अरहर की खेती के लिए जून का अन्तिम सप्ताह अति उत्तम      Publish Date : 04/06/2026

     अरहर की खेती के लिए जून का           अन्तिम सप्ताह अति उत्तम

                                                                         प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

दालों की निरंतर बढ़ती कीमतों के बीच अरहर की खेती किसानों के लिए बेहद मुनाफे का सौदा साबित हो रही है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, खरीफ के मौसम में जून के आखिरी सप्ताह से लेकर 15 जुलाई तक का समय अरहर की बुवाई के लिए सबसे उत्तम माना जाता है। सही तकनीक, उन्नत बीजों के चयन और संतुलित उर्वरकों का उपयोग करने से किसान न केवल अरहर की बंपर पैदावार ले सकते हैं, बल्कि मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को भी बढ़ा सकते हैं।

अरहर की खेती किसानों के लिए एक बेहद मुनाफे का सौदा मानी जाती है, विशेषकर खरीफ के मौसम में इसकी बुवाई करना सबसे अधिक बेहतर माना जाता है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, जून के अंतिम सप्ताह से लेकर 15 जुलाई तक का समय अरहर की बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त होता है। इस समय में मिट्टी की नमी और तापमान पौधों के बेहतर ग्रोथ में सहायक होते हैं। आज के समय में दालों की बढ़ती कीमतों को देखते हुए अरहर की उन्नत खेती के माध्यम से किसान न केवल अपनी आय बढ़ा सकते हैं, बल्कि मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को भी सुधार सकते हैं और सही प्रबंधन और वैज्ञानिक तरीकों से अरहर की इस सीजन में बंपर उत्पादन प्रदान करती है।

                   

हमारे कृषि वैज्ञानिक प्रोफेसर आर. एस. सेंगर का कहना है कि अरहर की खेती के लिए जून के अंत से 15 जुलाई तक का समय सबसे बेहतर समय माना जाता है। किसानों को इस समय खेत की गहरी जुताई करके खेत को धूप में खुला छोड़ देना चाहिए ताकि मिट्टी के हानिकारक कीट और फफूंद आदि नष्ट हो जाएं। अरहर की बुवाई के लिए पूसा और भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान कानपुर की उन्नत किस्मों के बीज का ही चुनाव करना चाहिए। शुरुआत में कम नाइट्रोजन, लेकिन जड़ों के बेहतर विकास के लिए फास्फोरस और पोटाश का उचित संतुलन भी बेहद जरूरी है। बेहतर गुणवत्ता और रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए रसायनों के बजाय बायो-पेस्टिसाइड्स और बायो-इन्सेक्टिसाइड्स का उपयोग करना चाहिए।

खेत की प्रारंभिक तैयारी और जुताई

अरहर की अच्छी फसल के लिए सबसे पहले खेत की सही तैयारी करना बेहद जरूरी है। जिस प्रकार से इस समय तेज गर्मी पड़ रही है, जिसका किसानों को लाभ उठाना चाहिए। किसानों को खेत की गहरी जुताई करके उसे कुछ दिनों के लिए खुला छोड़ देना चाहिए। ऐसा करने से मिट्टी में मौजूद विभिन्न फफूंद, हानिकारक कीट, उनके अंडे और लार्वा धूप के संपर्क में आकर पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं। इसके अलावा, जब पहली बारिश होती है, तो गहरी जुताई वाले खेत में पानी अच्छी तरह से समा जाता है, जिससे मिट्टी लंबे समय तक नमी को सोखकर बनाए रखती है।

पोषक तत्व और मिट्टी का प्रबंधन

                           

जुताई के बाद पहली बारिश के साथ मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा प्राकृतिक रूप से बढ़ती है, जो अरहर के शुरुआती विकास में मदद करती है। हालांकि, अरहर की बुवाई के समय किसानों को उर्वरकों के सही संतुलन पर ध्यान देना चाहिए। जमाव और पौधे को स्वस्थ रखने के लिए शुरुआत में 15 से 20 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करें। इसके साथ ही, जड़ों की बेहतर ग्रोथ के लिए लगभग 50 किलोग्राम फास्फोरस और फसल की गुणवत्ता व रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए।

बीजों का चयन और बुवाई का समय

अरहर की बुवाई जून के आखिरी सप्ताह से लेकर 15 जुलाई के मध्य तक पूरी कर लेनी चाहिए। किसानों को पूसा या कल्याणपुर, कानपुर स्थित भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित उन्नत और प्रमाणित बीज कि ही बुवाई करनी चाहिए। अरहर की कुछ किस्में 120-125 दिनों में तैयार होती हैं, जिनमें 20 किलो बीज प्रति हेक्टेयर की दर से लगता है, तो वहीं, कुछ लंबी अवधि की किस्में 150 से 175 दिन भी परिपक्व होने के लिए लेती हैं। इनके पौधे अधिक फैलते हैं, इसलिए इनकी बुवाई करते समय बीज की मात्रा थोड़ी कम रखी जाती है और पौधों के बीच उचित दूरी बनाकर रखी जाती है।

फसल की देखभाल और कीट नियंत्रण

बुवाई के बाद समय-समय पर खेत की निराई-गुड़ाई और समय पर सिंचाई करना भी उतना ही जरूरी होता है। जब अरहर के पौधों में फूल और फलियां बनने लगती हैं, तब कीटों के आक्रमण का खतरा सबसे अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि इसके पीले फूल कीटों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। आजकल बाजार में मिलने वाली दालों की गिरती गुणवत्ता को सुधारने और अच्छा दाम प्रपाप्त करने के लिए रासायनिक कीटनाशकों के के स्थान पर बायो-पेस्टिसाइड और बायो-इन्सेक्टिसाइड का छिड़काव करना चाहिए, इससे पैदावार तो अच्छी होती ही है, साथ ही साथ अरहर की गुणवत्ता भी बेहतरीन बनी रहती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।