वर्तमान समय में हाइड्रोपोनिक खेती और उसके लाभ      Publish Date : 02/05/2026

वर्तमान समय में हाइड्रोपोनिक खेती और उसके लाभ

                                                                                     प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशू चौधरी

विश्व की निरंतर बढ़ती हुई आबादी के चलते न केवल फसलों में कीटनाशक का प्रयोग बढ़ा है, बल्कि उपजाऊ कृषि योग्य भूमि की मात्रा में भी उल्लेखनीय कमी आई है। इसी प्रकार की समस्या को ध्यान में रखते हुए आज हम बात करने जा रहे हैं खेती की एक ऐसी प्रणाली की जहां पौधों अथवा फसलों को मिट्टी से अलग उगाया जाता है। खेती की इसी प्रणाली का नाम हाइड्रोपोनिक खेती है।

यह खेती की एक ऐसी प्रणाली है जहां फसलों को केवल पानी के माध्यम से उगाया जाता है और फसल के लिए सभी पोषक तत्व इस पानी मे मिलाकर नियमित रूप से फसल को दिये जाते हैं। सामान्य तौर पर पौधे व फसल ज़मीन पर ही उगाये जाते हैं। इनके बड़े होने के लिए खाद, मिट्टी अथवा पानी की आवश्यकता होती है। लेकिन सच यह है कि पौधे या फसल के विकास के लिए केवल तीन चीजों की आवश्यकता होती है- पानी, पोषक तत्व एवं सूर्य का प्रकाश।

केवल पानी में या बालू अथवा कंकड़ों के बीच नियंत्रित जलवायु की सहायता के बिना मिट्टी के ही पौधे उगाने की प्रणाली को हाइड्रोपोनिक खेती कहते हैं। इस प्रणाली की खास बात यह भी है कि पारंपरिक खेती के मुकाबले इस खेती में पानी की मात्रा का प्रयोग कम होता है। कभी कभी तो यह भी देखा गया है कि इस खेती में 90 प्रतिशत तक के पानी की बचत होती है। जिन क्षेत्रों में पानी की कमी होती है, यह खेती ऐसे क्षेत्रों के लिए काफी लाभदायक सिद्व होती है।

                                    

इस प्रकार की खेती में जल का कोई तनाव नहीं होता तथा फसलों के लिए तमाम पोषक तत्व हर समय उपलब्ध होते हैं। इस प्रकार की खेती में केवल घुलनशील उर्वरकों का ही प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार की खेती की मदद से उन क्षेत्रों में भी फसल उगाई जा सकती हैं जहां ज़मीन की कमी अथवा जहां की मिट्टी उपजाऊ नहीं होती।

सामान्य तौर पर फसलों को आवश्यक पोषक तत्व ज़मीन से प्राप्त होते हैं। लेकिन हाइड्रोपोनिक खेती प्रणाली के अन्तर्गत आवश्यक पोषक तत्व के लिए पौधों में एक विशेष प्रकार का घोल पानी में डाला जाता है। इसके लिए फास्फोरस, नाइट्रोजन, मैग्निशियम, कैलशियम, पोटाश, जिंक, सल्फर, आयरन जैसे पोषक तत्वों तथा खनिज प्रदार्थों को एक उचित मात्रा में मिलाकर मिश्रित कर लिया जाता है। मिश्रित किये गए इस घोल को निर्धारित समय पर पौधों को दिया जाता है, जिससे पौधों को सभी पोषक तत्व प्राप्त होते रहते है और पौधे आसानी से वृद्धि करते है।

हाइड्रोपोनिक खेती के लाभ

  • खेती की इस प्रणाली में बेहद कम खर्च में पौधे और फसलें लगाई जा सकती हैं। एक अनुमान के अनुसार 5 से 8 इंच ऊँचाई वाले पौधे में प्रति वर्ष 1₹ से भी कम खर्च आता है।
  • इस प्रकार की खेती में मिट्टी व ज़मीन से कोई संबंध नहीं होता। अतः इस प्रणाली से उगने वाली फसलों मे बीमारी की संभावना कम अथवा न के बारबर ही होती है।
  • खेती की हाइड्रोपोनिक्स प्रणाली में पौधों में पोषक तत्वों का विशेष घोल डाला जाता है, इसलिए इसमें उर्वरकों एवं अन्य रासायनिक पदार्थों की आवश्यकता नहीं होती है। जिसका लाभ न केवल हमारे पर्यावरण को होता है बल्कि यह हमारे स्वास्थ्य के लिये भी उत्तम होता है।
  • पारंपरिक खेती की तुलना में हाइड्रोपोनिक प्रणाली मे पौधों की संख्या प्रति इकाई अधिक होती है जिसके फलस्वरूप उच्च स्तर की पैदावार प्राप्त की जा सकती है।
  • हाइड्रोपोनिक्स खेती से उगाई गई सब्ज़ियाँ और पौधे अधिक पौष्टिक होते हैं। इसमें कीटनाशक का प्रयोग नहीं किया जाता है।
  • हाइड्रोपोनिक्स पद्वति से उगाई गई फसलें और पौधे आधे समय में ही तैयार हो जाते हैं। जैसे गेहूं के पौधे 7 से 8 दिन में तैयार हो जाते हैं जो सामान्य विधि से 28 से 30 दिन लेते हैं।

हाइड्रोपोनिक प्रणाली की चुनौतियां

  • परंपरागत विधि की अपेक्षा हाइड्रोपोनिक खेती करने में अधिक खर्चा आता है। यहाँ यह बात स्पष्ट करने की आवश्यकता है कि बाद में हाइड्रोपोनिक खेती प्रणाली काफी सस्ती पड़ती है।
  • इस प्रणाली में लगाई गई फसलों को लगातार निगरानी की आवश्यकता होती है। चूँकि इस विधि में पानी को पंपों की सहायता से पुनः इस्तेमाल किया जाता है अतः इसके लिये लगातार विद्युत आपूर्ति की आवश्यकता होती है। इसलिए दूसरी बड़ी चुनौती है हर समय विद्युत आपूर्ति को सुचारू बनाए रखना होती है।
  • हाइड्रोपोनिक खेती में लगाई गई फसल में यदि कोई बीमारी दिखाई देती है तो इस प्रणाली में लगाए गए सभी पौधे प्रभावित होते हैं।
  • मिट्टी के बिना एक बफर के रूप में सेवा करने के लिए अगर सिस्टम विफल रहता है तो पौधे की मृत्यु तेजी से होती है।

मिट्टी रहित हाइड्रोपोनिक प्रणाली के तहत उगाए जाने वाले पौधों की विभिन्न प्रजातियाँ

फसलों के प्रकार

फसलों के नाम

अनाज

चावल, मक्का

सब्जियां

टमाटर, मिर्च, बैंगन, हरीबीन, चुकंदर, विंग्डबीन, शिमला मिर्च, खीरा, खरबूजा, हरी प्याज

फल

स्ट्रॉबेरी

पत्तेदार सब्जियां

लेट्यूस, पालक

हाइड्रोपोनिक्स प्रणाली का उपयोग

                         

आज खेती की इस प्रणाली का प्रयोग पश्चिमी देशों में सफलतापूर्वक किया जा रहा है। हमारे देश में भी देश के विभिन्न भागों में भी इस तकनीक की सहायता से बिना ज़मीन के फसल पैदा जी जा रही है। राजस्थान पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, बीकानेर में मक्का, जौ और उच्च गुणवत्ता वाले हरे चारे वाली फरालें उगाने के लिये इस तकनीक का उपयोग सफलतापूर्वक किया जा रहा है। वहाँ के वैज्ञानिकों ने बिना मिट्टी के नियंत्रित वातावरण में इस तकनीक से सेवण घास की पौध तैयार करने में सफलता प्राप्त की है। इस तकनीक से खुले खेतों में सेवण घास को उगाने और हल्के-फुल्के बीजों की बुआई में आने वाली कठिनाइयों को दूर करने में सहायता मिलती है और इस तरह सेवण घास चारागाहों का तेजी से विकास किया जा सकता है।

गोवा में चारागाह के लिये भूमि की कमी है इसलिए वहाँ के पशुओं के लिये चारे की बड़ी समस्या बनी रहती है। किसानों की इस समस्या को देखते हुए भारत सरकार की ओर से भाकृअनुप-केन्द्रीय तटीय कृषि अनुसंधान संस्थान, गोवा राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत गोवा डेयरी की ओर में हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से हरा चारा उत्पादन की इकाई की विभिन्न डेरी-कोऑपरेटिव सोसाइटियों में लगाई गई हैं। ऐसी ही दस और इकाइयाँ गोवा प्रत्येक इकाई की प्रतिदिन 600 किलोग्राम हरा चारा उत्पादन की क्षमता है। राजस्थान जैसे शुष्क क्षेत्रों में जहाँ चरागाहों के लगातार घटने तथा संतुलित पोषक आहार न मिलने के कारण अच्छे दुधारू नस्ल के पशुओं की हालत चिंताजनक हो रही है, यह से यहाँ हरे चारे का उत्पादन करने का प्रयास किया जा रहा प्रणाली वरदान सिद्ध हो सकती है। हाइड्रोपोनिक्स तकनीक है। इस प्रणाली के माध्यम से बारह महीने पशुओं के लिये पौष्टिक हरा चारा मिल सकेगा।

मक्के से तैयार किए गए हाइड्रोपोनिक्स चारे से संबंधित प्रयोगों में पाया गया है कि परंपरागत हरे चारे में क्रूड प्रोटीन 10.70 प्रतिशत होती है, जबकि हाइड्रोपोनिक्स हरे चारे में क्रूड प्रोटीन 13.6 प्रतिशत तक होती है। लेकिन परंपरागत हरे चारे की अपेक्षा हाइड्रपोनिक्स हरे चारे में क्रूड फाइबर कम होता है। हाइड्रोपोनिक्स हरे चारे में अधिक ऊर्जा, विटामिन और अधिक दूध का उत्पादन होता है और उनकी प्रजनन क्षमता में भी सुधार होता है। अंत में इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता हाइड्रोपोनिक्स तकनीक में इन तत्वों की आपूर्ति हम करते हैं. पोषक तत्व सही समय पर सही मात्रा में मिलते रहने चाहिए। जिससे कि पौधों की उचित बढ़वार के लिये आवश्यक खनिज और जबकि जमीन से पौधे अपने आप लेते रहते हैं। एक तरफ जहां इस तकनीक का प्रयोग चारे के लिए हो रहा है वहीं दूसरी ओर पंजाब जैसे प्रदेश में इसका प्रयोग आलू उगाने के लिए किया जा रहा है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।