
सोयाबीन की उन्नत खेती Publish Date : 24/05/2026
सोयाबीन की उन्नत खेती
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
सोयाबीन विश्व की एक प्रमुख तिलहनी, औषधीय एवं पौष्टिक गुणों से भरपूर लाभदायक फसल है। मौसम की विपरीत परिस्थितियों को सहन करने के गुणों से भरपूर होने के कारण कृषकों में लोकप्रिय एवं समृद्धकारक रही है। पिछले कुछ वर्षों में अनेक कारणों से सोयाबीन की उत्पादकता हमारे देश में एक टन प्रति हैक्टेयर के आसपास ही है, जबकि विश्व के अन्य उत्पादक देश 2 से 2.5 टन प्रति हैक्टेयर औसत उत्पादन लेते हैं। भारत में सोयाबीन का उत्पादन 100 लाख टन तक ही हो पाया है, जबकि सोया प्रसंस्करण इकाइयों की वर्तमान क्षमता 200 लाख टन के आसपास है। इसलिये यह आवश्यक है कि भारत में सोयाबीन का उत्पाद 1.5 से 2 गुना बढ़ाने के समग्र प्रयास किए जाएं।
भारत में सोयाबीन के कम उत्पादन का मूल कारण सही तकनीकी का सही समय पर उपयोग न किया जाना है। अतः प्रस्तुत लेख में दी गई जानकारी को अपनाकर कृषक अपनी लागत मूल्य भी कम कर सकेगा। कृषक इन उन्नत तकनीकों को अपनाकर समृद्ध होंगे, सोयाबीन की खाद्य में उपयोगिता बढ़ेगी, देश से कुपोषण हटेगा एवं अधिक से अधिक विदेशी मुद्रा अर्जित होगी।
खेत का चुनावः सोयाबीन की खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली मध्यम से गहरी काली मिट्टी उपयुक्त होती है। खेत का ढाल इस प्रकार हो कि जल का निकास अच्छी तरह हो जाये और खेत में पानी नहीं रुके। खेत की मिट्टी अम्लीय या क्षारीय नहीं होनी चाहिए। मिट्टी का पी.एच. 7 के आसपास होना चाहिए। खेत की मिट्टी की जांच दो वर्ष के अंतराल पर अवश्य करा लेनी चाहिए एवं जांच अनुसार ही पोषक तत्वों को डालना एवं मात्रा का निर्धारण करना चाहिए।
भूमि की गहरी जुताई:- रबी की फसल कटाई के तुरंत बाद मिट्टी पलट हल (मोल्ड बोर्ड हल) से खेत की 12-14 इंच गहरी जुताई कर भूमि को गर्मी की धूप लगने के लिये खुला छोड़ देना चाहिए। अगर ऐसा करना हर वर्ष संभव न हो तो कम-से-कम दो या तीन वर्ष में एक बार अवश्य करें। ऐसा करने से भूमि में उपस्थित खरपतवार के बीज, बीमारियों के जीवाणु एवं कीटाणुओं के अंडे आदि तेज धूप से नष्ट हो जाते हैं कीट, बीमारी और खरपतवार कम उगते लगते हैं तथा इनकी रोकथाम में कम खर्च होता है। यह एकीकृत प्रबंध का प्रथम सोपान है। इससे वर्षा के जल को भूमि में सोखने की क्षमता बढ़ती है एवं जल को भूमि में समाने में भी सुविधा होती है व पानी खेत से बाहर बहकर नहीं जाता है। यदि फसल उत्पादन के दौरान कम वर्षा होती है तो गहरी जुताई किये गये खेत में लगाई गई फसल को सूखे से कम नुकसान होता है।
खेत की तैयारीः- जून के प्रथम सप्ताह में, पहली बौछार के बाद बड़े-बड़े ढेलों को तोड़ने के लिए एक या दो बार कल्टीवेटर या हैरो को विपरीत दिशा में चलाकर एवं पाटा लगाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए। 20-25 लाईनों के बाद एक नाली का निर्माण करने से अधिक वर्षा के दौरान पानी का निकास हो सकेगा एवं कम वर्षा के दौरान इन नालियों के माध्यम से सिंचाई की जा सकती है। पिछले वर्षों में वर्षों की कमी एवं अनिश्चितता को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त होगा कि सोयाबीन एवं खरीफ की अन्य फसलों को ब्राड बेड फरो (45 सेमी. की 7 कतारों के बाद गहरा कूड बनाना) अथवा रिज एवं फरो (गन्ने वाली कूड बनाना) पद्धति अपनाकर बोयें। इस पद्धति को अपनाने के लिएट्रेक्टर चलित मशीनें विकसित की गई हैं। रिज एवं फरो पद्धति के लिए देशी तरीके बोवनी मशीन में पटिये लगाकर की जा सकती है। से
भूमि उपचारः- चक्रभंग (गर्डल बीटल), तना मक्खी (स्टेमफ्लाई) एवं अन्य मिट्टी में निवास करने वाले कीटों के प्रबंधन के लिये एण्डोसल्फान 4% चूर्ण या फोरेट 10 जी 10 किग्रा. प्रति हैक्टेयर के हिसाब से रसायनिक उर्वरक के साथ मिलाकर डाला जा सकता है। जिससे कीटों का सोयाबीन फसल में प्रभावी नियंत्रण होता है।
खाद एवं उर्वरकः- सोयाबीन की अच्छी व टिकाऊ उपज लेने के लिये यह उत्तम होगा कि सर्वप्रथम स्वयं के पास उपलब्ध गोबर या अन्य किसी जैविक खाद का उपयोग करें तथा पूर्ण पोषक तत्वों की मात्रा की पूर्ति हेतु रसायनिक उर्वरकों को उपयोग में लायें।
अ. जैविक खादः जैविक खाद के उपयोग से भूमि में प्रमुख पोषक एवं सभी सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता तथा वां जलधारण की क्षमता बढ़ जाती है। जो पौधों की वृद्धि व उत्पादन बढ़ाने के लिए आवश्यक है। अंतिम बखरनी के पूर्व सड़ी हुई गोबर की खाद लगभग 10 टन या 12-16 किलो रॉक फॉस्फेट मिलाकर बनी हुई नाडेप फॉस्फो कम्पोस्ट की 20-25 क्विंटल मात्रा या 25-30 क्विंटल नाडेप खाद या 15-20 क्विंटल वर्मी कम्पोस्ट खाद प्रति हैक्टेयर की दर से खेत में फैला दें एवं पाटा चलाकर समतल कर देवें, अगर खाद की उपलब्धता सीमित हो तो खेत को दो भागों में बांटकर बारी-बारी से वर्षवार डालना उचित होगा। जैविक खादों का उपयोग जितनी मात्रा स्वयं के पास उपलब्ध हो उसे खेत में डालने के बाद यदि और खाद की आवश्यकता हो तो उसे रसायनिक खादों से पूर्ति अवश्य करना चाहिए। बॉयोगैस संयंत्र से निकली पतली स्लरी खेत में नालियां बनाकर सिंचाई के समय पानी में मिलाकर एक हैक्टेयर के लिये 50 से 60 क्विंटल स्लरी पर्याप्त है।
रसायनिक उर्वरकः- सोयाबीन के समुचित उत्पादन के लिये प्रति हैक्टेयर आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा तालिकानुसार अनुशंसित है। उक्त अनुसंशित उर्वरकों की मात्रा बुवाई समय फर्टी ड्रिल से खेत में देवें। उर्वरकों को बीज के 2.5-3.0 सेमी. नीचे या बगल में डाला जावें। यदि फर्टी सौड ड्रिल से बोवनी एवं उर्वरक साथ देना संभव नहीं हो तो बोवनी से पहले उर्वरकों की सही मात्रा एवं एण्डोसल्फान 4% चूर्ण या फोरेट 10 जी. का मिश्रण खेत में एकसार डालकर कल्टीवेटर से मिट्टी में मिला देना चाहिए।
- पोषक तत्वों की यह मात्रा रसायनिक उर्वरकों की 43 किलो यूरिया, 375 से 500 किलो सुपर फास्फेट व 33 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति हैक्टेयर देवें। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार सोयाबीन में अच्छी उपज लेने के लिए सुपर फास्फेट द्वारा ही फास्फेट तत्व की पूर्ति करना चाहिए। इससे स्वतः सल्फर भी मिल जाता है। जो सोयाबीन के लिए अत्यावश्यक तत्व है। या 125 किलो डीएपी, 33 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश से उपरोक्त तत्वों की पूर्ति प्रति हैक्टेयर हो सकती है। साथ में सल्फर की मात्रा की पूर्ति हेतु 250-300 किग्रा. सुपर फॉस्फेट प्रति हैक्टेयर खेत में मिलाना चाहिए।
- जस्ते की कमी वाले क्षेत्रों में 25 किलो जिंक सल्फेट प्रत्येक तीन वर्ष में मृदा परीक्षण के पश्चात डालें।
- रसायनिक खाद को कभी भी बीज के साथ मिलाकर बोवनी न करें।
- खड़ी फसल में नत्रजन (नाइट्रोजन) अथवा अन्य किसी उर्वरक का उपयोग विशेषज्ञ की सलाह बगैर न करें।
उत्तम जाति का चुनावः भारत में विभिन्न जलवायु क्षेत्रों के उपयुक्त सोयाबीन की उन्नत किस्मों की सूची तालिका-1 में दी गई है। कृषक अपने क्षेत्र में बीज उपलब्धता के आधार पर किस्मों का चुनाव कर उत्तम गुणवत्ता वाले बीज का समुचित मात्रा में पहले से ही प्रबंध कर लें। ऐसी जाति का चुनाव करना आवश्यक है जो रोगरोधक, कीटरोधक एवं फली चटकने के प्रति सहिष्णु हो। जिस खेत में गत वर्ष सोयाबीन रस्ट बीमारी आयी हो उस खेत के बीज को बोवनी के लिए उपयोग नहीं करना चाहिए।
बीज एवं बुवाई:- बुवाई के पहले बीज अंकुरण की जांच अवश्य करें, बोवनी पूर्व बीज को उपयोग से पहले बीज की अंकुरण क्षमता (कम से कम 70%) अवश्य सुनिश्चित कर लें। इस हेतु बीज अंकुरण क्षमता की जांच निम्नलिखित तरीके से की जा सकती है।
अंकुरण परीक्षणः- क्यारी विधिः जून के प्रथम सप्ताह में 10 मीटर की क्यारी सिंचाई देकर बना लें तथा बीज का सभी बोरों से नमूना लेकर कतारों में 45 सेमी. की दूरी पर जैसे खेत में बोते हैं वैसे ही बोवनी कर दें। आठ दिन बाद क्यारी में पौधों की संख्या गिन लें। यदि क्यारी में 4000 या इससे अधिक पौधे हो तभी इस बीज का उपयोग बुवाई के लिए करें अन्यथा दूसरे बीज का प्रबंध करें। अथवा टाट के टुकड़े में -पानी में भीगे टाट के चार 1×1 फीट चौड़े टुकड़ों पर बीज के सही नमूने में से 100 बीज लाईनों में प्रति टुकड़ा लगाकर बिस्तर की तरह लपेटकर अंधेरे कोने में रख दें व रोज थोड़ा-थोड़ा पानी छिड़कर कर नमी बनाये रखें। 6-8 दिन बाद चारों टाट के टुकड़ों को खोलकर तंदुरुस्त अंकुरित बीज गिन लें और कुल अंकुरित संख्या में 4 से भाग दें, यदि अंकुरित संख्या 70 या अधिक आये तभी इस बीज को बुवाई हेतु इस्तेमाल करें। अथवा अखबार में अखबार की दो परतों को लेकर उसके आधे भाग को हल्का गीला करके, नमूने में से 400 बीजों को लाईनों में लगाकर रखें। ऊपर के शेष आधे भाग की दोहरी परत से स्वस्थ अंकुरित दानों को गिन लिया जावे व उनका योग करके 4 से भाग देखें। यदि भागफल 70 या अधिक आवे तो ही बीज को बोनी के उपयोग में लेवें।
उपयुक्त पौध संख्याः अच्छी उपज के लिए सबसे प्रमुख आवश्यकता है कि खेत में 4 से 6 लाख स्वस्थ पौधे प्रति हैक्टेयर हो अर्थात 1 मीटर कतार में 20 स्वस्थ पौधे हों। बीज वही बोवनी करना चाहिए जिसका अंकरण कम से कम 70% हो। अच्छे बीज का सोयाबीन की उपज पर प्रभाव पड़ता है एवं किसान के शुद्ध लाभ को देखते हुए यह आवश्यक है कि बीज की गुणवत्ता के लिए ख्याति प्राप्त विश्वसनीय स्रोतों से हो प्रमाणित श्रेणी का बीज लिया जाए।
बीजोपचार:- सोयाबीन की अच्छी उपज के लिए फफूंदनाशक एवं कल्चर द्वारा निम्नलिखित विधि से बीज का उपचार अवश्य करना चाहिए।
फफूंदनाशक द्वारा बीज उपचारः फफदनाशक दवा थाइरम 2 ग्राम एवं कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज का अनुपात से बोवनी के बीज को एक या दो दिन पहले निम्न विधि से बीज को उपचारित करना अति आवश्यक है ताकि पौध एवं बीज सड़न रोग की रोकथाम से भली प्रकार सुरक्षित हो जावे अन्यथा सोयाबीन में बीज सड़न एवं पौध सड़न के रोग से पौधों की संख्या कम रह जाती है जिसका प्रभाव उपज में निश्चित कमी करता है।
विधिः- अच्छे अंकुरण वाले बीज को एक पॉलीथीन बिछाकर डाल लें एवं पानी का हल्का छींटा देकर बीज को नम कर दें, तद्वपरांत हाथों में दस्ताने पहन कर थाइरम एवं कार्बेन्डाजिम की उपर्युक्त मात्रा बीज पर डालकर बीज को धीरे-धीरे ऊपर नीचे मिलावे ताकि दवा बीज के ऊपर चिपक जावे। ऐसा करने से बीज की सतह सफेद हो जायेगी। बीज को कभी भी रगड़े नहीं। फफूंदनाशक से बीज उपचारित करने के बाद बीज को थैली में रखकर सुरक्षित स्थान पर रख दें एवं सुनिश्चित करें कि बीज कीमवेशी आदि न खायें एवं बीज को बच्चों से दूर रखें क्योंकि यह बीज फफूंदनाशक दवा के उपचार से जहरीला हो गया है।
कल्चर द्वारा बीज उपचारः बोवनी के ठीक पहले बीज को प्रभावकारी राइजोबियम कल्चर (जो पौधों में नाइट्रोजनस ग्रंथियाँ बनाने में सहायक है।) (10 ग्राम) एवं पी.एस.बी. कल्वर जो जमीन में स्थिर स्फुर को घुलनशील करते हैं) (10 ग्राम) प्रति किग्रा. बीज (लगभग 800 ग्राम कल्चर प्रति हैक्टेयर) से पानी का छींटा लगाकर बीज में सावधानी से मिला दें, बीज को रगड़े नहीं। उपचारित बीज को कभी धूप में न रखें। कल्चर से उपचारित बीज की बोवनी में कम से कम समय का अंतर है रा चाहिए। यह आवश्यक है कि कल्चर 1-2 माह अधिक पुराना नहीं हों। कल्चर को सदैव ठंडी जगह छांव में खाद तथा खेती की दवाईयों से दूर रखना चाहिए।
बीज दरः यदि बीज की अंकुरण व जमाव क्षमता 70 प्रतिशत या उससे अधिक हो तो 70 किग्रा. प्रति हैक्टेयर बीज से साधारणतया अच्छे परिणाम मिलते हैं।छोटे बीज वाली किस्मों में बीज की मात्रा कम की जा सकती है एवं बड़े बीज वाली जातियों में तथा यदि किसी कारणवश बोवनी जुलाई में करनी पड़े तो बीज की मात्रा 90 किग्रा. प्रति हैक्टेयर रखें। विवरण तालिका-2 में दिया गया है।
बोवनी की गहराई एवं कतार से कतार की दूरीः- सोयाबीन बीज को 3 सेमी. गहराई में बोने से अंकुरण अच्छा होता है। 20 से 30 जून के मध्य कतार से कतार की दूरी 40-45 सेमी. (16-18 इंच) तथा बीज से बीज की दूरी लगभग 5-7 सेमी. होनी चाहिए। 30 जून के बाद देर से बोई गई सोयाबीन में कतार से कतार की दूरी 30-35 सेमी. - (12-14 इंच) करनी चाहिए।
बोवनी का सही समयः हर संभव प्रयास करना चाहिए ताकि सोयाबीन की बोवनी 15 जून से 30 जून की अवधि में समाप्तकर दी जाए। इस अवधि में बोवनी से अधिकतम उपज प्राप्त होती है। 30 जून के बाद बोवनी में प्रति दिन की देरी से उपज में कमी आती है एवं 10 जुलाई के बाद उपज में भारी कमी आती है।
बोवनी की विधिः- उपर्युक्त विवरण के अनुसार उपचारित बीज को बैलों द्वारा चलित अथवा ट्रेक्टर सोडू ड्रिल से कतार से कतार की दूरी एवं सही गहराई पर बोवनी करनी चाहिए। फर्टी सीडड्रिल की एक पेटी में उर्वरक की उपयुक्त मात्रा एवं दूसरी पेटी में बीज की उचित मात्रा डालें एवं बीज की निकासी के लीवर का समंजन (एडजस्ट) इस प्रकार करें कि बीज कतार में 5 से 7 सेमी. की दूरी पर बराबर-बराबर गिरे।
बोवनी करते समय ध्यान रखें कि सीड ड्रिल की सभी नालियों से बीज गिर रहा है एवं कोई नली बंद तो नहीं हो गयी। बोवनी के उपरांत खेत में घूमकर सुनिश्चित कर लें कि कहीं पर भी बीज ऊपर या नंगा तो नहीं पड़ा है अर्थात नंगे बीज पर मिट्टी चढ़ा दें। बोवनी के उपरांत एक सप्ताह तक पक्षियों से भी बीज का बचाव करना चाहिए। फसल चक्रः भारत में प्रचलित फसल चक्र में सोयाबीन का विशेष स्थान है। सिंचित क्षेत्रों में सोयाबीन, गेहूं एवं असिंचित क्षेत्रों में सोयाबीन-चना एक लाभदायक प्रचलित फसल चक्र है। इनके अलावा उपर्युक्त जातियों के चयन उपरांत सोयाबीन आलू, गेहूं, सोयाबीन-तोरिया, सोयाबीन लहसुन गेहूं आदि भी लिए जा सकते है।
एक ही खेत में लगातार सोयाबीन उगाने से उसमें कीटों, रोगों एवं खरपतवारों की समस्या बढ़ जाती है तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी भी भूमि में दिखने लगती है। अतः 2-3 वर्षों में सोयाबीन लगाने के बाद खरीफ मौसम में सोयाबीन वाले खेत में ज्वार, मक्का, मूंग, उड़द, अरहर आदि फसलों को अदल-बदल कर बोना चाहिए।
अंतरवर्तीय फसलें:- एकाकी सोयाबीन की खेती के अलावा इसकी खेती अंतरवर्तीय रुप से भी विभिन्न फसलों के साथ की जा सकती है। भारत में विभिन्न परीक्षणों के अनुसार सोयाबीन की अंतरवर्तीय फसलें प्रेषित की गई है। विभिन्न परीक्षणों में सोयाबीन के साथ अरहर अथवा मक्का की खेती लाभप्रद पाई गई है। अंतरवर्तीय खेती में खरपतवार नियंत्रण हेतु रसायनिक खरपतवार नाशक का उपयोग नहीं किया जा सकता। अतः खरपतवार नियंत्रण मजदूरों आदि से ठीक प्रकार समय पर करना चाहिए। कटाई तथा खाद एवं उर्वरक की क्रियाओं में भी विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। अरहर के साथ सोयाबीन की अंतरवर्तीय फसल बोना उन खेतों में अत्यंत लाभदायक होगा, जहां सोयाबीन के बाद रबी फसल लेने की संभावना न हो।
1. अरहर की मध्यम से देर से पकने वाली किस्मों जैसे जवाहर-3, जवाहर-4, आई. सी.पी.एल.-87, आई.सी.पी.एल. 88, आई.सी.पी.एल.151, सी-11 में से 2. अरहर की बीज दर 20 किलो प्रति हैक्टेयर एवं उर्वरक की सोयाबीन में अनुशंसित मात्रा का ही प्रयोग करें।
3. अरहर सोयाबीन की अंतवर्तीय फसल में कतार से कतार की दूरी 30 सेमी. रखें।
4. जितने क्षेत्र में सोयाबीन लगाई जा रही है उतने क्षेत्र के हिसाब से बीजदर एवं उर्वरक खाद की अनुशंसित मात्रा (2/3) का प्रयोग करें।
5. सोयाबीन की काश्त फल, बागों में बीच की खाली जमीन में भी करना लाभकारी है।
खरपतवार नियंत्रणः सोयाबीन खरीफ मौसम की फसल होने से इसमें खरपतवार की गंभीर समस्या बनी रहती है। सोयाबीन के खेत को बोवनी के बाद 45 दिनों तक खरपतवार से मुक्त रखें। खरपतवार प्रबंधन के नहीं होने पर 40-45% तक उपज में कमी आती है। खरपतवार सोयाबीन की फसल पर प्रकाश, मृदा, वायु, जल तथा पोषक तत्वों की प्रतिस्पर्धा कर उसकी उपज में भारी कमी करते हैं। बुवाई के बाद प्रारंभिक 45 दिनों तक खरपतवार द्वारा अधिक नुकसान होता है। अतः इस अवधि में खरपतवार प्रबंधन आवश्यक है। सोयाबीन फसल में खरपतवार का प्रबंधन शस्य क्रियाओं एवं आवश्यकतानुसार रसायनिक दवाईयों से करना चाहिए।
यांत्रिक विधि/शस्य क्रियाओं द्वाराः निंदाई के लिये मानव, बैल चलित एवं ट्रैक्टर चलित कई प्रकार के यंत्र उपलब्ध है जिनमें मानव चलित ग्रबर, ड्रायलेण्ड वीडर तथा व्हील हो, हेन्ड हो बहुत ही उपयुक्त हैं। सामान्यतः 20-25 तथा 40-45 दिनों पर दो बार निंदाई करना उचित रहता है। पशुओं से चलने वाले यंत्र डोरा और तीन फाल वाला कल्टीवेटर सोयाबीन में निंदाई के लिए सुविधाजनक एवं उपयोगी पाए गए हैं।
ट्रेक्टर से चलने वलो यंत्रों जैसे कल्टीवेटर को कतारों के बीच डोरा जैसा लगाया जा सकता है। इससे कम समय में अधिक फसल में डोरा जैसी निंदाई हो जाती है या ट्रेक्टर चलित पंक्ति वाला रोटरी नींदा नियंत्रक यंत्र उपयोग में लायें। ट्रैक्टर चलित निंदाई यंत्रों का उपयोग करते समय पतले टायर का उपयोग करें एवंपंक्ति से पक्ति की दरी 40-45 सेमी. रखें। फसल में प्रथम डोरा बवाई के 25-30 दिन बाद करना चाहिए। डोरा चलाते समय सावधानी रखनी चाहिए कि पौधे न उखड़ने पाये। इस विधियों द्वारा खरपतवार नियंत्रण तो होता ही है, साथ ही साथ फसल में गुडाई के कारण मृदा में वायु संचार बढ़ने से उपज में और वृद्धि होती है तथा अवर्षा की स्थिति मैं मिट्टी पलवार का काम करती है, जिससे जमीन में नमी लंबे समय तक बनी रहती है।
रसायनिक विधिः- किसी कारणवश कृषकों को डोरा/निंदाई का पर्याप्त समय नहीं मिलता है तो अनुमोदित रसायनिक नौदानाशकों का सही दर एवं सही तरीके से प्रयोग करें।
रसायनिक नींदानाशक के तीन विकल्प उपलब्ध है:-
1. बोवनी के पूर्व उपयोग में आने वालेः फ्लूक्लोरेलीन 48 ईसी 2.22 लीटर या यईफ्लूरोलीन 50 ईसी 2 लीटर मात्रा प्रति हैक्टेयर का 700 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
2. बोवनी के तुरंत बाद व सोयाबीन के अंकुरण के पूर्व उपयोग में आने वालेरू-एलाक्लोर 4 लीटर या एलाक्लोर 10 जी 20 किग्रा. या मेटोलाक्लोर 50 ईसी 2 लीटर या क्लोमोझोन 50 ईसी 2 लीटर या पेण्डीमिथालीन 30 ई. सी. 3. 25 लीटर का प्रति हैक्टेयर 700 लीटर पानी में घोल बनाकर फ्लेट पेन नोजल से छिड़काव करें।
खड़ी फसल में उपयोग किये जाने वाले नींदानाशकः-
अ. संकरी पत्ते की नींदाओं के नियंत्रण के लिए बोनी के 15-30 दिन बाद क्विजालोफोसईथाइल 5% ईसी 1 लीटर/हैक्टेयर का छिड़काव खड़ी फसल में 700 लीटर पानी में घोल बनाकर फ्लेट पेन नोजल से करें।
ब. चौड़ी पत्ती की नींदाओं के नियंत्रण के लिए क्लोरीम्यूरोन ईथाइल 36 ग्राम/हैक्टेयर का छिड़काव बोवनी के 15-25 दिन बाद करें।
स. दोनों प्रकार के नींदाओं (सकरी एवं चौड़ी) के नियंत्रण के लिए इमाजेथापायर (720 मिली) को 700 लीटर पानी में घोल बनाकर 2-3 पत्ती अथवा 3 इंच खरपतवार की अवस्था पर छिड़काव करें या क्विजालोफोस ईथाइल 5 ईसी 1 लीटर/हैक्टेयर क्लोरोम्यूरान ईथाइल 36 ग्राम/हैक्टेयर का छिड़काव बोने के 15-25 दिन बाद 700 लीटर पानी में घोल बनाकर करें। नींदा नाशकों के छिड़काव के समय भूमि में नमी होनी चाहिए एवं स्प्रेयर में फ्लेट पेन नोजल लगानी चाहिए।
समन्वित खरपतवार नियंत्रण एवं सफल खरपतवार नियंत्रण हेतु आवश्यक सुझावः-
1. रबी फसल काटने के बाद खेत की गहरी जुताई करें। अगर प्रत्येक वर्ष संभव न हो तो हर दूसरे या तीसरे वर्ष गहरी जुताई जरुर करें।
2. बोवनी के पूर्व खेत में एक बार बक्खर व पाटा अवश्य चलायें।
3. फसल चक्र अवश्य अपनायें।
4. सोयाबीन बौज के साथ कोई भी खरपतवार रसायन न मिलावें।
5. खरपतवार नाशक छिड़काव के लिए फ्लेटफेन या फ्लडजेट नौजल का ही उपयोग करें।
6. पूरे खेत में समान रुप एवं एक चाल से छिड़काव करें।
7. खरपतवारनाशों से अच्छे परिणाम के लिए 700 लीटर पानी प्रति हैक्टेयर का उपयोग अवश्य करें।
8. खरपतवारनाशक का उपयोग करते समय भूमि में नमी हो। बोवनी से पूर्व डाले गये खरपतवारनाशकों को मिट्टी में अच्छी तरह से तुरंत मिला दें।
9. सोयाबीन के लिए अनुमोदित खरपतवारनाशकों का ही उपयोग करें।
10. खड़ी फसल में खरपतवारनाशक का उपयोग खरपतवार की 2-3 पत्ती अथवा 3-4 इंच की अवस्था पर ही करना चाहिए।
11. रसायनों का प्रयोग करते समय सावधानियां बरतें जैसे-मुंह पर पड़ा बांधना, हाथों में दस्ताने पहनना आदि।
12. छिड़काव के बाद छिड़काव यंत्र के सभी भागों को अच्छी तरह से पानी से धोकर सफाई करें।
सिंचाई% चूंकि सोयाबीन की फसल खरीफ मौसम में लगाई जाती है। अतः यदि वर्षा सामान्य एवं नियमित अंतराल पर होती है तो ऊपर से सिंचाई देने कीआवश्यकता नहीं है किन्तु असामान्य स्थिति में फसल की क्रांतिक अवस्था जैसे पुष्पन या फली में दाना पड़ने की अवस्था पर फसल को सूखे से अवश्य बचाना चाहिए एवं सिंचाई करने से अच्छी उपज निश्चित है। यदि संभव हो तो पौधों की नन्हीं अवस्था में भी सूखे की स्थिति को सिंचाई द्वारा दूर करना चाहिए।
पहचान एवं लक्षणः- सोयाबीन में कई स्थानों पर कभी-कभी फलियां नहीं बनती। इसका प्रमुख कारण एक प्रकार की हरी अर्द्धकुण्डलक इल्ली (क्रायसोडेक्सिस एक्यूटा) है जिसके मुंह की ओर का हिस्सा पतला व पिछला हिस्सा मोटा होता है। यह इल्ली प्रायः फूल आते समय फूलों एवं कलियों को खा लेती है जिससे पौधे बांझ दिखते हैं।
कुछ समय बाद ऐसे प्रभावित पौधे में दुबारा फूल व कलियां बनती है जिनकी संख्या काफी अधिक (प्रत्येक गतान पर 50-60 तक) होती है। परन्तु उस समय तक पानी की कमी के कारण इन पुष्प कलियों में फलियां एवं दाने बहुत कम बनते हैं। ऐसी फसल में प्रायः यह देखा गया है कि सिंचाई करते रहने पर संतोषजनक उपज मिल जाती है।
रोकथाम के उपायः ऐसे खेतों पर जहां अफलन की समस्या हर साल उग्र रूप में आती हो, वहां फसल में फूल आने से पहले एवं फूल आने के बाद की अवस्था पर निम्नलिखित में से किसी एक दवा का 700 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर में छिड़काव करने से बांझपन (अफलन) की समस्या रोकी जा सकती है: इण्डोसल्फान 35 ई.सी. 1.5 लीटर/हैक्टेयर या क्लोरोपायरीफांस 20 ई.सी.1.5 लीटर/हैक्टेयर या ट्राईजोफांस 40 ई.सी.800 मिली./हे. या मिथोमिल 40 एस.पी. 1 कि.ग्रा./हे. या इथिऑन 50 ई.सी. 1.5 ली./हे. या विनॉलफॉस 25 ई.सी. 1.5 ली./हे. में से किसी एक दवा।
एकीकृत उपायः-
1. बुवाई के समय फोरेट 10 जी से मिट्टी का उपचार 10 किलो प्रति हेक्टेयर के हिसाब से फसल की आरंभिक अवस्था में लगने वाले संभावित वाहक कीटों के नियंत्रण हेतु अवश्य ही उपयोग में लें।
2. रोग से ग्रसित फसल के बीज को बुवाई के काम में न लेवें क्योंकि यह कम गुणवत्ता वाले व अस्वस्थ बीज होते हैं।
3. अनुशंसित बीज दर 75 से 100 किलो प्रति हैक्टेयर (किस्मों के बीज के आकार के हिसाब से) ही काम में लेवें क्योंकि अधिक पौध संख्या होने पर रोग के जल्दी व उग्र रूप में आने की संभावना होती है।
4. सनई या तिल की फसल सोयाबीन अफलन रोग के पाए जाने वाले क्षेत्रों में न लेवें क्योंकि यह फसल रोग वाहक कीटों के पालन में मदद करती है।
फसल की कटाई, गहाई व बीज भण्डारणः-
कटाई:- जब 75 प्रतिशत फलियों का रंग हरे से बदल कर पीला या भूरा या काला आदि हो जाए तब तेज धार की दराती से नीचे से काटें ताकि एक भी फली तने पर नहीं छूटे। कटी फसल को खलिहान में फैलाकर सुखाना चाहिए।
गहाई:- फसल को 2-3 दिन तक धूप में सुखाकर थ्रेशर से धीमी गति (300-400 आर.पी.एम.) पर 12 इंच की पुली लगाकर गहाई करनी चाहिए। बीच-बीच में बीज का निरीक्षण करते रहना चाहिए कि बीज टूट तो नहीं रहा है अन्यथा थ्रेशर में समन्जन (एडजस्ट) करके थ्रेशर की गति को कम करनी चाहिए। गहाई के बाद भूसे को उड़ाकर निकालना चाहिए।
भण्डारणः गहाई के बाद बीज की 3-4 दिन तक धूप में अच्छा सुखाकर भण्डारणकरना चाहिए। भण्डार गृह ठंडा, हवादार व कीट रहित होना चाहिए। कटाई के बाद आगामी बोवनी तक अर्थात करीब 7 से 8 माह तक बोज भण्डार में रखना होता है। इस दौरान अंकुरण क्षमता में कमी आती है। यदि कटाई, गहाई, बीज में नमी प्रतिशत, भण्डारण इत्यादि में सावधानी नहीं रखी गई, तो मानक अंकुरण (70 प्रतिशत) में 10 से 25 प्रतिशत कमी आ जाती है।
भण्डारण में सावधानियां:- बीज को साफ तारपोलीन पर बिछाकर सुखायें। सूखे बीज को बोरों में भरकर गोदामों में लकड़ी के पटियों (रेक्स) पर दीवार से दूर रखें, जिससे बीज जमीन या दीवार से नमी न सोखें। बोरों की थप्पी अधिक ऊंची न लगाएं एवं बोरों को एक दूसरे के ऊपर विपरीत दिशा में रखना चाहिए। सोयाबीन के बोरों को खलिहान से लाने एवं भंडार में रखते समय ऊंचाई से न पटकें। उचित होगा कि बैलगाड़ी, ट्रेक्टर ट्रॉली से उतारते समय दो आदमी भण्डारण के स्थल पर बोरों को धीरे से रखकर थप्पी लगावें। बीज मानक के अनुसार बीज शुद्धता 98 प्रतिशत, अंकुरण क्षमता 70 प्रतिशत व नमी 12 प्रतिशत है। बीज के वर्गीकरण व उपचार के समय बीज में 10 प्रतिशत नमी होना चाहिए। पोलीथीन अस्तर के बोरों का उपयोग न करें क्योंकि उसमें नमी के एकत्रित होने व बीज के श्वसन क्रिया से तापमान बढ़ने की संभावना अधिक रहती है। भण्डार गृह में वायुसंचार होते रहना चाहिए। भण्डारण के लिए सही तापक्रम 20-25 डिग्री सेल्यियस है। इस तापक्रम को गांवों के भण्डार घरों में थोड़ा सुधार कर पाया जा सकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।