंट ग्रो-शक्ति प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करने से लाभ प्राप्त होता है।

कृपया ध्यान दें कि यहां दिए गए फसल एवं किस्म के गुण धर्म कम्पनी के अनुसंधान केन्द्रों के निष्कर्षों पर आधारित है। कोई भी फराल एवं उसकी किस्म मिट्टी के प्रकार, प्रतिकुल जलवायु परिस्थिति, मौसम, अपर्याप्त/खराब फसल प्रबंधन, रोग तथा रोग के आक्रमण के कारण फसल तथा पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। फसल प्रबंधन हमारे नियंत्रण से बाहर है, अतः पैदावार के लिए किसान पूरी तरह जिम्मेदार है। अधिकतम उपज पाने के लिए बीजों को सही वक्त पर बोने तथा अनुकूल कृषि प्रबंधन पद्धतियों को अपनाने की सलाह दी जाती है, एवं स्थानीय राजकीय कृषि अधिकारियों या कृषि विश्वविद्यालय के द्वारा सुझाई गई सिफारिशें अधिक उत्पादन एवं गुणवत्ता के लिए अपनाई जा सकती हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।