
फसल के बंपर उत्पादन के लिए ट्राइकोडर्मा अपनाएं Publish Date : 18/05/2026
फसल के बंपर उत्पादन के लिए ट्राइकोडर्मा अपनाएं
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
ट्राइकोडर्मा का उपयोग करने से किसान मिट्टी की जैविक सक्रियता को बढ़ा सकते हैं, जिससे फसल की पैदावार में सुधार होता है। रासायनिक खाद पर होने वाले खर्च को कम करने के साथ ही यह फसलों को रोगमुक्त और खेती को टिकाऊ बनाने में सहायक सिद्व होता है।
मिट्टी की सेहत को सुधारने के लिए ट्राइकोडर्मा का उपयोग सस्ता और असरदार जैविक उपाय है। ट्राइकोडर्मा इको-फ्रेंडली और मित्र फफूंद है, जो मिट्टी की जैविक सक्रियता को बढ़ाकर फसलों की जड़ों को सड़न, आर्द्र गलन और अन्य फफूंद जनित बीमारियों से बचाता है। ट्राइकोडर्मा पौधों की जड़ों के विकास को तेज करता है, जिससे पौधे मिट्टी से पोषक तत्वों का बेहतर अवशोषण कर पाते हैं। सरदार वल्लभभाई पटेन कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ0 आर. एस. सेंगर बताते हैं, ट्राइकोडर्मा मिट्टी की संरचना को सुधारता है और लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या पर्याप्त वृद्वि करता है। इसका नियमित उपयोग करपे से फसल रोगों के प्रति अधिक सहनशील बनती है एवं स्वस्थ बनी रहती है, जिससे उत्पादन में बढ़ोतरी होती है और किसानों को लाभ बढ़ जाता है।

ट्राइकोडर्मा की सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली दो प्रजातियां ट्राइकोडर्मा हर्जियानम और ट्राइकोडर्मा विरिड का खेती में अधिक उपयोग किसा जाता है। फसल की बुआई से पहले ट्राइकोडर्मा हर्जियानम से बीज उपचार करें तो जड़ सड़न व तना गलन से फसल बची रहती है। ट्राइकोडर्मा विरिड को गोबर खाद या कम्पोस्ट के साथ मिलाकर उपयोग करें तो मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। इसे सीधी धूप व रासायनिक दवाओं से दूर रखें तथा हमेशा शाम को नम मिट्टी में ट्राइकोडर्मा का प्रयोग करें।
घर पर तैयार करने की विधि
ट्राइकोडर्मा को बेहद कम लागत में आप अपने घर पर भी इसे तैयार कर सकते हैं। इसके लिए 10 किलो सड़ी हुई गोबर खाद या वर्मी कम्पोस्ट में 2 किलो चोकर मिलाएं। इसमें 100 ग्राम ट्राइकोडर्मा कल्चर डालकर हल्की नमीं बना कर रखें। इस मिश्रण को 5-7 दिन तक छाया में ढककर रखें और रोजाना पलटते रहें। तैयार होने पर हरी परत दिखाई देने लबती है, जो इसके सक्रिय होने का संकेत होता है।
- रोगजनक फफूंद पर करता है सीधा वार। ट्राइकोडर्मा रोगजनक फफूंद के आसपास फैलकर उनके पोषक तत्वों को अवशोषित कर लेता है। यह काइटिनेज और ग्लुकेनेज जैसे एंजाइम बनाकर हानिकारक फफूंद की कोशिका दीवार को तोड़ देता है। यह पौधों की जड़ों को मजबूत बनाता है, पोषक तत्वों के अवशोषण को बढ़ाता है और पौधों में प्राकृतिक प्रतिरोध विकसित करता है, जिससे पौधे रोगों के प्रति अधिक सहनशील बन जाते हैं।
- 5-10 ग्राम पाउडर से करें एक किलो बीज उपचार ट्राइकोडर्मा का उपयोग उद्यानिकी फसलों में बीज उपचार, नर्सरी और मिट्टी शोधन में करें। 5-10 ग्राम पाउडर से प्रति किलो बीजों के उपचार के लिए-
- उपचार से आर्द्र गलन व पौध अंगमारी से बचाव होता है। नर्सरी में 5-10 ग्राम पाउडर प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र में मिलाने से जड़-तना गलन नियंत्रित होता है। खेत की तैयारी के समय 4-5 किलो पाउडर प्रति एकड़ की दर से उपयोग करने से फ्यूजेरियम, पीथियम व राइजोक्टोनिया जैसे रोगजनक नियंत्रित रहते हैं।
- फल और सब्जी फसलों में बेहद उपयोगी है ट्राइकोडर्मा का उपयोग और लगभग सभी फसलों में आसानी से किया जा सकता है, लेकिन यह फलों और सब्जियों की फसलों में अधिक प्रभावी माना जाता है। टमाटर, मिर्च, गोभी, बैंगन, प्याज, अदरक, हल्दी, केला, अमरूद और पपीता जैसी बागवानी फसलों में इसके बेहतर परिणाम मिलते हैं। किसान इसे बीज उपचार, नर्सरी तैयार करने और खेत की मिट्टी में मिलाकर आसानी से उपयोग किया जा सकता हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।