अधिक उत्पादन पाने के लिए ट्रेंच विधि से करे गन्ने की खेती      Publish Date : 14/05/2026

अधिक उत्पादन पाने के लिए ट्रेंच विधि से करे गन्ने की खेती

                                                                                                          प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

  • मार्च में इस विधि से करें गन्ने की बुवाई, 50% पानी से 2 गुना होगा जमाव के साथ ही उत्पादन भी मिलेगा बहुत अच्छा।

अगर आप गन्ने की बुवाई करने के बारे में विचार कर रहे हैं और गन्ने का भरपूर उत्पादन चाहते हैं तो फिर गन्ने की बुवाई करने की परंपरागत विधि को छोड़कर ट्रेंच विधि से गन्ने की बुवाई करने का विचार करें। गन्ने की बुवाई इस विधि से करने पर 50 प्रतिशत से अधिक तो पानी की बचत होती है साथ ही गन्ने का उत्पादन भी 2 से 2.5 गुना तक अधिक हो सकता है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहित देश तमाम गन्ने के किसानों के लिए गन्ना एक प्रमुख नकदी फसल है जो कि चीनी की आपूर्ति का एक मुख्य स्रोत है। पूरी दुनिया में भारत चीनी का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। भारत में गन्ने की फसल की अनुमानित उत्पादकता 77.6 टन प्रति हेक्टेयर है तथा उत्पादन लगभग 306 मिलियन टन है, जो ब्राजील (758 मिलियन टन) के मुकाबले बहुत कम है, लेकिन दंनिया के अन्य देशों की तुलना में अधिक है। लेकिन किसान चाहें तो गन्ने की खेती के लिए उन्नत कृषि तकनीक को अपनाकर बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। दरअसल गन्ने की फसल पर मौसम की मार का भी बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ता जिसकी वजह से किसान इसकी खेती करना अधिक पसंद करते हैं। वहीं अगर गन्ने की खेती परंपरागत विधियों को छोड़कर वैज्ञानिक तरीकों से की जाए तो गन्ने की खेती किसानों के लिए बहुत ही अधिक लाभकारी सिद्व होती है।

                                     

उत्तर प्रदेश गन्ना शोध संस्थान के प्रसार अधिकारी डॉ. संजीव पाठक ने बताया कि गन्ने की फसल किसानों के लिए बेहद भरोसेमंद फसल है। अगर किसान गन्ने की खेती परंपरागत विधि को छोड़कर ट्रेंच विधि से इसकी खेती करें तो गन्ने की फसल को तैयार करने में कम लागत आती है और पानी की भी बचत होती है। इसके अलावा किसानों को अच्छा उत्पादन मिलता है. जिससे किसानों की आय में बढ़ोत्तरी होती है।

क्या है गन्ने की परंपरागत विधि?

परंपरागत तरीके से गन्ने की खेती करने के लिए 90 सेंटीमीटर पर कूड़ बनाए जाते हैं और तीन आंख के टुकड़े से गन्ने की बुवाई की जाती है। जिससे जमाव बेहद कम रहता है. 30 प्रतिशत से 40 प्रतिशत गन्ने का जमाव ही हो पाता है। परंपरागत विधि से गन्ने की खेती करने से गन्ने में फुटाव भी कम होता है। करीब 40 प्रतिशत कल्ले ही गन्ने में परिवर्तित हो पाते हैं। जिसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है और अन्ततः किसान की आय पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। इस विधि से गन्ने की खेती करने में पूरे खेत में सिंचाई करनी होती है तो पानी की खपत भी अधिक होती है जबकि गन्ने की बबुवाई करने की दूसरी ट्रेंच विधि में ऐसा नहीं होता है। परंपरागत विधि से गन्ने की बुवाई करने के लिए 60 से 65 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के हिसाब से बीज की आवश्यकता होती है। परंपरागत तरीके से गन्ने की खेती करने से 600 से 700 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से गन्ने का उत्पादन ही प्राप्त हो पाता है।

ट्रेंच विधि से होगा 2.5 गुना उत्पादन

ट्रेंच विधि से खेती करने के लिए लाइन से लाइन की दूरी 4 फीट रखकर गन्ने की बुवाई की जाती है। ट्रेंच विधि से गन्ने का जमाव 70 प्रतिशत से 75 प्रतिशत तक होता है और साथ ही फुटाव भी बहुत अच्छा होता है। गन्ने के 80 प्रतिशत कल्ले गन्ने में परिवर्तित हो जाते हैं। जिससे किसानों को अधिक उत्पादन मिलता है। ट्रेंच विधि से गन्ने की खेती करने से 50 प्रतिशत पानी की भी बचत होती है, क्योंकि इसमें नालियों में ही सिंचाई करनी होती है, जबकि परंपरागत विधि से पूरे खेत में सिंचाई करनी पड़ती है। ट्रेंच विधि में किसान कम से कम 1000 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर सकते हैं। अगर किसान फसल की बेहतर तरीके से देखभाल करें तो इसको बढ़ाकर 1500 से 1800 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक भी किया जा सकता है। ट्रेंच विधि में लाइन से लाइन की दूरी ज्यादा होने की वजह से सहफसली भी की जा सकती है. जिससे किसानों को कम समय में अतिरिक्त आमदनी भी मिलती रहती है। 

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।