
बाजरा उत्पादन की वैज्ञानिक विधि Publish Date : 24/06/2026
बाजरा उत्पादन की वैज्ञानिक विधि
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
बाजरा, जिसका वैज्ञानिक नाम Pennisetum glaucum है, यह एक मोटे अनाज वाली फसल है जो भारत के अतिरिक्त अफ्रीका और एशिया के शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में भी व्यापक रूप से उगाई जाती है। आमतौर पर बाजारा को पर्ल मिलेट (Pearl Millet) के नाम से जाना जाता है और हमारे यह ग्रामीण क्षेत्रों के लिए एक मुख्य खाद्यान्न फसल है। बाजरा न केवल पोषक तत्वों से भरपूर होता है, बल्कि यह सूखा पड़ने के दौरान और खराब मिट्टी की स्थिति में भी अच्छी उपज देता है।
बाजरा की खेती के लिए अवाश्यक जलवायु और मिट्टी

बाजरा गर्म मौसम की फसल है और इसे उगाने के लिए गर्म और शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है। यह 300 से 600 मिमी वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में भी अच्छी तरह से उगाया जा सकता है। यह सूखा-रोधी फसल बलुई से लेकर दोमट मिट्टी में अच्छे जल निकास के साथ बेहतर उपज देती है। बाजरे की अच्छी खेती के लिए मिट्टी का आदर्श पीएच स्तर 6.5 से 8.0 के बीच होना अच्छा माना जाता है।
भूमि की तैयारी
खेत की 2-3 बार जुताई करनी चाहिए ताकि मिट्टी भुरभुरी और खरपतवार मुक्त हो जाए। इससे समतल भूमि में नमी का समान वितरण होना भी सुनिश्चित होता है। भूमि की तैयारी के समय अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर खाद या जैविक खाद मिलाने से मिट्टी की उर्वरता और जलधारण क्षमता बढ़ती है।
बुवाई का समय और विधि
भारत में बाजरा की बुवाई आमतौर पर मानसून की शुरुआत (जून से जुलाई) में की जाती है। कुछ क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा होने पर इसे रबी (सर्दी) में भी बोया जा सकता है। बीजों को छिड़काव या सीड ड्रिल मशीन से बोया जा सकता है। पंक्तियों के बीच 45 सेमी और पौधों के बीच 10-15 सेमी की दूरी रखनी चाहिए। बाजरे का बीज प्रति हेक्टेयर 4-5 किलोग्राम बीज पर्याप्त माना जाता हैं।
खाद का प्रयोग
हालांकि, बाजरा कम उपजाऊ मिट्टी में भी उगाया जा सकता है, लेकिन मिट्टी की जांच के अनुसार उर्वरक देने से उत्पादन में काफी बढ़ोतरी होती है। सामान्यतः 40-60 किग्रा नाइट्रोजन, 20-30 किग्रा फास्फोरस और 20 किग्रा पोटाश प्रति हेक्टेयर देने की सिफारिश की जाती है। नाइट्रोजन को दो हिस्सों में देना बेहतर होता है, आधा बुवाई के समय और आधा टिलरिंग अवस्था में देना अच्छा प्रभाव देता है।
बाजरे में सिंचाई व्यवस्था
बाजरा अधिकतर वर्षा आधारित फसल है, लेकिन फूल आने और दाना बनने की अवस्था में सिंचाई करने से उपज में वृद्धि होती है। सिंचित क्षेत्रों में 2-3 बार सिंचाई करना ही पर्याप्त रहता है।
खरपतवार और कीट प्रबंधन
बाजरे की फसल में बुवाई के पहले 30 दिनों में खरपतवार नियंत्रण करना अत्यंत आवश्यक होता है। इसके लिए हाथ से निराई या हल्की गुड़ाई करके खरपतवार नियंत्रित किए जा सकते हैं। बाजरा आमतौर पर रोग और कीटों से सुरक्षित रहता है, लेकिन कभी-कभी यह डाउऩी मिल्ड्यू, स्मट और तना छेदक कीट से प्रभावित हो सकता है। प्रमाणित बीजों का प्रयोग करना, फसल चक्र अपनाना, और समय पर फफूंदनाशकों और कीटनाशकों का छिड़काव करने से इन सभी समस्याओं से यथासम्भव बचा जा सकता है।
कटाई और उपज

बाजरे की फसल 75 से 100 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है, जो कि बाजरे की प्रयोग की गई किस्म और जलवायु पर निर्भर करता है। जब पौधे पीले हो जाएं और उसके दाने भी सख्त हो जाएं तो फसल काटने के लिए तैयार हो जाती है। किसान प्रायः हांसिए से बाजरे की कटाई करते हैं, फिर फसल को धूप में सुखाकर उसकी मड़ाई की जाती है। बाजरे की औसतन उपज 15-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त हो जाती है, और अनुकूल परिस्थितियों में इससे अधिक उपज भी मिल सकती है।
बाजरे का पोषण और आर्थिक महत्व
बाजरा प्रोटीन, फाइबर, आयरन और मैग्नीशियम का अच्छा स्रोत होता है, और यह ग्लूटन-फ्री होता है, जिससे यह स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों के लिए आदर्श अनाज माना जाता है। आर्थिक रूप से भी यह शुष्क क्षेत्रों में खाद्य और चारे के रूप में एक महत्वपूर्ण फसल है। हाल के वर्षों में पारंपरिक और स्वास्थ्यवर्धक अनाजों की मांग बढ़ने के कारण बाजरे की लोकप्रियता और कीमतों में काफी वृद्वि भी हुई है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।